दिल्ली डायरी 21 सितंबर 2023 दिल्ली के एक उमस भरे दिन आस्था को ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर से एक ईमेल आया। यह ईमेल चेक गणराज्य के दूतावास में एक कार्यक्रम के बाबत था – लॉंग नाइट ऑफ लिटरेचर (Long night of literature) कार्यक्रम के इस नाम ने आकर्षित किया, इस बात ने और ज़्यादा कि यहाँ भारतीय…
फूल चादर की तरह लाल मिट्टी वाली उस कच्ची सड़क पर बिछे थे। रेंगती हुई चींटियां खुश थी कि बारिश के बाद ही सही उन्हें नयी सलवटें नसीब हुई. गिलहरियां आहटों का रास्ता काटती हुई सी फुदक कर कहीं दूर ओझल होती रही थी. मोर अपने पंख फैलाए धूप की अचकनें पहनकर जंगलों में खो…
बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का सपना हो गई थी.. ज़मीन अभी भी नम थी.. जैसे कभी कभी उसकी आंखें हो जाया करती हैं उसकी याद में.. उतनी ही पाक-साफ़, उतनी ही मासूम.. ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों को देखकर उसे लगा कि उसकी यादों का रंग शायद हल्का पीला होता होगा…..
उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए…
Mumbai Diary : 21 (January 2015) दिल्ली में किये काम के (छोटे-मोटे विलंबित) चैक मुंबई के पते पर मंगाते हुए लग रहा है कि इन दिनों शहर कपड़ों की तरह बदल रहा हूं… जनवरी के आते आते दिल्ली और मुंबई के बीच बदलता यही है कि जेकेट से लदे दिन टी-शर्ट से हल्के हो जाते…
1. अगस्त क्रान्ति राजधानी मुंबई सेन्ट्रल के प्लेटफाॅर्म एक से चल पड़ी थी। मम्मी खिड़की के बाहर भागती हुई दुनिया को देख रही थी और पापा अभी अभी आये मिड डे अखबार को पलट रहे थे। हमारी तीन सीटों में से एक सीट 8 नम्बर की थी जो उस कोच के दूसरे छोर पर थी।…
रात का तकरीबन नौ बज रहा था। संगीत नाटक अकादमी से बाहर निकला ही था कि मेनरोड पर एक रिक्शेवाले को अपने रिक्शे पर कपड़ा मारते हुए देखा। पूछा कि क्या वो अम्बेडकर पार्क की तरफ जाएगा? मुझे इसी ओर आना था। रिक्शेवाले ने मना कर दिया। तभी पीछे एक शख्स को साईकिल के खड़ा…
Lucknow Diary सेक्स सोसाईटी एन्ड शी…. लखनऊ में इस नाम से कोई थियेटर शो है, पहले तो ये जानकर ही जरा आश्चर्य हुआ। साथी गौरव मस्तो स्रीवास्तव निमंत्रण पत्र देके गये थे। लखनऊ में थियेटर देखने का पहला अवसर था ये इसलिये उत्साह भी बहुत था। संगीत नाटक अकादमी पहुंचे तो वहां पहले से भोजपुरी…
Mumbai Diary : 20 (23 Jun 2014) तकरीबन साड़े तीन महीने बाद मुम्बई लौटा हूं। दिल्ली की लू के बनिस्पत मुम्बई की ठन्डी हवाएं राहत देने वाली हैं। ये इस शहर के और खूबसूरत हो जाने के शुरुआती दिन हैं। दिन में उमस रहती है ज़रा-ज़रा पर साथ में जो ठन्डी हवाएं चलती हैं, वो…
ये असम्भव सा काम आज बस होने ही वाला था। जिस काम के लिये पिछले हफते भर से तरह तरह के जुगाड़ काम ना आये उस काम को आज मैं घर बैठे कर ही लेने वाला था। उम्मीद पूरी थी। बावजूद इसके कि पुराने अनुभव इस पूरी उम्मीद का समर्थन करने वाले तो कतई नहीं…
सीने में इन दिनों कभी कभी तेज़ दर्द होता है.. लगता है की पेट के अन्दर कोई जा बैठा है जो कभी कभी फेफड़ों को जोर से पकड़ लेता है और निचोड़ने लगता है.. घर के बाहर टूटी-फूटी सड़कों में बहुत सारी धूल है और पास में एक प्राइवेट अस्पताल.. हरे रंग के शीशे से बना बड़ा सा अस्पताल…..
