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दिल्ली के सी.आर. पार्क में ‘मैत्री’: जहाँ बुज़ुर्ग साथ मिलकर बुढ़ापे का अर्थ बदल रहे हैं

दिल्ली के सी.आर. पार्क (Maitri senior citizens club) की इमारत के एक बैग्राउंड में हर शुक्रवार एक अलग तरह की हलचल होती है। एक कमरे में धीरे-धीरे लोग जुटते हैं—ज़्यादातर 60 साल से ऊपर के। कोई छड़ी के सहारे आता है, कोई किसी का हाथ थामे।

कुछ देर बाद, यही कमरा हँसी, बातचीत, संगीत और हल्की-हल्की हरकतों से भर जाता है। यह “मैत्री” है—वरिष्ठ नागरिकों का एक समूह, जो बुढ़ापे के अकेलेपन के बीच एक साझा जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।


विस्थापन से लेकर साथ तक की कहानी (Maitri Senior citizens club)

सी.आर. पार्क को कभी पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थियों की बस्ती के तौर पर बसाया गया था। “मैत्री” से जुड़े कई लोग उन्हीं परिवारों से हैं। विस्थापन की यादें, नए शहर में खुद को फिर से बसाने की कोशिश—यह सब उनकी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है।

अब, दशकों बाद, वे एक बार फिर एक नए तरह के खालीपन से जूझ रहे हैं—बुढ़ापे का अकेलापन। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रधानाचार्य रही भारती सरकार बताती हैं, “मैत्री का मतलब ही दोस्ती है। यहाँ आकर हम पक्के दोस्त बन जाते हैं। अब हम हर शुक्रवार का इंतज़ार करते हैं। लगता है इनसे मिलेंगे-उनसे मिलेंगे। यहाँ आकर योग करते हैं. कहानियों के ज़रिए याददाश्त चेक करते हैं”

Image of First Lady air marshal of India Padma Pandopadhyay
भारत की पहली महिला एयर मार्शल पद्मा बंदोपाध्याय मैत्री गोल्डन गैदरिंग में

भारती के जैसे ही पद्मा बंदोपाध्याय भी यहाँ लगातार आती हैं, मैत्री को वो सिर्फ़ एक क्लब नहीं बल्कि अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखने का माध्यम भी मानती हैं.  पद्मा भारत की पहली महिला एयरमार्शल रही हैं और अब उम्र के इस पड़ाव पर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने के लिए वो क़रीब दो घंटे का सफ़र तय कर यहाँ मैत्री इन कार्यक्रमों में शिरकत करने आती हैं.

पद्मा कहती हैं, “यहाँ संगीत होता है, खाना होता है, डांस होता है जिससे हम अपनी बंगाली जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. संस्कृति किसी भी समूह या समुदाय के लिए बहुत ज़रूरी है उसके बिना हम अपना अस्तित्व बचाए हुए नहीं रख सकते. मैत्री के ज़रिए हम यही कर रहे हैं”


कुर्सियों पर बैठा योग, लेकिन इरादे मज़बूत

कमरे के एक कोने में चंद्रा मलिक योग सिखा रही हैं। यह कोई पारंपरिक योग क्लास नहीं है। ज़्यादातर लोग कुर्सियों पर बैठे हैं। घुटनों का दर्द, शरीर की जकड़न और उम्र की सीमाएँ हर हरकत में दिखती हैं। फिर भी, सभी अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार हाथ उठाते हैं, साँसों को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

चंद्रा कहती हैं, “उम्र चाहे जो हो, अपने शरीर से प्यार करना ज़रूरी है।” यह अभ्यास सिर्फ़ शारीरिक नहीं, मानसिक भी है—अपने बदलते शरीर को स्वीकार करने की एक प्रक्रिया।


नृत्य और संगीत: पहचान को थामे रखने की कोशिश

Image of Debjani and Ullas Bhattacharya singing
देबजानी और उल्लास भट्टाचार्य

कुछ देर बाद माहौल बदल जाता है।  मधुलिका चटर्जी बंगाली शास्त्रीय नृत्य के कुछ स्टेप्स पेश करती हैं। हर कदम में सावधानी है, लेकिन साथ ही आत्मविश्वास भी।

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यहाँ इस कमरे में कुछ देर में बंगाली शास्त्रीय संगीत की धुन गूंजने लगती है. एक महिला की उँगलियाँ हारमोनियम पर थिरक रही हैं और उनके मधुर कंठ से निकलती रबीन्द्र संगीत की धुन हवा में गूँज रही हैं. ये शास्त्रीय संगीत गायिका देबजानी भट्टाचार्य हैं. देबजानी बताती हैं, “यह संगीत इन बुजुर्ग महिलाओं के लिए एक तरह से म्यूज़िक थेरेपी का काम करता है. शुरुआत में जो महिलाएं बहुत हिचकती थी उनमें से कई अब अच्छा गाने लगी हैं.”

