Vah bhi koi des hai maharaj travelogue by Anil Yadav

अनिल कुमार यादव की निगाह से ऐसा दिखता है पूर्वोत्तर भारत

Writer Anil Kumar Yadav

अनिल कुमार यादव हिंदी कथा और यात्रा साहित्य का जाना-माना नाम हैं. उनकी सबसे ज़्यादा चर्चा जिस यात्रा वृत्तांत के लिए हुई उसका नाम है – वह भी कोई देस है महाराज (Vah bhi koi des hai maharaj travelogue). उन्होंने पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में बेहद अव्यवस्थित और रोमांच से भरी यात्राएँ की और जो देखा उसे कलात्मक गद्य रूप में इस यात्रा वृत्तांत के ज़रिए पेश किया.

यात्राकार पर हिंदी की बेहतरीन यात्रा पुस्तकों के अंश प्रकाशित करने के सिलसिले में पेश है राजकमल प्रकाशन द्वारा पुनः प्रकाशित की गई अनिल कुमार यादव की क़िताब – वह भी कोई देस है महाराज – से यह ख़ूबसूरत अंश

इस पुस्तक को आप यहाँ से मंगा कर पढ़ सकते हैं. फ़िलहाल पेश है पुस्तक से एक अंश.

संपादक


 

पुरानी दिल्ली के भयानक गन्दगी, बदबू और भीड़ से भरे प्लेटफ़ार्म नम्बर नौ पर खड़ी मटमैली ब्रह्मपुत्र मेल को देखकर एकबारगी लगा कि यह ट्रेन एक ज़माने से इसी तरह खड़ी है. अब कभी नहीं चलेगी.

अँधेरे डिब्बों की टूटी खिड़कियों पर उल्टियों से बनी धारियाँ झिलमिला रही थीं जो सूखकर पपड़ी हो गई थीं. रेलवे ट्रैक पर नेवले और बिल्ली के बीच के आकार के चूहे बेख़ौफ़ घूम रहे थे. 29 नवम्बर, 2000 की उस रात भी शरीर के खुले हिस्से मच्छरों के डंक से चुनचुना रहे थे. इस ट्रेन को देखकर सहज निष्कर्ष चला आता थाचूँकि वह देश के सबसे रहस्यमय और उपेक्षित हिस्से की ओर जा रही थी इसलिए अँधेरे में उदास खड़ी थी.

इसी पस्त ट्रेन को पकड़ने के लिए आधे घंटे पहले हम दोनों, यानी अनेहस शाश्वत और मैं, तीर की तरह पूर्वी दिल्ली की एक कोठरी से उठकर भागे थे. ट्रेन छूट न जाए, इसलिए मैं रास्ते भर टैक्सी ड्राइवर पर चिल्ला रहा था. हड़बड़ी में मेरे हैवरसैक का पट्टा टूट गया अब गाँठ लगाकर काम चलाना पड़ रहा था. यह हैवरसैक और एक सस्तासास्लीपिंग बैग उसी दिन सुबह मेरे दोस्त शाहिदरज़ाने अपने पत्रकार दोस्त लक्ष्मी पन्त के साथ ढूँढ़कर किसी फ़ुटपाथ से ख़रीदकर मुझे दिया था.

मैं पूर्वोत्तर के बारे में कुछ नहीं जानता था. कभी मेरे पिता डिब्रूगढ़ एयरबेस पर तैनात रहे थे. वहाँ व्यापार करने गए एक रिश्तेदार की मौत ब्रह्मपुत्र में डूबकर हो गई थी. उनका रुपयों से भरा बैग नदी में गिर पड़ा था, उसे उठाने की कोशिश में स्टीमर का ट्यूब उनके हाथ से छूट गया था. मेरे ननिहाल के गाँव के कुछ लोग असम के किसी ज़िले में खेती करते थे. उनके बच्चों ने मुझे बताया था कि वहाँ आदमी को केला (जो कि एक गाली है) कहते हैं.

