पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-3

यहां पढ़ें

दिन 4

14 जून 2019

फुरकियाज़ीरो पॉइंटद्वाली

सुबह-सुबह नींद खुली तो सर का भारीपन सिरे से नदारद था। टेंट के बाहर की ताज़गी ने शरीर को और तरोताज़ा कर दिया। जबतक चाय बनी और औमलेट का नाश्ता तैयार दुआ धूप भी पहाड़ों से सरकती हुई बुग्याल में फैली घास के इर्द-गिर्द बिखर गई। ग्लेशियर के बग़ल में सूरज की किरणें चोटी से ऐसे निकल रही थी जैसे रोशनी का फ़व्वारा सा फूट पड़ा हो। सामने के अपेक्षाकृत ऊँचे पहाड़ में दूसरी ओर के पहाड़ की नुकीली चोटियों की परछाई साफ़ दिखाई दे रही थी। दूर नंदाकोट की बर्फ़ीली चोटी के बीच आस-पास के उभारों की परछाई कुछ ऐसे पड़ रही थी कि बर्फ़ के बीच एक इंसानी चेहरा उभर आया था। एकदम स्पष्ट माथा, तीखी नाक और लम्बी ठोडी। जैसे कोई शख़्स बड़ी गम्भीरता से किसी सोच में मग्न हो। इतनी ऊँचाई पर धैर्य से बैठा वो शख़्स अगर एक असलियत होता तो आख़िर वो क्या सोचता होगा? 

फ़ुर्किया से नंदाकोट का नज़ारा
 

दूसरी पहाड़ी पर ग्लेशियर से गिरते झरने की बातें भी लगातार कानों में पड़ रही थी, जिसमें हवा की सरसराहट घुलकर उन बातों को और मीठा बना रही थी। इन ऊँचे पहाड़ों पर ठहरे ये छोटे-छोटे ग्लेशियर ऐसी न जाने कितनी धाराओं को जन्म देते हैं। ये छोटी-छोटी धाराएं पहाड़ी ढलानों पर उतरकर उफनती हुई नदियों में बदल जाती हैं। ऐसी कितनी ही धाराएं मिलकर एक बड़ी नदी का निर्माण करती हैं। छोटी से छोटी धारा की एक नदी बन जाने में कितनी बड़ी हिस्सेदारी होती है, यह ऐसी ऊँचाइयों में आकर ही समझ आता है। जैसे-जैसे धूप बढ़ रही थी, नंदाकोट की बर्फ़ीली चोटी की चमक और बढ़ती जा रही थी। 

दृश्य कुछ ऐसा है कि मैं एक टीले पर बैठा आस पास निहार रहा हूँ। मेरे बग़ल में हमारे साथ खाती से आया कुत्ता बैठा हुआ है। कितने सभ्य और सरल कुत्ते हैं ये। हमारे साथ कई किलोमीटर की पैदल यात्रा कर चुके हैं। खाना दो तो एक-दूसरे की थाली में मुंह नहीं मारते। पेशाब करने तक रास्ते से कहीं दूर चले जाते हैं। जब हम गलत रास्ते पर होते हैं तो हमें सही रास्ता भी बता देते हैं। किसी अनजान जंगली जानवर की महक पाकर भौंकने लगते हैं। जैसे साथ आये हों तो साथ आये यात्रियों की सुरक्षा का ख्याल भी रख रहे हों। अपना यात्री धर्म निभाना कोई इन कुत्तों से सीखे।

हमें निकलते-निकलते नौ बज गया। तय हुआ कि एक टेंट यहीं लगा रहेगा और घोड़े वाला यहीं रहकर सामान की सुरक्षा करेगा। हमने कुछ छोटे बैग तैयार कर लिए जिनमें कुछ गर्म कपड़े, खाने-पीने का सामान और पानी की बोतलें रख ली गई। अब आगे ऊंचाई लगातार बढ़नी थी। ऐसे में कम सामान के साथ सफ़र करना ही बेहतर भी था। 

