ऐपण की कलाकारी से अपने भविष्य में रंग भरती उत्तराखंड की ये महिलाएं
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल की सांस्कृतिक धड़कन कही जाने वाली ऐपण (Aipan art of Uttarakhand) कला महज एक सजावट नहीं, बल्कि इसकी जड़ें वहाँ की संस्कृति में गहरे तक फैली हुई हैं. आमतौर पर लाल और सफ़ेद रंगों में बनाई जाने वाली यह स्थानीय कला संस्कृत के शब्द ‘अर्पण’ से उपजी है और शादी, पूजा जैसे घर के हर शुभ कार्य में ऐपण बनाने का रिवाज़ सदियों से चला आ रहा है.
भारत के विभिन्न कोनों में अल्पना (बंगाल), कोलम (दक्षिण भारत) या मांडणा (राजस्थान) के रूप में पहचानी जाने वाली इस परंपरा का हिमालयी स्वरूप अपने आप में विशिष्ट है, जिसे इसकी मौलिकता के लिए सितंबर 2021 में GI Tag भी मिल चुका है. ऐपण का सांस्कृतिक महत्व तो है ही लेकिन दार्शनिक तौर पर भी माना जाता है कि इस कला का दर्शन एक ‘बिंदु’ (Bindu) से शुरू होता है, जो ब्रह्मांड के केंद्र का प्रतिनिधित्व करता है, और वहीं से उभरती रेखाएं संसार के परिवर्तनशील स्वरूप को उकेरती हैं.
पीढ़ियों से महिलाओं द्वारा अपनी उंगलियों के पोरों से घर की देलियों (देहरियों) और पूजा-स्थलों पर उकेरी जाने वाली यह कला आज अपनी पारंपरिक सीमाओं को लांघकर स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण का एक नया अध्याय भी लिख रही है.
यामिनी की नज़र में ऐपण परंपरा और नवाचार का संगम है (Aipan art of Uttarakhand)

कोई कला कैसे आगे बढ़ती है, बढ़ती भी है या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे आगे बढ़ाने के लिए क्या नवाचार किए जा रहे हैं. ‘यामिनी ऐपण कलाकार’ के नाम से अपनी पहचान बनाने वाली यामिनी ने इस चुनौती को अवसर में बदला है. वे बताती हैं कि पहले ऐपण केवल मंदिर की देलियों, घर की चौखटों और ओखल जैसी पारंपरिक जगहों तक ही सीमित थे लेकिन उनको बनाने के पीछे वैज्ञानिक आधार थे. “मिट्टी की लिपाई और गेरू के इस्तेमाल से कीटाणु घर में नहीं आते थे, ये दोनों ही चीज़ें कीटानुरोधक की तरह भी काम करती थी.” यामिनी कहती हैं.
लेकिन वक़्त के साथ ऐपण में इस्तेमाल होने वाले चीज़ों में बदलाव भी आया. यामिनी कहती हैं, “बाद के दौर में मिट्टी और गेरू की जगह ऑइल पेंट और एक्रेलिक कलर्स का इस्तेमाल भी होने लगा और ऐपण कला को सिर्फ़ घर की चौखटों की जगह अलग-अलग सजावटी चीज़ों में भी उकेरा जाने लगा.”
यामिनी ने इस कला को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने के लिए इसे वॉल हैंगिंग्स, की-होल्डर्स, डायरी, केटल्स और कप्स पर उकेरा है. उनके द्वारा तैयार किए गए नौ देवियों के पैनल और अल्मोड़ा के ऐतिहासिक कटारमल सूर्य मंदिर की कलाकृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.
वे कहती हैं, “हमें अपनी चीजों में नवाचार की बहुत ज़रूरत है, तभी बाहर के लोग और नई पीढ़ी इससे जुड़ पाएंगे”. यामिनी की मानें तो अपनी जड़ों की ओर लौटना न केवल आध्यात्मिक रूप से सकारात्मकता लाता है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए दरवाज़े भी खोलता है.
राखी मानती है कि ऐपण को मूल स्वरूप में बचाना है ज़रूरी (Aipan art of Uttarakhand)

