Picture of Library Village Maniguh Uttarakhand 1

उत्तराखण्ड का ‘पुस्तकालय गाँव’: जहाँ किताबें बदल रही हैं एक पहाड़ी गाँव की तस्वीर

उत्तराखण्ड के गढ़वाल की पर्वतमालाओं के बीच बसा मणिगुह गाँव (Library Village Maniguh Uttarakhand)आज एक अनोखे सामाजिक और शैक्षिक प्रयोग के कारण देशभर में पहचान बना रहा है. कभी सीमित संसाधनों और अवसरों की चुनौतियों से जूझने वाला यह गाँव अब “पुस्तकालय गाँव” के नाम से जाना जाता है.

इस पहल को आगे बढ़ाने की गरज से सालाना “गाँव घर महोत्सव” हाल ही में अपने चौथे संस्करण के साथ संपन्न हुआ. दो दिनों तक चले इस आयोजन में साहित्य, शिक्षा, लोक संस्कृति और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा संगम देखने को मिला. 

ग्रामीण बच्चों और महिलाओं ने जिस उत्साह से इस कार्यक्रम में भागीदारी की वह देखने लायक रहा. पलायन की समस्या से जूझ रहे उत्तराखंड के सुदूर गांवों के लिए इस कार्यक्रम के ज़रिए एक मिसाल भी पेश की गई कि कैसे नए प्रयोगों से ‘घोस्ट विलेज’ बनते जा रहे उत्तराखंड के सुदूर गाँवों को वापस जिलाया जा सकता है.

ज्ञान और संस्कृति का संगम

Old people at Library Village Maniguh Uttarakhand

गाँव घर महोत्सव (Gaon Ghar Mahotsav) में परिचर्चाएँ, कवि सम्मेलन, नाट्य कार्यशालाएँ, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, प्रदर्शनी और सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किए गए. आयोजकों का कहना है कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक उत्सव मनाना नहीं, बल्कि ज्ञान की संस्कृति के ज़रिये समाज के बीच संवाद को मजबूत करना है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति नवीन चन्द्र लोहनी थे. उन्होंने पुस्तकालय के नए बने रीडिंग रूम का उद्घाटन किया. उन्होंने कहा,  “शिक्षा  सामाजिक परिवर्तन का सबसे प्रभावी माध्यम है”

उल्लेखनीय है कि हाल ही में उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय ने आठ गाँवों को शैक्षिक विकास के लिए गोद लेने का फैसला किया. इनमें मणिगुह भी शामिल है. अपने संबोधन में लोहनी ने गाँव के लिए भविष्य की कई शैक्षिक योजनाओं की जानकारी दी

कैसे शुरू हुई ‘पुस्तकालय गाँव’ की पहल? (Library Village Maniguh Uttarakhand)

Library village reading room

बिहार मूल के सुमन मिश्रा और उत्तराखंड मूल की बीना ने मिलकर मणिगुह के इस पुस्तकालय गाँव की परिकल्पना की. उनके अलावा आलोक सोनी और राहुल रावत भी उनकी इस मुहीम में साथ जुड़े.

सुमन बताते हैं, “पुस्तकालय गाँव पहल का औपचारिक उद्घाटन 26 जनवरी 2023 को वरिष्ठ पत्रकार रमेश पहाड़ी ने किया था. उस समय पुस्तकालय में लगभग चार हजार पुस्तकें थीं. आज यह संख्या बढ़कर 21 हजार से अधिक हो चुकी है.

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इस पहल की शुरुआत ‘हमारा गाँव घर फाउंडेशन’ ने की थी. हमारा उद्देश्य उत्तराखण्ड में ऐसे थीम-आधारित गाँव विकसित करना था जो स्थानीय संसाधनों और सांस्कृतिक विरासत के आधार पर विकास के नए मॉडल पेश कर सकें.”

फ़ाउंडेशन की संस्थापकों में से एक बीना मिश्र का ननिहाल मणिगुह में ही है. “वो बहुत समय से चाहती थी कि हम गाँव वापस लौटकर वहाँ कुछ करें. इसी गाँव में शिक्षा और संसाधनों की कमी को देखते हुए इसे पुस्तकालय गाँव के रूप में विकसित करने का विचार सामने आया.” सुमन बताते हैं.

जब पुस्तकालय खुद पाठकों के पास पहुँचा

उत्तराखंड के इन सुदूर गाँवों में आवागमन इतना आसान नहीं होता. इसलिए सिर्फ़ एक पुस्तकालय बना देने से पढ़ने की संस्कृति का प्रसार करना इतना आसान नहीं था. “हमें शुरुआत में यह स्पष्ट हो गया कि केवल एक भवन में पुस्तकालय बना देना पर्याप्त नहीं होगा. इसी सोच के तहत ग्रामसभा परिसर के आसपास आठ “पुस्तक मंदिर” बनाए गए.”

मंदिरनुमा इन संरचनाओं में किताबें रखी जाती हैं और ये खुले में बने रीडिंग रूम्स की तरह काम करते हैं. सुमन कहते हैं, “हमारा विचार सरल था, अगर लोग पुस्तकालय तक नहीं पहुँच सकते, तो पुस्तकालय लोगों तक पहुँचे”

आज यह पुस्तकालय केवल किताबों तक सीमित नहीं है. यहाँ बच्चों के लिए खेल सामग्री, प्रोजेक्टर, टेलिस्कोप और निःशुल्क कंप्यूटर शिक्षा की व्यवस्था भी है.