बचपन में पढ़ी सामाजिक विज्ञान या भूगोल की किताब में छपे चित्रों से जानता था, वहाँ चाय के बागान हैं जिनमें औरतें पत्तियाँ तोड़ती हैं. पहले वहाँ की औरतें जादू से बाहरी लोगों को भेड़ा बनाकर अपने घरों में पाल लेती थीं. चेरापूँजी नाम की कोई जगह है जहाँ दुनिया में सबसे अधिक बारिश होती है.

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इसके अलावा थोड़ाबहुत असम के छात्र आन्दोलन के बारे में पता था. ख़ास तौर पर यह कि अस्सी के दशक के आख़िरी दिनों में बनारस में तेज़तर्रार समझे जाने वाले छात्रनेता फटे गले से माइक पर चीख़ते थे, गुवाहाटी के अलाने छात्रावास के कमरा नम्बर फ़लाने में रहने वाला प्रफुल्ल कुमार महन्तो जब असम का मुख्यमंत्री बन सकता है तो यहाँ का छात्र ख़ून से अपनी तक़दीर क्यों नहीं लिख सकता. इन सभाओं से पहले भीड़ जुटाने के लिए कुछ लड़के, लड़कियाँ भूपेन हजारिका के एक गीत का हिन्दी तर्जुमागंगा तुम बहती हो क्योंगाया करते थे.

कभी यह गीत गाने वाले पंकज श्रीवास्तव की दी हुई एक साल पुरानी सादी डायरी (जो उसे किसी प्रेस काॅन्फ्रेंस में मिली होगी) थी जिस पर मुझे संस्मरण लिखने थे. आधा किलो से थोड़ा ज़्यादा अख़बारी क़तरनें थीं. दो किताबें, (वीजी वर्गीज की इंडियाज नार्थईस्ट रिसर्जेंट और संजय हजारिका की स्ट्रेंजर्स ऑफ़ द मिस्ट) थीं जिन्हें तीन दिन की यात्रा में पढ़ा जाना था.

किताबें एक दिन ही पहले कनाट प्लेस के एक चमाचम बुक मॉल से बिना कन्सेशन का आग्रह किये शाश्वत के क्रेडिट कार्ड पर ख़रीदी गई थीं. बग़ल में जनपथ के फ़ुटपाथ से छाँटे गए कुछ गरम कपड़े थे. वहीं से ख़रीदकर मैंने शाश्वत को एक चटख लाल रंग की ओवरकोटनुमा जैकेट, ड्राई क्लीन कराने के बाद शानदार पैकेजिंग में भेंट कर दी थी.

Vah bhi koi des hai maharaj Book cover by Anil kumar yadav

बड़ी ज़िद झेलने के बाद मैंने जैकेट की क़ीमत नौ हज़ार कुछ रुपये बताई थी जबकि वह सिर्फ़ तीन सौ रुपये में ली गई थी. वही पहने, स्टेशन की बेंच पर बैठा वह डाॅक्टरों द्वारा बच्चों को दिया जाने वाला नेजल ड्राप ऑट्रिविन नाक में डाल रहा था. उसकी नाक सर्दी में अक्सर बन्द हो जाया करती थी. बीचबीच में वह जेब से निकालकर गुड़ और मूँगफली की पट्टी खा रहा था. उसे पूरा विश्वास था कि पूर्वोत्तर जाकर हम लोग जो रपटें और फ़ोटो दिल्ली के अख़बारों, पत्रिकाओं को भेजेंगे, उससे दोनों धूमकेतु की तरह चमक उठेंगे.

तब हर साल अयोग्य, अहंकारी सम्पादकों के यहाँ फेरा लगाकर नौकरी माँगने की जलालत से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा. शाश्वत की अटैची में यमुना पार की कोठरी की सहृदय मालकिन के दिये पराँठे, तली मछली और अचार के साथ तीन फुलस्केप साइज़ की सादी काॅपियाँ थीं.