फ़ुर्किया से पिंडारी ग्लेशियर के ज़ीरो पोईँट तक का रास्ता क़रीब 6 किलोमीटर का था। हमें वहां जाकर वापस भी लौटना था। इस लिहाज़ से हम कुछ देरी से चल रहे थे। रास्ता बहुत मुश्किल तो नहीं था लेकिन प्रकृति की मार का पूरी तरह शिकार था। कहीं भूस्खलन ने पूरे रास्ते को बर्बाद कर दिया था तो कहीं अब भी पत्थर गिर रहे थे, जिसने बचकर हमें आगे बढ़ना था। ऊंचाई से गिरता एक छोटा सा पत्थर भी जानलेवा साबित हो सकता था। रास्ते में छोटे-छोटे धारे थे जिनका पानी थकान को मिटाने का एक अहम ज़रिया था। पिंडारी बाबा की कुटी तक पहुँचते-पहुँचते हमने क़रीब 7 छोटे-छोटे ग्लेशियर पार किए। ग्लेशियर में बस एक पैर रखने भर का रास्ता था। कहीं-कहीं तो हमें रास्ता बनाकर आगे बढ़ना पड़ता। गुलाबी बुरांश के फूलों के झुंड बहुत देर तक हमारे साथ बने रहे। बर्फ़ के पहाड़ों की पृष्ठभूमि में धूप में नहाए ये गुलाबी फूल तेज़ हवाओं से हिलते तो ऐसा लगता जैसे ख़ुशी से झूम रहे हों। पगडंडियों में बिखरी हुई इनकी पंखुड़ियाँ रास्तों को और ख़ूबसूरत बना दे रही थी। 

 
गुलाबी बुरांश, जो ऊंचे हिमालयी इलाकों में पाया जाता है
 

रास्ते में हवा की बेरुख़ी के शिकार साइन बोर्ड भी दिखाई दे रही थे। हवा यहां कितनी तेज़ चलती होगी इसका अंदाज़ा मज़बूत लोहे के इन बोर्ड को देखकर लग रहा था, जिन्हें हवा ने उठाकर ज़मीन पर पटक दिया था। ये बोर्ड जिस पोल पर लगे थे वो इस तरह से मुड़ा हुआ ज़मीन को छू रहा था जैसे किसी ने पकड़कर उसकी गर्दन मरोड़ दी हो। यात्रियों के लिए बने टिन शेड की छतें उखड़कर बेतरतीबी से यहां-वहां लटक गई थी। समझ आ रहा था कि नीचे किसी बोर्ड पर क्यों लिखा था- हैजार्डस क्लिफ अहैड। एवेलौंच प्रोन एरिया। जब यहां कई किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से बर्फ़ीले तूफ़ान आत होंगे तो वो सबकुछ तहस-नहस कर देने की क्षमता रखते होंगे। लेकिन बुरांश के फूल इन विपरीत परिस्थितियों में भी अपना ख़ूबसूरत वजूद बचाए हुए थे। वो भी अपनी सामूहिकता के साथ। बराश के सैकड़ों पेड़ अब भी अपनी गुलाबी छटा बिखेर रहे थे। शायद यही वो संतोष था जिसकी वजह से ये फूल अब भी किसी मस्ती में झूम रहे थे।

दूर पिंडारी ग्लेशियर भी अब नज़र आने लगा था। एक ग्लेशियर को पार करते हुए रोहित ने बताया कि 2011 में जब वो यहां आया तो यहां पर एक सुंदर बुग्याल हुआ करता था लेकिन 2013 के बाद इस इलाक़े का पूरी तरह से कायापलट हो गया है। जिस ग्लेशियर पर हम खड़े थे वो दरसल यहां हुए ज़बरदस्त भूस्खलन का नतीजा था जिसपर बाद में बर्फ़ जाम गई। 

