फूल चादर की तरह लाल मिट्टी वाली उस कच्ची सड़क पर बिछे थे। रेंगती हुई चींटियां खुश थी कि बारिश के बाद ही सही उन्हें नयी सलवटें नसीब हुई. गिलहरियां आहटों का रास्ता काटती हुई सी फुदक कर कहीं दूर ओझल होती रही थी. मोर अपने पंख फैलाए धूप की अचकनें पहनकर जंगलों में खो…
बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का सपना हो गई थी.. ज़मीन अभी भी नम थी.. जैसे कभी कभी उसकी आंखें हो जाया करती हैं उसकी याद में.. उतनी ही पाक-साफ़, उतनी ही मासूम.. ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों को देखकर उसे लगा कि उसकी यादों का रंग शायद हल्का पीला होता होगा…..
उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए…
सीने में इन दिनों कभी कभी तेज़ दर्द होता है.. लगता है की पेट के अन्दर कोई जा बैठा है जो कभी कभी फेफड़ों को जोर से पकड़ लेता है और निचोड़ने लगता है.. घर के बाहर टूटी-फूटी सड़कों में बहुत सारी धूल है और पास में एक प्राइवेट अस्पताल.. हरे रंग के शीशे से बना बड़ा सा अस्पताल…..
तो इस बार की होली जेएनयू में खेली। बाबा गंगनाथ मार्ग से जेएनयू के गेट की तरफ बड़ते ही माहौल एकदम बदल सा जाता है। जेएनयू कैम्पस के भीतर रंग जैसे इन्सानों के शरीरों पर झूलते हुए नज़र आते हैं। कई तरह के रंग और उसमें सबसे गहरा रंग खुशी का। होली है हुड़दंग नहीं…
सुबह सुबह नौएडा मोड़ से गुजरते हुए सड़क के किनारे देखा तो वहां मां दुर्गा की वो मूर्ति नहीं थी, ना ही नटराज की। वहां कुछ लोग थे जो बुल्डोजर लेकर कच्ची ईंटों से बने उन कच्चे घरों को तोड़ रहे थे जहां अब तक वो कुछ लोग रहते थे, जिनका रहना वहां गैवाजिब था,…
कई बार अपने आसपास लोगों को निहायत प्रोफेश्नल होता देख डर लगता है। समझ नहीं आता कि क्या ज्यादा जरुरी है। इन्सानी भावनाओं को जिन्दा रखते हुए जीना या प्रोफेश्नल होना। जल्दबाजी, बेचेनी फलतह तुनकमिजाजी, गुस्सा। समझ नहीं आता कि क्यों कोई काम शुकून से नहीं किया जा सकता। पर सबके काम करने करवाने के…
अरे यार फोन चोरी हो गया। घर आकर बताया तो भाई लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर आई। पहली बार जब घर आकर बताया था तो ऐसा नहीं हुआ था। तब सबको लगा था कि हां कुछ चोरी हो गया। ऐसा होना नहीं चाहिये था। कैसे कोई फोन चोरी कर सकता है। जेब से निकाल…
दिल्ली की बसों में एक और बड़ा दर्दनाक वाकया हुआ। बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस हादसे में 3 रुपये की टिकट नहीं रही । दिल्ली में बसों के किराये बढ़ गये। पांच का टिकट दस का हो गया और दस का पन्द्रह में बदल गया। सात की बिसात भी अब…
हम ईदगाह पढ़ते बड़े हुए। और जब जब हामिद के चिमटे ने उसकी दादी की आंखें को खुशी से सराबोर कर दिया हमें लगा कि ईद आ गई। और आज फिर जब ईद आई है हमें हामिद की दादी याद हो आई है। उसी चिमटे उन्हीं खुशी भरे आंसुवों के साथ। जामिया में पढ़ते उसे…
दिल्ली की भीड़ भरी बसों में रोज कई वाकये होते हैं। मसलन मोबाईल या पर्स चोरी हो जाना। पर इन वाकयों को अंजाम देने वाले लोग ये काम चोरी छिपे करते हैं। उन्हें किसी का डर होता है। यह किसी शायद प्रशासन होता है, माने पुलिसिया डंडा और मार। पर जो वाकया आज हुआ उसे…
सड़क पर बसें रफ्तार से आ जा रही हैं। बस स्टॉप पर भीड़ तिलचट्टों के झुंड सी बिखरी है। एक बस आती है। रुकती है और उस पर लोग टूट पड़ते हैं। जैसे जल्दबाजी एक जरुरत हो जिसके पूरा न होने पर सम्भवतह जिन्दगी थम सी जाएगी। लोग इस भीड़ में खुद को सबसे ज्यादा…
हम एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं जहां पे आपको बोलने सुनने और यहां तक कि सोचने के लिए भी एक दायरा तय कर लेना होता है। क्या सोचें क्या कहें और क्या करें इस सब के इर्द गिर्द एक बड़ी लोहे की कांटेदार जंजीर लिपटी हुई है। एक छोटी सी भूल उस…
कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज…
[dropcap]न[/dropcap]दियां हमेशा उस जगह को एक संस्कृति देती हैं जहां वो बह रही होती हैं। नदियों के साथ एक पूरा जीवन और उस जीवन के बरक्स लोगों की दैनिक जीवनचर्या भी नदियों से जुड़ जाती है। चाहे वो बनारस या हरिद्वार के घाट हों या किसी छोटे से गांव के किनारे बह रही अनजान से…
कई बार ना जाने क्यों लगता है कि इस शहर में एक बंजर सी उदासी भरी पडी है। और जब जब ये लगता है तो महसूस होता है कि मैं कहीं का नहीं रह गया हूं। इस शोर मचाती दिल्ली में कहीं भीतर एक अजीब सी खामोशी पसरती चली जाती है। सब कुछ एक मशीनी…