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राहे सुकून है संजय वन

(Last Updated On: October 16, 2019)

उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष में लगे हों. कुछ देर यूं ही मचान के पास ही के उस मखमली घास के मैदान में लेटे रहे. आसमान से गिरती धूप को चेहरे पर पड़ने से बचाने के लिए वहीं खड़े एक पेड़ ने अपनी पत्तियों के आँचल को फैला दिया. और हवा उस आंचल को अपने हाथों में लेकर पंखा करती रही कुछ देर. घास किसी छोटे बच्चे की उंगलियों की तरह गुदगुदी करती रही. दूर से क़ुतुब मीनार यह सब देखकर हमसे जल भी रही हो शायद .

उसे देखा तो कहने का मन किया … “अब तक कहां थे तुम दोस्त?”. पर क्या वो सुन भी पाता ? कई बार भावनाएं कह पाने के बिना साझा नहीं हो पाती और कई बार सुन पाने के बिना अनकही सी रह जाती हैं. कई बार ऐसा भी होता है कि कहने-सुनने के बावजूद उन भावनाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाता. ये मामला सचमुच बहुत जटिल है.

उसके बारे में क्यूं पता नहीं चल पाया था अब तक ? मेरे घर से करीब दो सौ मीटर आगे एक बायां मोड़ जाता है. वही बांया मोड़ जिस तरफ जाने की गरज कभी हुई ही नहीं. मुझे अब तक यही लगा था कि ये एक डेड एंड है. ‘डेड एंड’ ये लफ्ज़ भी पहली बार शहर आकर ही सुना था. वर्ना तब तक यही लगता था कि  ख़त्म कहां होते हैं वो, रास्ते निकल ही तो आते हैं. ऐसा क्यूं नहीं हुआ कि कभी देख भर आया जाए कि आंखिर क्या है उस तरफ. एक पड़ौसी रास्ते को ऐसे कैसे नज़रअंदाज़ कर दिया था मैंने. पूरे २ साल हो गए यहां रहते, आते-जाते. इन दो सालों में आखिर क्यूं उस कच्चे रास्ते पर कभी यूं ही नहीं चला गया मैं. इतनी बेखबरी क्यों सीख रहे हैं हम ? सब ही ऐसे ही हैं इस शहर में या फिर मैं ही ऐसा हो गया हूं ?

हाल ही की बात है एक टेलीकॉम कंपनी का वो लड़का पोस्टपेड कनेक्शन के लिए वेरीफिकेशन करने आया और उसने पूछा – “सर अपने किसी एक पड़ौसी का नाम बताइये”. और धत मेरे पास जवाब नहीं था. मुझे अपने एक भी पड़ौसी का नाम नहीं पता. यही मेरे इस शहरी वजूद का ईमानदार और घटिया सच है. पड़ौस में लोग आते हैं और चले जाते हैं. न उनके आने से फर्क पड़ता है, न उनके चले जाने का पता लगता है. कभी कभी जब तेज़ आवाज़ में कोई गाना पड़ौस के किसी घर से सुनाई देता है तो उस गाने के बोल ये अंदाज़ा दे जाते हैं कि उस पड़ौसी का मिजाज़ कैसा होगा. कभी ऊपर-नीचे आते जाते एक आध लोग दिख जाते हैं तो हाई-हेल्लो भी मुश्किल से होती है. लिफ्ट में कभी कोई साथ अटक जाए तो अक्सर सर झुकाकर अपने-अपने मोबाइल में कुछ-कुछ स्क्रोल करने लगते हैं. जैसे मोबाइल की स्क्रीन पर किसी ऐप के हवाले से अपने उस वक्त को उंगली से मिटा रहे हों. कोई गलती से मुस्कुरा दे तो भरोसा सा नहीं होता. बड़े झिझकते हुए एक नकली सी मुकुराहट होंठों तक पहुंचती है. कभी पड़ौस से कोई अखबार की पुड़िया बनाकर उसमें बताशे, खिल, मिठाईयां लेकर नहीं आता कि भिटौला आया है. होली की गुजिया कभी किसी को देने हम भी तो नहीं जाते.

पड़ौस के घर में एक बच्ची हुई थी अभी कुछ महीने पहले. इससे पहले जब उस महिला को देखा था वो प्रेग्नेंट थी. फिर उसके बाद कल उन्हें देखा- बच्चा इतना बड़ा हो गया था कि अपने झूले वाली गाड़ी (पैराम्बुलेटर) में बैठा मुझे टकटकी लगाए देख रहा था. पहचानना चाहता था शायद, कहना चाहता हो जैसे- “कौन हो तुम, पहले तो कभी नहीं देखा तुम्हें. इतना बड़ा हो गया हूं मैं. हमारे और तुम्हारे दरवाजे के बीच तीन मीटर का भी अंतर नहीं है डैम इट. कहां थे अब तक. घर घुस्सू.. मिलने में पैसा खर्च होता है क्या ?” उसने कुछ भी तो नहीं कहा. उसे मुंह से बोलना ही नहीं आता अब तक. वो बस आँखों से ही बोलना सीख पाया है. कुछ देर देखने के बाद बस मुस्कुरा भर दिया. “फिर से मिलना, मिलना अच्छा लगता है”. उसकी मुस्कराहट के यही तो भाव थे.