“इन इलाकों में बारिश बमुश्किल होती है। नीचे के इलाकों में बारिश होती है और यहां बर्फ़ पड़ती है। लेकिन 2013 में ऐसा नहीं हुआ। यहां इतनी बारिश हुई कि भयंकर बाढ़ आयी और अपने साथ सबकुछ बहा ले गई। ऐसा पूरे उत्तराखंड में हुआ। यहां के रास्ते पहले इतने खतरनाक नहीं थे। यहां सबकुछ बदल गया है”

रोहित ने आस-पास नज़रें घुमाते हुए कहा। 

पिंडारी बाबा की कुटी आ चुकी थी और यहां से ज़ीरो पोईँट की दूरी डेढ़ किलोमीटर थी। हालांकि चलना अब और मुश्किल होता जा रहा था। कुछ आगे चलकर जिस पहाड़ की चोटी पर बनी पगडंडी पर हम चल रहे थे वो पहाड़ कहीं ग़ायब हो गया था। पहाड़ भूस्खलन से पूरी तरह टूट गया था, पगडंडी ग़ायब हो गई थी। आगे हमें पहाड़ में छोटे-छोटे कँटीले झुरमुटों के बीच जगह बनाते हुए आगे चलना था। ज़ीरो पोईँट तक पहुँचते-पहुँचते थकान से हाल बेहाल था। हम आख़री बिंदु पर जाकर कुछ देर निढाल बैठे रहे। 

पिंडारी बाबा की कुटी से आस-पास का नज़ारा
 

कुछ देर में जब थकान कम हुई तो चारों ओर निगाहें दौड़ाई। एकदम सामने पिंडारी ग्लेशियर नज़र आ रहा था। हम इस वक़्त कुमाऊँ के सबसे बड़े ग्लेशियर के सामने थे। हालांकि नंदा कोट और नंदा देवी की चोटियों के बीच बसे इस ग्लेशियर की लम्बाई पिछले 150 सालों में 3 किलोमीटर तक कम हो गई है। जिसकी वजह से यह अपने पीछे भारी मात्रा में मलवा छोड़ गया है। यह तीन ग्लेशियर से मिलकर बना है। नंदा कोट की से निकलने वाला ग्लेशियर, बुरला ग्लेशियर और इसी तरह का एक और ग्लेशियर मिलकर पिंडारी ग्लेशियर का निर्माण करता है।

ग्लेशियर के दाईं तरफ़ नदाकोट की चोटी बादलों के बीच से झाँक रही थी। दाईं ओर कहीं नंदा देवी ईस्ट की चोटी थी और उसके बग़ल में नंदाखाट। धूप इतनी तेज़ थी कि कुछ ही देर में शरीर जलने लगा था। सनबर्न के ताज़ा ताज़ा लाल निशान बाहों पर दिखाई देने लगे थे। हल्की-हल्की जलन भी महसूस होने लगी थी.

सामने किसी बर्फ़ीली चादर की तरह बिखरे ग्लेशियर को देखकर मन हो रहा था कि उसकी गोद में जाकर बैठ जाएं. उसके सर पर चढ़कर देख आएं कि रिज के दूसरी तरफ़ की दुनिया कैसी है? लेकिन ये इतना आसान कहां था. इसके लिए हमें एक ट्रेकर से एक माउंटेनियर की भूमिका में आना ज़रूरी था. बिना उपकरणों, तैयारी और ट्रेनिंग के यह सम्भव नहीं था. वैसे भी इस ग्लेशियर पर कम ही लोगों फ़तह पाई है.