गाँव के बच्चों को पहले कंप्यूटर सीखने के लिए लगभग 14 किलोमीटर दूर अगस्त्यमुनि जाना पड़ता था. अब यह सुविधा उन्हें अपने गाँव में ही उपलब्ध है.

देश-विदेश से पहुँच रहे लोग

पुस्तकालय गाँव की पहचान अब स्थानीय स्तर से आगे बढ़ चुकी है. 

इस पहल का उल्लेख विकिपीडिया में भी दर्ज है और देश-विदेश से लोग इस मॉडल को देखने और समझने के लिए मणिगुह पहुँच रहे हैं.

शिक्षा के साथ पर्यटन की संभावनाएँ

Maniguh village trekk

मणिगुह का महत्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है. गाँव से होकर कार्तिक स्वामी मंदिर तक जाने वाला एक वैकल्पिक पैदल मार्ग गुजरता है. स्थानीय लोगों की मानें तो यह ट्रेक प्राकृतिक सौंदर्य और जैव-विविधता, दोनों के लिहाज़ से अहम है.

फाउंडेशन इस मार्ग को “ज्ञान मार्ग” के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है. उद्देश्य है कि यहाँ आने वाले यात्री प्रकृति, संस्कृति और अध्ययन के अनुभव को एक साथ महसूस कर सकें.

फ़ाउंडेशन की मानें तो इन प्रयासों का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है. गाँव में होम-स्टे संस्कृति विकसित हुई है और अब विभिन्न राज्यों से आने वाले पर्यटक यहाँ ठहरकर ग्रामीण जीवन और लोक संस्कृति को करीब से देख रहे हैं.

पुस्तक यात्रा से हुई महोत्सव की शुरुआत

महोत्सव की औपचारिक शुरुआत के बाद गाँव के बच्चे, ग्रामीण और अतिथि एक प्रतीकात्मक “पुस्तक यात्रा” में शामिल हुए. यह यात्रा पुस्तकालय से शुरू होकर पुस्तक मंदिरों से गुजरते हुए कार्तिक स्वामी मंदिर तक पहुँची.

यहीं महोत्सव का विधिवत उद्घाटन किया गया.

इस मौके पर फाउंडेशन के सहयोगी गजेन्द्र रौतेला ने बच्चों के साथ लोककवि गिर्दा का प्रसिद्ध गीत “उत्तराखण्ड मेरी मातृभूमि” प्रस्तुत किया.

हिमालयी ज्ञान परंपरा पर चर्चा

Poet Harsh Kafar at Library Village Maniguh Uttarakhand

कार्यक्रम का एक अहम सत्र हिमालयी ज्ञान परंपरा विषय पर भी रहा.

इस सत्र में जीत सिंह सेमवाल और स्वतंत्र पत्रकार मनमीत ने भाग लिया. चर्चा का केंद्र यह था कि हिमालयी समाज ने सदियों से अपने पारंपरिक ज्ञान को किस तरह से संरक्षित और हस्तांतरित किया है.

वक्ताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अपनी पारंपरिक विरासत और पुरखों के ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण करना ज़रूरी है और आज के संदर्भ में उस ज्ञान की क्या उपयोगिता हो सकती है इस पर भी सोचा जाना चाहिए.

कविता, भोजन और सिनेमा

Food made at Maniguh village mahotsav

महोत्सव के दौरान आयोजित कवि सम्मेलन में हर्ष काफ़र, अविनाश मिश्र, पंकज प्रखर और सुभाष पहाड़ी ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं.

गढ़वाल के पारंपरिक व्यंजनों की प्रदर्शनी भी आकर्षण का केंद्र रही. स्थानीय महिलाओं ने आगंतुकों को इन व्यंजनों के इतिहास, सांस्कृतिक महत्व और स्वाद से परिचित कराया.

शाम को ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की चर्चित फिल्म Children of Heaven का प्रदर्शन किया गया, जिसे दर्शकों ने काफी सराहा.

ग्रामीण व्लॉगिंग और बच्चों की भागीदारी

महोत्सव के दूसरे दिन ग्रामीण विषयों पर व्लॉगिंग की संभावनाओं पर चर्चा हुई.

व्लॉगर संदीप गोसाईं ने युवाओं को बताया कि डिजिटल माध्यमों के जरिए स्थानीय मुद्दों, परंपराओं और विकास की कहानियों को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच तक पहुँचाया जा सकता है.

इस दौरान निबंध लेखन प्रतियोगिता भी आयोजित की गई. बच्चों के लिए रंगमंच कार्यशाला का संचालन पुनीता चीरा ने किया, जिसमें खेल और गतिविधियों के माध्यम से संवाद, नेतृत्व और टीमवर्क के महत्व को समझाया गया.

पूरे कार्यक्रम का संचालन गाँव की छात्रा स्नेहा राणा ने किया.

एक गीत के साथ समापन

Suman Misra and his team gaon ghar mahotsav

दो दिनों तक चले इस आयोजन का समापन भी उसी गीत के साथ हुआ जिससे इसकी शुरुआत हुई थी:

“उत्तराखण्ड मेरी मातृभूमि…”

आयोजकों के अनुसार यह केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस विश्वास का उत्सव है कि गाँव किसी भी सभ्यता की जड़ होते हैं. यदि इन जड़ों को ज्ञान, संस्कृति और सामुदायिक चेतना का पोषण मिले तो वे पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन सकते हैं.

मणिगुह का पुस्तकालय गाँव आज इसी विचार का जीवंत उदाहरण है, जहाँ किताबें केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि भविष्य गढ़ने का माध्यम बन रही हैं.

 

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