जहाँ बाजार सिंथेटिक रंगों से भरा है, वहीं राखी जैसी कलाकार ऐपण की प्राचीन शुद्धता को बनाए रखने के लिए संकल्पित हैं. उनकी कला का आधार पूरी तरह प्राकृतिक है—वे कपड़े पर गाय के गोबर और गोमूत्र का लेप लगाती हैं और फिर उसे गेरू मिट्टी से लाल रंग प्रदान करती हैं.
राखी द्वारा उपयोग किए जाने वाले रंग उनकी कला को ‘ईको-फ्रेंडली’ और जीवंत बनाते हैं. वे अपनी बनाए चित्रों को दिखाते हुए कहती हैं, “यह चावल को पीसकर उसके बिस्वार (Bisvar) से बना हुआ ऐपण है और इसमें जो रंग हैं वो भी सब नेचुरल हैं, जैसे चुकंदर (Beetroot), हनुमान जी का सिंदूर, काजल और हल्दी”.
उनका यह तरीका दिखाता है कि कैसे पारंपरिक ज्ञान आज के ‘सस्टेनेबल’ फ़ैशन और सजावट के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है.
संघर्ष से स्वावलंबन: प्रियंका का रास्ता

रानीबाग की प्रियंका की कहानी उस संघर्ष और जीवट की है जो पहाड़ की महिलाओं की पहचान है. पिछले 5 सालों से इस क्षेत्र में पेशेवर रूप से सक्रिय प्रियंका ने पारिवारिक चुनौतियों के बीच अपने बचपन के हुनर को बाज़ार तक पहुँचाने का फैसला लिया. प्रियंका बताती हैं कि ऐपण की विधा में प्रोत्साहन के लिए उन्हें एनआरएलएम (NRLM) जैसे सरकारी मंचों की मदद मिली जिससे वो अपने उत्पादों को ज़्यादा लोगों तक पहुँचा पाई.
आज प्रियंका न केवल पारंपरिक चौकियाँ बना रही हैं, बल्कि नेम प्लेट्स, घड़ियाँ और ‘ईविल आई’ जैसे उत्पादों के ज़रिए ऐपण को नए दौर के सजावटी सामानों का हिस्सा बना रही हैं. प्रियंका कहती हैं, “महिलाओं का इस तरह संगठित होकर काम करना पहाड़ों में पलायन को रोकने और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए भी अच्छा है.”
ऐपण की कला में भविष्य की सम्भावनाएँ

इन महिला उद्यमियों के प्रयासों को मीनाक्षी खाती और रुचि नैनवाल जैसे कुशल कलाकारों और ‘सेल्फी विद ऐपण’ जैसे अभियानों से भी बल मिल रहा है, जो नई पीढ़ी को इस विरासत से जोड़ रहे हैं. उत्तराखंड सरकार द्वारा सार्वजनिक भवनों में ऐपण कलाकृतियों की अनिवार्य खरीद और ‘चेली ऐपण’ जैसी योजनाएं भी इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो रही हैं.
यात्राकार के यूट्यूब चैनल पर मौजूद इस वीडियो में सुनें इन महिलाओं की राय
कुल मिलाकर ऐपण की यह कला अब केवल गेरू और बिस्वार का मेलभर नहीं रह गई, बल्कि यह उत्तराखंड की महिलाओं के आत्मविश्वास, उनकी कलात्मक दृष्टि और आर्थिक स्वतंत्रता का पर्याय भी बन रही है. स्थानीय कलाकारों और उनके हस्तनिर्मित उत्पादों को बढ़ावा देना न केवल कला का संरक्षण है, बल्कि उस संस्कृति को जीवित रखना है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है.
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