पिंडारी ग्लेशियर जो लगातार सिकुड़ रहा है
 

कुमाऊँ और गढ़वाल के पहले कमिश्नर रहे जी डब्लू ट्रेल उन शुरुआती पर्वतारोहियों में से थे जिन्होंने 1830 में पिंडारी ग्लेशियर की चढ़ाई की। वो पिंडारी ग्लेशियर से 17700 फ़ीट की ऊंचाई पर मौजूद दर्रा (अब ट्रेल पास) पार करके मिलम घाटी के मर्तोली गाँव पहुँचे। उनके ही नाम पर इस दर्रे को ट्रेल पास नाम दिया गया। कहा जाता है कि इस दर्रे को पार करते हुए ट्रेल को स्नो ब्लाइंडनेस का अनुभव हुआ। इसे माँ नंदादेवी का प्रकोप माना गया और इसके बाद इस दर्रे से गुज़रने वाले कुछ विदेशी यात्रियों ने बाक़ायदा यहां की चढ़ाई करने से पहले अल्मोड़ा के नंदादेवी मंदिर में बाक़ायदा अच्छा-खास चढ़ावा चढ़ाने के बाद ही अपनी यात्रा शुरू की। 

रास्तेभर जो पिंडारी नदी हमारे साथ रही थी वो इस ग्लेशियर से निकलकर पिंडर घाटी से गुज़रने के बाद कर्णप्रयाग में अलकनंदा नदी से मिल जाती है। अलकनंदा गंगा नदी की सबसे बड़ी ट्रिब्यूट्री में से एक है।

दिन का दो बजने को आया था। अक्सर ऐसी जगहों पर सुबह-सुबह आना ठीक रहता है। उस वक़्त आसमान खुला रहता है तो चोटियों के बेहतर दर्शन हो पाते हैं। हम काफ़ी देर तक आसमान के खुलने का इंतज़ार करते रहे। लेकिन बादल चोटियों के चेहरों से हटने को तैयार नहीं थे। बीच-बीच में चोटियाँ हल्की-हल्की दिखाई देती तो उनकी ऊंचाई का अहसास होता। इन्हीं ऊँचाइयों में कहीं बर्फ़ के तूफ़ानों के बीच आठ पर्वतारोहियों की लाशें भी दबी थी, जिनतक पहुँचने के लिए एक दल हमारे साथ-साथ ही रवाना हुआ था। 

ये कौन सी प्रेरणा होती है जो इन पहाड़ों की खतरनाक ऊँचाइयों में हमें ले आती है। जानलेवा बर्फ़ीली चोटियों पर पहुँचकर ऐसा क्या हासिल हो जाता होगा कि उस रोमांच के सामने अपनी ज़िंदगी तक छोटी लगने लगे। इंसानी स्वभाव और मनोविज्ञान की ये दुनिया भी तो उतनी ही रहस्यमय होती है जितने ये ऊँचे-ऊँचे पहाड़। 

ज़ीरो पॉइंट से पिंडारी ग्लेशियर का नज़ारा
 

सामने एक रौखड़ पर दौड़ लगाते घुरड़ नज़र आ रहे थे। ये विरले जीव ऐसी पथरीली चट्टानों पर बिना रास्तों के ही इतनी तेज़ दौड़ लगा रहे थे कि आश्चर्य हो रहा था। कैसी-कैसी विषम परिस्थियों में हम जीवों ने ख़ुद के सरवाइवल का इंतज़ाम किया है। या फिर यूँ कहें कि प्रकृति ने हर किसी के वजूद को बचाए रखने के लिए कोई न कोई व्यवस्था ज़रूर की है। उन व्यवस्थाओं को हमने अपने इंसानी स्वभाव के चलते न जाने कितनी बार भंग करने की कोशिश की। न जाने कितनी बार प्रकृति ने हमें समझा दिया कि उसके सामने किसी की ज़िद नहीं चलती। हमारा वजूद इतना भी प्रभावशाली नहीं कि हम प्रकृति की व्यवस्थाओं को चेतावनी दे सकें। 