Mumbai Diary : 19 ( April 2014) बांद्रा स्टेशन की तरफ आती हुई सड़क। हाथ में कतई लाल रंग के दिल के आकार के 25-30 गुब्बारों का गुच्छा। वो सफेद टाॅप और नीली रंग की जींस पहनी हुई लड़की हाथ में छतरी के हैंडल की तरह एक डोरी थामे पूरे आत्मविश्वास से इस गुच्छे को…
तो इस बार की होली जेएनयू में खेली। बाबा गंगनाथ मार्ग से जेएनयू के गेट की तरफ बड़ते ही माहौल एकदम बदल सा जाता है। जेएनयू कैम्पस के भीतर रंग जैसे इन्सानों के शरीरों पर झूलते हुए नज़र आते हैं। कई तरह के रंग और उसमें सबसे गहरा रंग खुशी का। होली है हुड़दंग नहीं…
Mumbai Diary : 18 (January 2014) यहां मुंबई में कई बार आप उस पत्ते की तरह महसूस करने लगते हैं, जो नदी के प्रवाह के बीच किसी पत्थर में अटक गया हो। आसपास सबकुछ लगातार बह रहा हो पर आपके मन का कोई सिरा उस पथरीली सतह पर कहीं दबा रह गया हो। बहता हुआ…
Mumbai Diary : 17 (December 2013) गुलज़ार साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी .. गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो…
Mumbai Diary 16 ( Jun 2013 ) मुम्बई में हूं और खफा हूं। खफा हूं कि देश की आर्थिक राजधानी में बैठा देश के नैतिक दिवालियेपन का शिकार हो रहा हूं। देश के राजनैतिक खोखलेपन का हिस्सा बन रहा हूं। अप्रैल की 22 तारीख को मुम्बई आया था। तब देखा था कि कितनी मुश्किल से…
मुम्बई के अंधेरी स्टेशन के भीतर उस ओवरब्रिज पर भागती भीड़ का न कोई सर पैर है, न कोई ओर छोर। अजनबी अनजान चेहरों में पहचान तलाशने की तमाम कोशिशें जब हारकर लौटती हैं तो अपना पीछे छूट गया कस्बा याद आता है। स्टेशन से गुजरती कोई भी लोकल ट्रेन उस कस्बे की ओर नहीं…
Mumbai Diary : 15 ( 24 October 20112) Mumbai Film Festival 2012 पिछले पांच दिनों से मुम्बई के पांच अलग अलग थियेटरों का पीछा किया है। हर थियेटर जैसे एक ट्रेन सा हो और फिल्म शुरु होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरु होने का वक्त हो। रोज कई ऐसे ही सफर तय किये…
Mumbai Diary 14 (19 October 2012) (Mumbai Film Festival 2012) एक और दिन मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के नाम रहा। शुरुआत खराब थी। इतवार की सुबह सुबह सायान के सिनेमेक्स सिनेमाहौल में औडिटोरियम के बाहर 12 बजकर 45 मिनट पर लगने वाली फिल्म गॉड्स हौर्सेज़ बिना किसी पूर्व सूचना के कैंसल कर दी गई। स्क्रीनिंग हौल…
Mumbai Diary : 13 ( 18 October 2012) (मुम्बई फिल्म फेस्टिवल 2012) सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुम्बई फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थियेटर की कुर्सियों पर टिककर…
Mumbai Diary : 12 (October 2012) गणपति बप्पा ने अलविदा कह दिया है। गणेश के इस बड़े उत्सव को देखकर लगता है कि मुम्बई में लोग मस्त रहना जानते हैं। गणेश उत्सव के तुरन्त बाद ही निर्देशक उमेश शुक्ला की फिल्म ओह माई गौड देखते हुए अभी अभी बीते गणपति उत्सव के जलसे के दृश्य…
Mumbai Diary 11 (July 2012) अभी अभी कांजुरमार्ग स्टेशन के पास पूरब से पश्चिम की ओर जाने वाले पुल पे कुछ वक्त बिताया। वक्त के साथ साथ पुल के ठीक नीचे बीतती रेलगाडि़यां थी जो अलग अलग ट्रेक पर अपनी अपनी गति से आ जा रही थी। जैसे पटरियां वक्त हों और हर रेलगाड़ी अलग…