खैर मैं कहां था? अपने घर से कुछ आगे बांयी तरफ जाती उस कच्ची सड़क पर जिससे एक दिन ऐसे ही मेरी मुलाक़ात हो गई थी. मेरे दोस्त रोहित ने उससे मेरा पहला परिचय कराया. ये उससे मुलाक़ात का पहला दिन था. हम एक कच्ची सड़क पर बढ़ रहे थे कि वहां से एक संकरी पगडंडी दांयी तरफ मुड़ी. उसी पगडंडी पर चलते हुए मैंने पूछा- “जा कहां रहे हैं?” तो रोहित ने कहा- “तुम चलो तो, दिल खुश हो जाएगा”. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते रहे दिल सचमुच खुश होता रहा. चिड़ियों के चहचहाने की वही जानी पहचानी सी आवाज़ कानों में आने लगी थी जिसे सुने हुए कई दिन हो गए थे. दूर कहीं एक मोर भी उड़ता हुआ दिखाई दे गया. फिर एक चौड़ा कच्चा लाल मिट्टी वाला रास्ता जिसपर घने पेड़ों के बीच से छनती हुई रोशनी गिर रही थी. उस रोशनी की एक लम्बी हल्की पारदर्शी सी रेखा पेड़ की बीच से होती हुई जमीन को छू रही थी. अगल-बगल में जामुनी, गुलाबी, बैगनी फूलों वाले पेड़ भी थे जिनकी पत्तियां पगडंडियों पर बिखरकर, सुबह की एकदम ताज़ा रोशनी से धुली हुई पगडंडियों को और खूबसूरत बना दे रही थी.

हम बढ़ते जा रहे थे. उस घने जंगल के बीच कई सारी पगडंडियां थी जो लोगों के दौड़ने के लिए बने चौड़े रास्तों को बीच बीच में जोड़ रही थी. गाड़ियों का मशीनी शोर जैसे पेड़ों की जड़ों में कहीं जज़्ब हो गया हो. एक नाला था जो झील की तरफ ले जा रहा था. बीच-बीच में कहीं छोटे-छोटे लकड़ी के बने पुल थे. कुछ पार्क थे जिनमें लोग कसरत कर रहे थे. कुछ अपने कुत्तों को घुमाने चले आये थे. कुछ अधेड़ उम्र के जोड़े बेंचों पर बैठे अपनी शादीशुदा ज़िंदगी के बीच रोमांस की संभावनाएं अब भी तलाश रहे थे. कई मज़ारे थी वहां और कुछ मंदिर भी. पर न कोई हिन्दू था न मुसलमान. सबके मिजाज़ पर इस वक्त एक ही रंग का चोला था. वो रंग इत्मिनान का था. दूर कहीं एक फुर्सत थी जो मुस्कुराते हुए सभी को देखे जा रही थी.

कुछ मचानें भी थी जिनमें से एक पर चढ़कर हमने किलोमीटरों में फैले उस गोलाकार विस्तार में संजोये जंगलों को देखा. उस जंगल की परिधि से लगी छोटी-बड़ी इमारतें ऐसी लग रही थी जैसे किसी शांत सी झील को कंटीले तार-बाढ़ से घेर दिया गया हो. जैसे पूरा शहर धीरे धीरे इस जंगल को अपने चंगुल में घेर रहा हो..लील जाने के लिए और हज़ारों पेड़ इस घेरे में सिमटे हुए अपने बचे रहने के लिए जी-तोड़ संघर्ष में लगे हों. कुछ देर यूं ही मचान के पास ही के उस मखमली घास के मैदान में लेटे रहे. आसमान से गिरती धूप को चेहरे पर पड़ने से बचाने के लिए वहीं खड़े एक पेड़ ने अपनी पत्तियों के आँचल को फैला दिया. और हवा उस आंचल को अपने हाथों में लेकर पंखा करती रही कुछ देर. घास किसी छोटे बच्चे की उंगलियों की तरह गुदगुदी करती रही. दूर से क़ुतुब मीनार यह सब देखकर हमसे जल भी रही हो शायद .

और ऐसे में हम दिल्ली में ही थे ये यकीन करना मुश्किल हो रहा था. पर हां हम दिल्ली के ही उस तकरीबन दस किलोमीटर के अहाते में फैले जंगल में थे जिसका नाम संजय वन है.

10 वर्ग किलोमीटर के विस्तार में फैला ये जंगल अरावली की श्रृंखला का हिसा है. हिंगोट, कीकर, पलाश, बेर, नीम, अमलतास, बांस और अरनी जैसे कई किसमों के पेड़ इस जंगल में फैले हुए हैं. नील गाय कहीं मटकती हुई आपको दिख सकती है. अगर आप पहचानते हैं तो कई प्रजातियों के पक्षी किसी अबूझ भाषा में बतियाते मिल जाएंगे.

शहर की रुखाई से और यहां की दूषित हवा में फैले उदासियों के कुपोषण से कुछ देर को निजात पाना चाहते हैं तो संजय वन की तरफ रुख कर सकते हैं. यहां के कच्चे रास्ते आपको को एक आभासी ही सही पर घर लौटने सा अहसास कुछ देर के लिए करा देंगे. सुबह उठना इस अनुभव के लिए एक लाजमी सी शर्त होगी. यहां की शाम की अपनी अलग ही खूबसूरती है. थोड़ा रिस्की हो सकता है आपके लिए पर हम तो रात में भी हो आये हैं. और अहसास कर आये हैं कि जंगल में रहने वाले जीव अगर आपको खतरा समझने की भूल ना करें तो वो आपके लिए खतरा नहीं बनते. रात के बारह बजे मचान पर खड़े होकर जंगल की खामोशी को रात के अँधेरे में लिपटे हुए देखना एक अलग अनुभव है.

दिल्ली में रहकर दिल्ली से कहीं दूर निकल जाना चाहते हों तो संजय वन से बेहतर ठिकाना शायद ही कोई आपको मिले.

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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