पिंडारी ग्लेशियर ज़ीरो पॉइंट पर हमारा यात्रा दल

पिंडारी ग्लेशियर, नंदादेवी, नंदाकोट, चंगुच और नंदा खाट की चोटियों से घिरे ज़ीरो पोईँट पर क़रीब घंटे भर तक हम बैठे रहे। इस बीच साथ लाए खाने-पीने के सामान से ख़ाली पेट को कुछ राहत भी दी गयी। साथ में आए निढाल होकर लेटे कुत्तों के सामने जब बिस्किट की ख़ुशबू महकी तो बेचारे लार टपकाने लगे। हम सबने मिलकर पेट की आग को बुझाया। थकान कुछ मिटी तो वापसी की राह पकड़ने की बात ज़हन में आई। पौने तीन बज चुका था। हमारे साथ आई भारती और प्रियंका को आज ही बागेश्वर लौटना था। एक दिन के आराम के बाद उन्हें अपनी-अपनी नौकरियों पर लौटना था। हालांकि अब कुछ देर हो चुकी थी। बादलों के पूरी तरह छटने का इंतज़ार अब बेमानी लग रहा था। उल्टा अब घिरते हुए बादल रंग बदलकर काले हो चुके थे। बारिश की सम्भावना काफ़ी प्रबल हो चुकी थी। बारिश का मतलब था रास्तों का खतरनाक हो जाना। सम्भव था कि छोटी-छोटी धाराएं जिन्हें पार करके हम यहां पहुँचे थे घंटेभर की बारिश में अपने उफ़ान पर आ जाएं और उन्हें पार करना असम्भव हो जाए। ऐसा अनुभव मेरे साथ पहले हो चुका था। इसलिए अब मौसम के बिगड़ने से पहले यहां से निकलने में ही भलाई थी। 

रास्ते में कई जगह इस तरह का भूस्खलन देखने को मिला

हम तेज़ी से पहाड़ उतरने लगे। मैं, हितेश और दिव्या तेज़ चल रहे थे और काफ़ी आगे निकल आए थे। बारिश की कुछ एक बूँदें गिरी ज़रूर थी लेकिन जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे बादल छँटते नज़र आ रहे थे। ये राहत की बात थी। क़रीब ढाई घंटे में हम फ़ुर्किया लौट आए। लगभग पैतालीस मिनट बाद बाक़ी लोग भी आ गए। फ़ुर्किया में ढाबे पर खाने का ओर्डर देते समय पौने छह बज चुका था। जितनी देर में खाना बना थकान भी उतर चुकी थी। घोड़े वाले को हम पहले ही आगे भेज चुके थे। द्वाली में कैम्पिंग की योजना थी जो यहां से अब भी पाँच किलोमीटर था। साढ़े छह बजे हम भी द्वाली के लिए रवाना हो गए। हितेश, मैं, दिव्या और पंकज सबसे तेज़ चल रहे थे। हमारा इरादा उजाला रहते-रहते द्वाली पहुँचने का था ताकि बाक़ियों के पहुँचने तक हम टेंट सेट कर सकें। अंधेरा घिरने लगा था। उजाले की आंखरी लौ अब भी बची हुई थी। रास्ते में जंगली जानवरों का ख़तरा भी था। जंगल के बीच कब ब्राउन बीयर का हमला हो जाए कोई भरोसा नहीं था। हालाकि सुना था कि ये विशालकाल भालू आमतौर पर रास्तों पर नहीं आते। 

ख़ैर उजाला रहते-रहते क़रीब-क़रीब भागते हुए हम चारों द्वाली पहुंच गए। अंधेरा होते-होते हमने अपने टेंट भी सेट कर लिए। आधे घंटे बाद कई रोशनियाँ हमें रास्ते में आते हुए दिखाई दी। ये हमारे बाक़ी साथी थे जो हेडलैंप लगाए शोर करते हुए आ रहे थे। इंसानी शोर से जानवरों के हमले का ख़तरा कम हो जाता है।

कैम्प के बग़ल में पर्यटन विभाग की बनायी टीन के छप्पर वाली शेल्टर में आग जलाने की जगह बनी हुई थी। यहां आग तापते हुए हमने बची हुई रम का मज़ा लिया। हम कुछ लोग देर रात तक न जाने कितने सारे विषयों पर चर्चा करते रहे। जब नींद आँखों में उतर आई तो हम टेंट में वापस लौट गए। कल और आज हम औसतन बीस किलोमीटर चले थे। अगले दिन फिर हमें बीस किलोमीटर के क़रीब चलना था। जल्दी उठने की आशा लिए हमने ख़ुद को नींद के हवाले कर दिया। 