Mumbai Diary 10 (May 2012) डोंगरी टु दुबई का बुक लांच था। बेंड्रा की कार्टर रोड में समुद्री किनारे के पास औलिव नाम का वो बार। और उस बार का एक छोटा सा अहाता जिसके फर्श पर नदियों के किनारे पाये जाने वाले, पानी से घिसे मुलायम से कंकड़ बिछाये गये थे। जो दिख अच्छे…
Mumbai Diary 9 ( April 2012) मुम्बई पे छतें सरों से कोई खास सरोकार नहीं रखती। अपने अनुभव देखकर तो यही लगता है। व्यक्तिगत अनुभवों से शुरु करुं तो जुम्मा जुम्मा एक साल और कुछ महीने हुए हैं यहां आये और तीन बार घर बदली कर लिया है, चैथी जगह शिफ्ट करने की तैयारी चल…
मुंबई डायरी : 8 (मार्च 2012) अजीब से रतजगे हैं इन दिनों। आज फिर रात भर का जागा हूं। पिछले कुछ दिनों से सुबह 7-8 बजे से पहले नीद नहीं आ रही। पता नहीं क्यूं……. कल रात को ढ़ाई बजे, एक दोस्त का फोन आया। तुम्हारे पास मेरी एक पेन ड्राईव है… सुबह तुमसे लेनी…
Mumbai Diary 7 ( February 2012) मुम्बई और मेरे रिश्ते की उम्र आज एक साल एक महीना और कुछ 7 दिन हो चुकी है… ये शहर मेरे लिये अब उतना अजनबी नहीं रह गया है…. जैसे जैसे अजनबियत खत्म होने लगती है… वैसे वैसे रहस्य छंटने लगते हैं… नयापन धुंधला होने लगता है… पुरानापन हावी…
Mumbai Diary :6 ( October 2011) देर शाम अंधेरी वैस्ट के रिहायशी इलाके मलाड की एक मीटिंग से लौटते हुए ओशीवारा के लोटस पैट्रोल पंप से गुजरने के दरमियान कुछ यूं होता है…..सड़क पर सरकती रफतार के बीच अचानक एक बत्ती जलती है, एक गाड़ी रुकती है, एक खिड़की दिखती है। कार के बांईं सीट…
Mumbai Diary 5 (September 2011) कई जगहें ऐसी होती हैं जहां ना भी गये होते तो कुछ नहीं होता पर जहां जाने के बाद ऐसा लगता है कि यहां ना आये होते तो कुछ मिस हो जाता। तो ये कहानी एक खोज से शुरु होती है। कुछ दिनों पहले इसी मोहल्ले के जमीदार साहब अविनाश…
Mumbai Diary : 4 ( August 2011) आज ही घर शिफ्ट किया है। यारी रोड से यारी और वर्सोवा की लहरें प्यारी हो गई थी। उस गली को छोड़ आये हैं अब। इन्डियन आईल नगर के पास अपना बाजार के बाजू कहीं एक घर मिला है। बाजार भी कभी किसी का अपना हुआ है भला।…
Mumbai Diary : 3 (July 2011) कभी कभी लगता है कि मैं एक तिनका हूं और ये शहर बारीक सा एक घोंसला। मेरी ही तरह तिनका तिनका लोग इससे जुड़ते जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे समय का कोई हिस्सा यथार्थ से जुड़ रहा होता है। सुना है मुम्बई मुलाकातों से चलती है। कौन्टेक्ट्स यहां…
Mumbai Diary : 2 ( Jun 2011) मुम्बई के बारे में एक बात सुनी थी। मानसून आने के बाद यहां जब बारिश शुरु होती है ना, फिर इतनी जल्दी थमती नहीं। सच ही है। जून से शुरु होकर सितम्बर तक वही झमाझम झमाझम….बारिश जब रिमझिम की आवाज़ में बोलती है तो सन्नाटे की सांय सांय…
मुंबई डायरी: १ (जून 2011) कुछ दिन पहले हिन्दी की जानी मानी वैबसाईट मोहल्ला लाइव के सम्पादक अविनाश जी ने फेसबुक पे पिंग किया। न हैलो। न हाय। सीधे कहा उमेश मुम्बई डायरी लिखा करो। आईडिया मुझे अच्छा लगा। उस बात को हफ्ते से उपर हो आया था। कुछ लिख नहीं पाया। कुछ ऐसा नया…