मैं एक साल से और वह पाँच महीनों से बेरोज़गार था. कई बार वह नौकरी का चक्कर चलाने किसी अख़बार मालिक या सम्पादक से मिलने के लिए सुबहसुबह तैयार होकर दबे पाँव निकलने को होता, मैं रज़ाई फेंककर सामने आ जाता. मैं साभिनय बताता कि छोटी सी नौकरी के लिए डीटीसी की बस के पीछे लपकता हुआ वह कैसे किसी अनाथ कुत्ते की तरह लगता है. खोखली हँसी के साथ उसका एकान्त में सँजोया हौसला टूट जाता, नौकरी की तलाश स्थगित हो जाती. मैं ख़ुद अवसाद का शिकार था. उस साल मैंने कई महीने एक पीली चादर फिर रज़ाई ओढ़कर अठारहअठारह घंटे सोने का रिकॉर्ड बनाया था. इसी मन:स्थिति में हताशा से छूटने, ख़ुद को फिर से समझने के अनिश्चय में एक धुँधली उम्मीद के साथ यह यात्रा शुरू हो रही थी.

पूर्वोत्तर जाकर मैं करूँगा क्या, इसका भी अन्दाज़ नहीं था. इसलिए मैंने ख़ुशवन्त सिंह, राजेन्द्र यादव, प्रभाष जोशी, मंगलेश डबराल, आनन्द स्वरूप वर्मा, राजेन्द्र घोड़पकर, अभय कुमार दुबे, यशवन्त व्यास, रामशरण जोशी, रामबहादुर राय, अरविन्द जैन आदि के पास जाकर एक काल्पनिक सवाल पूछा था और उनके जवाब एक काग़ज़ पर लिख लिए थे. सवाल था—“जनाब! फ़र्ज़ कीजिए कि आप इन दिनों वहाँ जाते तो क्या देखते और क्या लिखते?”

जैसा हवाई सवाल था वैसे ही काग़ज़ के लहराते जहाज़ों जैसे जवाब मुझे मिले. इन्हीं जवाबों को गुनतेधुनते मैं अपना और शाश्वत का मनोबल ट्रेन में बैठने लायक़ बना पाया था. हंस के सम्पादक राजेन्द्र यादव का कहना था कि इस यात्रा में कोई लड़की मेरे साथ होती तो ज़्यादा अच्छा होता, इससे वहाँ के समाज को समझने में ज़्यादा सहूलियत होती और मीडिया में हाईप भी मिलती. सबसे सहज सुझाव रियलिस्टिक स्टाइल में ख़ुशवन्त सिंह ने दिया. मिलने के लिए निर्धारित समय से बस आधे घंटे लेट उनके घर पहुँचा तो बताया गया कि मुलाक़ात सम्भव नहीं है. पड़ोस के एक पीसीओ से फ़ोन किया तो व्हिस्की पी रहे बुड्ढे सरदार ने कहा, “पुत्तर तुम नार्थईस्ट जाओ या कहीं औरमुझसे क्या मतलब.

अपने काग़ज़ पर मैंने ख़ुशवन्त सिंह के नाम के आगे लिखा, “ज़रूर जाओ बेटा. बहुत कम लोग ऐसा साहस करते हैं. मैं तुम लोगों का यात्रावृत्तान्त अंग्रेज़ी में पेंग्विन या वाइकिंग जैसे किसी प्रकाशन से छपवाने में मदद करूँगा.

यह शाश्वत को पढ़ाने के लिए था क्योंकि पैसा उसी का लग रहा था. ख़ुशवन्त सिंह के आशीर्वचन का पाठ करते हुए अपने छोटे भाई सुनील की याद आई. छुटपन में उसे साइकिल पर खींचतेखींचते जब मैं थक जाता था तो इसे भाँपकर वह कहता था, बग़ल से गुज़र रहे दो आदमी आपस में बातें कर रहे थे, यह लड़का हवाई जहाज़ की तरह साइकिल चलाता है. मैं उसका चेहरा नहीं देख पाता था क्योंकि वह डंडे पर बैठा होता था.

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