 

दिन  5

15 जून 2019

द्वालीबागेश्वर

पिछली रात ही हमने पास के ढाबे पर नाश्ते के लिए बात कर ली थी। उठने और हाथ मुँह धोने तक नाश्ता भी तैयार था। गरम-गरम पराठे खाकर हम आगे बढ़ने के लिए तैयार थे। आज हमें बागेश्वर पहुँचना था जिसमें क़रीब बीस किलोमीटर की पैदल यात्रा और फिर 60 किलोमीटर के आस-पास गाड़ी का सफ़र शामिल था। 

द्वाली से नीचे उतरते ही पिंडर नदी एक बार फिर नुमाया हुई। पूरी गर्जना के साथ वेग से बहती हुई। उसे पार करने के लिए बनाए गए लकड़ी के पुल नदी के सामने बौने लग रहे थे। लग रहा था कि नदी अपनी पर आयी नहीं कि पुल पलक झपकते ही ग़ायब हो जाएंगे। नदी के छोर पर खड़ंजा बनाने का काम भी चल रहा था। हमें बताया गया था कि द्वाली से ही कफ़नी ग्लेशियर के लिए भी रास्ता जाता है। एक बार वहां जाने का मन भी बन गया था लेकिन अब नौकरियों पर पहुँचने की जल्दबाज़ी के चलते वह योजना स्थगित कर दी गयी थी। 

नदी पार करके चढ़ाई चढ़नी थी लेकिन सुबह-सुबह के जोश में चढ़ाई कब चढ़ ली गयी पता ही नहीं चला। रास्ते भर गप्पें भी चलती रहीं। पंकज ने अपने गाँव के राम माया बाबू की डायरी का ज़िक्र छेड़ दिया जो गाँव के घर की तीसरी मंज़िल पर बैठकर रोज़ कुछ-कुछ लिखते रहे थे। दरअसल ये गाँव में खेती करने वाले किसानों के क़िस्से होते थे। किसने किससे क्या कहा। किसकी लड़ाई हुई। ऐसी छोटी-छोटी रोज़मर्रा की बातों का आँखों देखा हाल ग्रामीण भाषा में इस डायरी में दर्ज था। हितेश भी हैको, हैपो, स्नो ब्लाइंडनेस जैसे पर्वतारोहण से जुड़ी शब्दावली का ज्ञान दे रहा था। उसने बताया कि कैसे एक बार उनकी साथी पर्वतारोही रात के वक़्त क्रेवास में गिर गई। पता तब लगा जब लोगों की गिनती हुई। कैसे रात के वक़्त उसे क्रेवास से निकाला गया। और वो किसी तरह बच गयी। ऐसी न जाने कितनी जानें इन साहसिक यात्राओं में चली जाती हैं। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों की यात्राएं जीवन को हथेली पर रखकर ही की जाती हैं। प्रकृति के आगोष में कहां, कब क्या हो जाए कुछ पता नहीं चलता।

चलते-चलते हम खड़क सिंह जी के उसी ढाबे में आ पहुँचे थे, जहां जाते वक़्त हमने चाय पी थी। यहां भेड़ों का बड़ा सा झुंड हमारा इंतज़ार कर रहा था। भेड़ों के बीच में एक काले रंग का झबरीला भोतिया कुत्ता पूरे रौब से खड़ा था। उसके गले में घंटी थी और काले मुलायम फ़र जैसे बाल धूप में पूरी गरिमा के साथ चमक रहे थे। इतने बड़े झुंड का रक्षक होने का गर्व उसके चेहरे से झलक रहा था। 

चरवाहों के कई समूह अपनी-अपनी सैकड़ों भेड़ें चराने इन इलाकों में आते हैं. इनके इलाके आपस में बँटे होते हैं.
 

