दुनियाभर में क्यों हो रहे बड़े बाँधों पर आंदोलन
बड़े बाँधों के विरोध (Protest of Large dams) पर आधारित यह रिपोर्ट अप्रैल 2010 में उमेश पंत द्वारा दैनिक भास्कर के लिए लिखी गई थी जिसे यात्राकार आर्काइव के तहत यहाँ पेश किया जा रहा है।
बड़े बाँधों को बनाये जाने को लेकर दुनिया भर में चर्चाएं हो रही हैं। विश्व बाँध आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, “सन 2000 तक विश्वभर में कुल मिलाकर 47665 बड़े बाँध थे जिनमें से सबसे ज्यादा बाईस हज़ार बाँध चीन में, 6600 से ज्यादा बाँध संयुक्त राज्य अमेरिका में और उसके बाद 4291 बाँध भारत में थे।”
लेकिन अब इन बाँधों को लेकर बड़े बड़े आन्दोलन ही खड़े नहीं हो रहे बल्कि इस विषय पर वृत्तचित्र और फिल्में भी बन रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अंधाधुृध औघोगिकीकरण के चलते किये जा रहे बाँधों के निर्माण के प्रति विश्वभर में प्रतिरोध पनप रहा है।
फ़िल्म निर्देशक माइकल मूर ने किया बड़े बाँधों का विरोध (Protest of Large dams by Michael moore)
मशहूर फिल्म निर्देशक माइकल मूर जिन्हें उनके निर्देशन में बनी फ़िल्म अवतार के लिये ऑस्कर से नवाजा गया है इस बीच बाँधों से होने वाले नुकसान का विरोध करते देखे गये। माइकल, डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकिंग में भी एक बड़ा नाम हैं। उनकी एक डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘कैपिटलिजम अ लव स्टोरी’ भी हाल में बहुत चर्चा में रहीं।
इस फिल्म में भी वो औघोगिकीकरण और पूंजीवाद की धज्जियां उड़ाते नजर आये थे। इस बार वो अवतार की कास्ट के साथ अमेजन नदी पर बन रहे ‘बैलो मोंट’ डैम की खिलाफत करने डैम से प्रभावित आदिवासियों के पास उनके समर्थन में पहुंचे। यह बाँध 2015 तक काम करने लगेगा।
लेकिन विश्व के बाँकी हिस्सों की तरह वहां भी आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं। 13 जनजातियों के नेताओं ने मिलकर ये फैसला किया है कि वो इस बाँध को न बनने देने के लिये हर संभव प्रयास करेंगे। उनका कहना है कि यदि अमेजन की उपनदी शिंजू पर यह बाँध बना दिया गया तो उनके मछली के व्यवसाय का क्या होगा। साथ ही, इस नदी के सूख जाने से उनके लिये यातायात की समस्या भी पैदा हो जायेगी। माइकल मूर का इस पर कहना है कि इस बाँध के मसले पर पूरे विश्व समुदाय को एकजुट होना चाहिये क्योंकि अंततः इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
सोहन राय निर्देशित एक फिल्म ‘डैम 999’
दूसरी ओर फिल्मकार सोहन राय निर्देशित एक फिल्म ‘डैम 999’ भी रिलीज होने वाली है। इस फिल्म में बाँधों के टूट जाने की वजह से होने वाली त्रासदी की दास्तान फिल्माई गई है। हांलाकि फिल्म में बाँधों का टूटना एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के तौर पर भी प्रयोग किया गया है। फिल्म की बैबसाईट में चीन में बाँधों की वजह से हुई त्रासदी को फिल्म की प्रेरणा होने की बात लिखी गई है।
बाँधों को लेकर चीन का रवैया उसके पड़ौसी लाओस और थाईलैंड दोनों के लिये ही चिन्ता का सबब बनता रहा है। मेकांग नदी के उदगम स्थान पर बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण कर चीन ने लाओस और तिब्बत दोनों संकट में डाल दिया है। क्योंकि मेकांग का पानी ही वह जरिया था जिससे लाओस में बिजली उत्पादन सम्भव हो पाता था और लाओस यह उत्पादित बिजली थाईलेंड को बेचकर उसकी बिजली की आपूर्ति करता था। लेकिन चीन ने बाँध बनाकर इस पानी को रोक दिया है।
चीन बाँधों के जरिये इन देशों को पहले भी परेशान करता रहा है। बरसात के मौसम में चीन इन बाँधों को खोल देता रहा है जिससे लाओस, कम्बोडिया, थाईलैंड और वियतनाम के कई इलाकों में बाढ़ का संकट उत्पन्न होता रहा है। यही शैतानी चीन अब भारत के साथ भी कर रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी के पानी को मोड़कर चीन अपने देश में सूखे के संकट से बचना चाहता है। लेकिन इससे असम सहित भारत के कई उत्तरपूर्वी इलाके सूखे की कगार पर आ जायेंगे।