टाकिंग टम्स वो दोनों टाकिंग टम्स में नहीं थे। फेसबुक, जीटाक, स्काईप, बीबीएम सारे दरवाजे बंद थे। उसे लगा आज सचमुच खिड़कियों से हवा नहीं आ रही। रफ्ता रफ्ता उसके दिमाग में न जाने क्या बारुद की तरह जमा होने लगा। लगा कि कुछ ही देर में दिमाग आरडीएक्स हो जायेगा। वो रास्ते तलाशने लगा।…
सुबह सुबह नौएडा मोड़ से गुजरते हुए सड़क के किनारे देखा तो वहां मां दुर्गा की वो मूर्ति नहीं थी, ना ही नटराज की। वहां कुछ लोग थे जो बुल्डोजर लेकर कच्ची ईंटों से बने उन कच्चे घरों को तोड़ रहे थे जहां अब तक वो कुछ लोग रहते थे, जिनका रहना वहां गैवाजिब था,…
कई बार अपने आसपास लोगों को निहायत प्रोफेश्नल होता देख डर लगता है। समझ नहीं आता कि क्या ज्यादा जरुरी है। इन्सानी भावनाओं को जिन्दा रखते हुए जीना या प्रोफेश्नल होना। जल्दबाजी, बेचेनी फलतह तुनकमिजाजी, गुस्सा। समझ नहीं आता कि क्यों कोई काम शुकून से नहीं किया जा सकता। पर सबके काम करने करवाने के…
अरे यार फोन चोरी हो गया। घर आकर बताया तो भाई लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर आई। पहली बार जब घर आकर बताया था तो ऐसा नहीं हुआ था। तब सबको लगा था कि हां कुछ चोरी हो गया। ऐसा होना नहीं चाहिये था। कैसे कोई फोन चोरी कर सकता है। जेब से निकाल…
दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब…
हम ईदगाह पढ़ते बड़े हुए। और जब जब हामिद के चिमटे ने उसकी दादी की आंखें को खुशी से सराबोर कर दिया हमें लगा कि ईद आ गई। और आज फिर जब ईद आई है हमें हामिद की दादी याद हो आई है। उसी चिमटे उन्हीं खुशी भरे आंसुवों के साथ। जामिया में पढ़ते उसे…
दिल्ली की भीड़ भरी बसों में रोज कई वाकये होते हैं। मसलन मोबाईल या पर्स चोरी हो जाना। पर इन वाकयों को अंजाम देने वाले लोग ये काम चोरी छिपे करते हैं। उन्हें किसी का डर होता है। यह किसी शायद प्रशासन होता है, माने पुलिसिया डंडा और मार। पर जो वाकया आज हुआ उसे…
सड़क पर बसें रफ्तार से आ जा रही हैं। बस स्टॉप पर भीड़ तिलचट्टों के झुंड सी बिखरी है। एक बस आती है। रुकती है और उस पर लोग टूट पड़ते हैं। जैसे जल्दबाजी एक जरुरत हो जिसके पूरा न होने पर सम्भवतह जिन्दगी थम सी जाएगी। लोग इस भीड़ में खुद को सबसे ज्यादा…
हम एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं जहां पे आपको बोलने सुनने और यहां तक कि सोचने के लिए भी एक दायरा तय कर लेना होता है। क्या सोचें क्या कहें और क्या करें इस सब के इर्द गिर्द एक बड़ी लोहे की कांटेदार जंजीर लिपटी हुई है। एक छोटी सी भूल उस…
ये वाकया दिल्ली की संवेदनहीनता को बयान करता ह। ये बताता है कि दिल्ली के दिलवाले लोगों के बीच इस सड़कछाप वर्ग की देखरेख करने वाला कोई भी नहीं है। आज सुबह नौ बजे के करीब किसी काम से गुरुद्वारा बंग्ला साहिब के पास जाना हुआ तो वहां फुटपाथ पर लगभग बारह साल यह का…
कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज…
[dropcap]न[/dropcap]दियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से…
कई बार ना जाने क्यों लगता है कि इस शहर में एक बंजर सी उदासी भरी पडी है। और जब जब ये लगता है तो महसूस होता है कि मैं कहीं का नहीं रह गया हूं। इस शोर मचाती दिल्ली में कहीं भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरती चली जाती है। सब कुछ एक मशीनी…