देबजानी के पति उल्लास भट्टाचार्य भी गाने का शौक रखते हैं, वो भी देबजानी के साथ एक जुगलबंदी पेश करते हैं. उल्लास बताते हैं, “हम जो गाने गा रहे थे वो 1950 के आस-पास के दौर के गाने हैं। तब के गाने ये साथ-साथ गाते हैं जो इनके लिए नॉस्टेल्जिया हैं. इन्हें गाना इन महिलाओं के लिए एक तरह से ताज़ा हवा में साँस लेने जैसा भी है.”

📺 इस कहानी को वीडियो में देखने के लिए यहाँ क्लिक करें:

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खाना: यादों का स्वाद

Chandra Malik and Madhulika Chatterjee
मैत्री की होस्ट और फाउंडर चंद्रा मलिक के साथ मधुलिका चटर्जी

यह बंगाली नव वर्ष या ‘पोइला बैशाख’ का मौक़ा है. ज़ाहिर है कार्यक्रम के बीच में पारंपरिक बंगाली भोजन परोसा जाता है। लोग साथ बैठकर खाते हैं, बातें करते हैं, हँसते हैं। यहाँ मौजूद मधुलिका चटर्जी बताती हैं, “पोइला बैशाख एक हार्वेस्ट फ़ेस्टिवल है. तो आज यहाँ सूजी का हलवा, दो तरह के फ़्रिटर्स हैं और एक टिपिकली बंगाली मिठाई मालपुआ भी है.”

होस्ट चंद्रा मलिक बताती हैं, “क्योंकि ये फेस्टिवल हार्वेस्ट से जुड़ा है तो जो चीज़ें इस सीज़न में उगती यहाँ मौजूद भोजन मैंनें उन्ही से बनाया है. इसमें कद्दू है, बैगन है. आलू, फूलगोभी भी है. बंगालियों में कालू जीरा का इस्तेमाल बहुत होता है. बंगाल राइस ग्रोइंग प्रदेश है तो यहाँ चावल की बनी चीज़ें भी आपको मिलेंगी, जैसे हमारे यहाँ पीठा बनता है. यहाँ इस टेबल पर खाने के ज़रिए भी हम अपने भीतर बंगाल को जीवित रखने की कोशिश करते हैं.”

साफ़ है, यह सिर्फ़ भोजन नहीं, बल्कि एक साझा स्मृति है—घर का स्वाद, जो कई लोगों के लिए अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कम हो गया है।


अकेलेपन के बीच समुदाय की ज़रूरत

Bharti Sarkar

भारत में बुज़ुर्ग आबादी लगातार बढ़ रही है। शहरी जीवन में परिवार छोटे हो रहे हैं और काम की व्यस्तता बढ़ रही है। ऐसे में, बुज़ुर्गों के लिए सामाजिक जुड़ाव बनाए रखना एक चुनौती बनता जा रहा है। “मैत्री” जैसे समूह इस कमी को भरने की कोशिश करते हैं।

यहाँ आने वाले कई लोग बताते हैं कि इस समूह से जुड़ने के बाद उनकी दिनचर्या बदली है, अकेलापन कम हुआ है और मानसिक रूप से वे खुद को बेहतर महसूस करते हैं। भारती सरकार कहती हैं, “बुढ़ापे में हम अक्सर छोटी-छोटी चीज़ें भूल जाते हैं, लेकिन यहाँ सब एक जैसे हैं तो कई बार हम एक दूसरे को बताते हैं कि आज ये भूल गए-वो भूल गए और उन बातों पर साथ मिलकर हँसते हैं. सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि हम, बुढ़ापे के इन बदलावों को स्वीकार करें, उनके प्रति जागरूक हों”

सी.आर. पार्क के इस छोटे से कमरे में होने वाली ये मुलाक़ातें किसी बड़े आयोजन का हिस्सा नहीं हैं। लेकिन इनके भीतर एक बड़ी कहानी छिपी है—
कि बुढ़ापा सिर्फ़ अंत नहीं, एक नया चरण भी हो सकता है और शायद, इस चरण को जीने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है—साथ।


यह रिपोर्ट यात्राकार कल्चर प्रोजेक्ट – दिल्ली चैप्टर के तहत तैयार की गई है, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी मानवीय कहानियों को सामने लाने की कोशिश की जा रही है।

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