इसी तरह चिली के पैंटागोनिया में दो नदियों पर पांच बाँध बनाने के लिये कई कंपनी ने प्रस्ताव दिये हैं। लेकिन वहां भी इन बाँधों का विरोध हो रहा है जिसकी वजह ये है कि इन बाँधों को बनाने के लिये 1500 मील लम्बी ट्रांसमिशन लाईन्स खोदने की जरुरत होगी। जिसके कारण अब तक दुनिया के सबसे विस्त्रृत जंगली इलाके का कटान करना होगा।
चिली के होम डीपो इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि ये हर साल इन जंगलों से 50 मिलियन यू एस डौलर कीमत की लकड़ियां विभिन्न उत्पादों को बनाने के लिये खरीदते हैं। कभी रसिया के सबसे बड़े हाईड्रोलिक पावर प्लांट में विस्फोट की वजह से 62 लोगों की मौत तो कभी साईबेरिया में इसी तरह के विस्फोट से 50 से ज्यादा जानें जाने की घटना, बड़े बाँधों के दुष्प्रभाव समय समय पर सामने आते रहे हैं। इसके अतिरिक्त पर्यावरणविद भी समय समय पर बाँधों की वजह से हो रहे पारस्थितिकीय नुकसान की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं।
भारत में बड़े बाँधों का विरोध (Protest of large dams in India)
भारत में बड़े बाँधों के विरोध के स्वर देश के कई हिस्सों से उभर कर आ रहे हैं। उत्तराखंड में काली नदी पर प्रस्तावित पंचेश्वर बाँध का वहां के लोग पुरजोर विरोध करते रहे हैं। इस बाँध के बनने से भारत और नेपाल के कुल मिलाकर एक सौ 50 गाँव विस्थापन को मजबूर हो जायेंगे। इतनी बड़ी संख्या में विस्थापन का दंश झेलने के बनिस्पत इस बाँध का निर्माण डूब के क्षेत्र में आने वाली जनता को रास नहीं आ रहा।
इससे पहले टिहरी बाँध की त्रासदी को वहां के लोग अब तक नहीं भुला पाये हैं। ऊर्जा प्रदेश कहे जाने वाले उत्तराखंड से बाँधों के लिये आ रहे विरोध के स्वर बताती है कि आम आदमी बड़े बाँधों का पक्षधर नहीं है। इससे पहले मेधा पाटकर के नेतृत्व में गुजरात की जनता ने सरदार सरोवर बाँध का भारी विरोध किया था।
गुजरात में नर्मदा नदी घाटी परियोजना के तहत नर्मदा नदी पर 30 बड़े, 135 मध्यम और 3000 लघु आकार के बाँध बनाये जाने की योजना थी। इस पूरी योजना में एक लाख लोगों को विस्थापन का दंश झेलने को विवश होना तय था जिनमें 60 प्रतिशत जनजातीय इलाकों के लोग थे। ऐसे में इन बाँधों का विरोध होना तय था।
ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत तलाशनी की ज़रूरत
लेकिन जिस तरह वैश्विक स्तर पर इन बड़े बाँधों का विरोध हो रहा है उससे ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की आवश्यकता का मुद्दा भी सामने आया है। सवाल यह है कि क्या बाँधों के समानान्तर ऊर्जा के दूसरे वैकल्पिक स्रोत विश्वभर में ज़रूरी ऊर्जा की आपूर्ति करने में सक्षम हैं।
जर्मनी जैसे कितने देश हैं जहां पानी से ऊर्जा उत्पादन की जगह पवन ऊर्जा पैदा करने को प्राथमिकता दी जाती है? वहां कुल उत्पादित ऊर्जा का केवल 3.5 प्रतिशत हाईड्रोलिक पावर के जरिये पैदा किया जाता है। जर्मनी और स्पेन में फोटोवोल्टिक ऊर्जा प्लांट का प्रचलन भी तेजी से बड़ रहा है।
वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत जिनमें सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा समुद्री ज्वार-भाटों से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा शामिल है का प्रचलन विश्वभर में बढ़ा है। 2008 में वैकल्पिक ऊर्जा के इन स्रोतों का कुल उत्पादित ऊर्जा का 18 प्रतिशत उत्पन्न करने में योगदान रहा। वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों से विश्वभर में 2006 में 207 जीडब्लुई ऊर्जा का उत्पादन किया गया जो 2008 में बढ़कर 280 जीडब्लुई तक पहुंच गया।
बाँधों के विकल्प पूरी तरह तलाश पाना भले ही सम्भव न हो पर इस मात्रा को धीरे धीरे बढ़ाकर ही कम से कम बाँधों के निर्माण की गति को रोका तो जा ही सकता है। जिससे कि ऊर्जा के स्रोत महज ऊर्जा का उत्पादन ही करें भारी प्रतिरोध का नहीं।
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