कुछ देर चाय पीते हुए सुस्ताने के बाद हम खाती गाँव की तरफ़ बढ़ गए। खाती इस पूरी यात्रा का सबसे ख़ूबसूरत गाँव था। वहां पहुंचकर हमने खाने का ऑर्डर दिया और ढाबे के पास हरी घास के छोटे से आगं पर जूते उतारकर पसार गए। जूते उतारने से थके हुए तलवों को तुरंत एक राहत महसूस हो रही थी। ढाबे में एक पेंटिंग लगी हुई थी, जिसमें एक पहाड़ था और उसके बीच से एक नदी निकल रही थी। बातचीत के दौरान पता चला कि ये पेंटिंग किसी विदेशी यात्री ने पास ही के एक कौटेज में बैठकर बनाई है। 

“ये बणकटिया पीक है। बणकाटे जैसी लगती है इसलिए इसका ये नाम पड़ा। जो फ़ोरेनर आया था वो रंग-वंग सब अपने साथ लाया था। बड़ा अच्छा पेंटर था। एक बार सामने देखा और हूबहू बना गया”

ढाबे वाले ने जानकारी दी। यहां घरों की दीवारों पर की गई पेंटिंग के बारे में पूछने पर उसने बताया कि हँस फ़ाउंडेशन नाम की एक संस्था ने यहां ये सब काम किया है।

“दीपक रमोला और उनकी टीम आयी थी पूरी। उन्होंने ही हर घर में वॉल पेंटिंग की है”

इस कलाकारी की वजह से गाँव के घर वाक़ई काफ़ी ख़ूबसूरत लग रहे थे। ख़ैर खाना खाकर हम आगे बढ़ गए। खड़किया पहुँचते-पहुँचते शाम के 5 बज गए थे। बारिश के आसार नज़र आ रहे थे। आसमान घिर रहा था।

खाती गाँव के घरों में इस तरह की पेंटिंग देखने को मिल जाती है
 

“लिख के ले लो कोई बारिश नहीं हो रही”

हमारे शंका ज़ाहिर करने पर ढाबे के मालिक प्रताप सिंह ने कहा। चाय पीकर हम आगे बढ़ने के लिए उठे ही थे कि तेज़ बारिश शुरू हो गयी। बारिश की वजह से एक घंटे तक इंतज़ार करना पड़ा। सड़क इतनी संकरी थी कि अंधेरे में गाड़ी ले जाना थोड़ा खतरनाक भी था। इसलिए बारिश के रुकते ही हमने आगे बढ़ने में भलाई समझी। टूटी-फूटी सड़क पर गाड़ी की रफ़्तार दस किलोमीटर प्रति घंटा भी नहीं हो पा रही थी। थोड़ी ही देर में अंधेरा भी घिर गया। लेकिन अच्छी बात यह हुई थी गाँव के लोगों ने हमें लौटने का जो नया रास्ता बताया था वो क़रीब पंद्रह किलोमीटर छोटा था। उनके बताए रास्ते पर चलते हुए रात के नौ बजे हम कपकोट पहुंच गए। कपकोट के एक ढाबे में रात का खाना मिल गया। खाना खाकर निकलते हुए क़रीब ग्यारह बज चुके थे। देर रात बागेश्वर पहुँचकर हमने अपनी साथी दिव्या के घर पर डेरा जमाया। 

एक और साहसिक यात्रा सुरक्षित तरीके से सम्पन्न करने का सुकून था। ज़ाहिर था नींद तो बढ़िया आनी ही थी।    

समाप्त.

Please follow and like us:
error

Written by 

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

1 thought on “पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-3

  1. Very adventurous tour…
    आपकी यात्रा के अनुभव बहुत सजीव लगे… बर्फ से ढके हुए पहाड़ो का वर्णन बहुत अच्छा लगा…
    ईश्वर से प्रार्थना है कि हमेशा आपकी यात्रा सुरक्षित और सफल रहे ….

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *