मुंबई डायरी

आंखिर किनकी शय पर चलती है रेल ?

(Last Updated On: January 2, 2022)

Mumbai Diary  16 ( Jun 2013 )

मुम्बई में हूं और खफा हूं। खफा हूं कि देश की आर्थिक राजधानी में बैठा देश के नैतिक दिवालियेपन का शिकार हो रहा हूं। देश के राजनैतिक खोखलेपन का हिस्सा बन रहा हूं। अप्रैल की 22 तारीख को मुम्बई आया था। तब देखा था कि कितनी मुश्किल से ट्रेन की वेटिंग क्लियर हुई थी। और ये भी कि जिस कोच में था उसमें एक लम्बी दूरी तक दो बर्थ खाली पड़ी रही थी। 4 तारीख की वापसी की टिकिट थी। जिसकी अन्तहीन वेटिंग क्लियर नहीं हो पाई। तबसे अब तक लगातार भारतीय रेलवे की उस नक्कारा वैबसाईट से टिकिट कराने की कोशिश कर रहा हूं जिसपर भ्रष्टाचार की न जाने कितनी परतें चढ़ी हुई हैं। सुबह पौने 10 बजते ही किसी तरह भरोसा बटोर कर लौगइन करता हूं , और ग्यारह बजे तक जब उस मरियल रफ्तार से चल रही वैबसाईट से एक टिकिट तक हासिल नहीं होता तो वो भरोसा टुकड़ा टुकड़ा हो जाता है।

आईआरसीटीसी नाम की ये वैबसाईट उस बड़ी जालसाजी का ऑनलाइन प्रमाण है जिसके चलते देश के हर हिस्से के न जाने कितने लोग यात्राओं से खौफ खाने लगे हैं। देश के लोगों को घर बैठे ट्रेन के टिकिट मुहैय्या कराने का ढ़ोग रचती इस बैवसाईट को देखकर अब कोफ्त होने लगी है। कोफ्त होने लगी है उस व्यवस्था से जहां एक आम आदमी के लिये इस अनचाही कोफ्त को बेमतलब अपनी जिन्दगी का हिस्सा बनाने सिवाय कोई चारा नहीं है। दलालों के इस देश में मलालों का एक सिलसिला है जो कभी नहीं थमता। इस बात का मलाल कि जो काम एक क्लिक पे हो जाना चाहिये, आदमी जब आम तरीके करता है तो वो काम घंटों में नहीं होता।

इस बात का मलाल कि दलाल उस काम को मिनटों में लिपटा लेते हैं। आम आदमी के हिस्से के टिकिट बटोर लेते हैं और फिर आम आदमी को वही टिकिट दो गुने, तीन गुने जितनी मरजी उतने गुने दामों में देते हैं। आम आदमी की मजबूरी है कि अगर उसकी यात्रा ज़रुरी है तो उसे दलालों की इन मुंहमांगी कीमतों के सामने झुकना होगा। इस वैबसाईट के जरिये देश का रेलमंत्रालय सरेआम अपने ज़मीर की नीलामी कर रहा है और एक यात्री अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को अपनी यात्राओं में पानी की तरह बहाने के लिये मजबूर है। यातायात माफियाओं की शरणगाह है ये वैबसाईट, जानते सब हैं, कर कोई कुछ भी नहीं सकता।

यहां मुम्बई में बैठे लखनऊ की वापसी ऐसी लग रही है जैसे दूसरे देश में हों आप और आपके वीज़ा की मियाद पूरी हो गई हो। सरकार दूसरे देश की हो, अफसरशाही दूसरे देश की हो, जिन्हें आपकी ज़रुरतों और सुविधाओं से दूर दूर तक कोई सरोकार ही न हो। सुना है कि रेल की दलाली के इस खेल में बटोरी जाने वाली सारी काली कमाई मंत्री को जाती है और मंत्री उसका बड़ा हिस्सा पार्टी फंड में डाल देता है। मतलब ये कि राजनैतिक दलों के ये जो आलीशान महल बन रहे हैं, चुनावों में आपके प्रत्याशी ये जो पैसे बहा रहे हैं, ये मुख्यमंत्री जो स्वयंभू बनकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से किराये का सम्मान पाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं, ये मुझ जैसे आम आदमी की जेब से जा रहे उस अतिरिक्त पैसे से हो रहा है। दलाल तो बस मोहरे हैं असली दलाल ये सफेदपोश लोग हैं जिनके कुर्ते की सफेदी के पीछे के दाग कभी चारे, तो कभी कोयले की शक्ल में आये दिन नुमाया होते रहते हैं।

यात्रा की प्रत्याशा में इन्टरनेट के सामने बैठे देश के करोड़ों लोगों के दिलों में नही झांक सकते आप पर कभी फेसबुक जैसी वैबसाईट पर आईआरसीटीसी के पेज देखिये। एक भी कमेंट ऐसा नहीं है जिसमें ये गुस्सा कूट-कूट कर न भरा हो। आपको स्टेशन पर लगने वाली लम्बी लाईनों से बचाने के लिये ये जो ढ़ोंग किया था सरकार ने उसके चलते अब स्टेशनों के टिकिट काउन्टरों का हाल और बुरा हो गया है।

पिछली बार पापा मम्मी मुम्बई आये थे तो उन्हें अचानक वापस जाना पड़ा। उस बार मुम्बई के भान्डुप स्टेशन का वो हाल देखने का मौका मिला। किसी ने कहा कि रात के बारह बजे से सुबह दस बजे मिलने वाले तत्काल टिकटों की लाईन लगनी शुरु हो जाती है। यकीन नहीं हुआ था तब। रात के दो बजे स्टेशन पहुंचा तो यकीन आया। देखा कि वहां एक आदमी है जो लिस्ट बना रहा है। बहुत सारे लोग हैं जो काउन्टर के आगे बने उस अहाते में कम्बल बिछाये लेटे हुए हैं। लिस्ट में मेरा नम्बर 20 था। रातभर वहीं कटी थी उस दिन। ये अनुभव लेना चाहता था मैं। मेरी मजबूरी नहीं थी। पर वहां ज्यादातर लोग ऐसे थे जिनके लिये ये यात्रा एक मजबूरी थी। किसी का एक्ज़ाम था, किसी का बेटा बीमार था, एक बूढे अंकल के बेटे की मौत हो गई थी उन्हें उसके दाह संस्कार के लिए जाना था। हर दो घंटे में अटेंडेंस ली जा रही थी। रेल विभाग इस पूरी प्रणाली में यात्रियों के साथ कहीं नहीं था।

सुबह काउन्टर खुला और उस लिस्ट में जिसका जो नम्बर था उस हिसाब से लोगों ने टिकिट खरीदी। आख़िरी नम्बर वाले कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें रातभर मच्छरों के सिरहाने लेटने का कोई फायदा नहीं हुआ। उन्हें अगली रात फिर इस अहाते में मच्छरों के सिरहाने जगराता करना था बस इसलिये कि एक टिकिट मिल जाये, मुफ्त में नहीं, खैरात में नहीं, टिकिट की पूरी कीमत चुकाकर।   अबकी मंत्री जी भ्रष्टाचार के आरोप में है तो कोई कोटा भी काम नहीं कर रहा। ऐसे में सुना है कि दलालों ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। सुधरा कुछ नहीं है। 10 बजते ही वैबसाईट को दलाली का सांप सूंघ जाता है। ये हालात कैसे सुधरेंगे, इसके लिये हम जैसे आम आदमी आंखिर क्या कर सकते हैं, इस राजनैतिक दीमकों की वजह से पनपे नागरिकों के असहायों के से हालातों का अन्त आंखिर कैसे होगा ये आठ दिन यही सोचते गुजर गये हैं। पर इसका व्यावहारिक हल दूर दूर तक नज़र नहीं आता।

खैर रेल की इस रेलमपेल से इतर इन आठ दिनों में मुम्बई को किसी बीच के स्टेशन में एक अनिश्चित समय के लिये ठहरे हुए किसी यात्री की नज़र से देखा है। मुम्बई का असल फील अब अंधेरी के यारी रोड में काॅस्टा काॅफी से ब्रू वर्ड कैफे के बीच मौजूद उस सड़क के इर्द गिर्द वाले इलाके में ही आता है। वर्सोवा के समुद्री तट के किनारे बसे उस इलाके में कई जाने पहचाने चेहरे जो नज़र आते हैं। कुछ चेहरे जिन्हें कभी टीवी पे तो कभी फिल्मों में देखा होगो, कुछ चेहरे जिनके साथ पढ़ाई की है, कुछ चेहरे जिनके साथ काम के सिलसिले में जुड़े हैं। मुम्बई में रिहाइश के इस अरसे में अब तक प्रोफेश्नल होना नहीं सीखा है, अपने पेशे की सबसे अच्छी बात यही है कि इसमें भावनाओं की अब भी कद्र है। मुगालते पालना यूं भी लेखकों का शगल होता है और अगर ये मुगालता है भी तो इसके साथ जीने में कोई गुरेज नही है, ये शहर मुम्बई कम से कम मुगालते पालने की मोहलत तो देता है।

वर्सोवा के किनारे बनी छोटी-छोटी पथरीली चट्टानों में खड़े होकर, शाम के लाल होते सूरज की तलहटी में लहराते उस असीम समन्दर को देखते हुए यही लगता है कि जैसे वो समन्दर हमारी आंखों में बह रहा एक सपना हो। जिसमें बार बार उम्मीदों की लहर उठती हो। बार बार सम्भावनाओं की हवा इन लहरों से टकराकर पूरी मासूमियत के साथ हौले हौलेे चेहरे पर पड़ती हो। इस समुद्री सपने में गोता लगाने के लिये तैरना सीखना ज़रुरी है। अच्छी बात यही है कि ये समन्दर तैरना सीखने की चाह मुफ्त में बांटता है और मुम्बई इस सपनों के समन्दर को बहुत पास से जीभर कर देख पाने की आज़ादी देता है।

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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One Comment

  1. सच irtc site बहुत रुलता है, रुलाता है, झल्लाता है … भरोसे लायक नहीं फिर भी मजबूरी में फिर फिर वही login करना पड़ता है
    बहुत सही जागरूक कराती प्रस्तुति

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