‘बहुत दूर’ की दूरी नापती यात्रा डायरी

मैं जिस समय अपनी आगामी यात्रा कथा को आख़री रूप दे रहा हूं, ठीक उस वक़्त मैं एक और यात्रा कर रहा हूं. मानव कौल की किताब ‘बहुत दूर कितना दूर होता है’ को पढ़ने की यात्रा.

पिछले कुछ दिनों से इस किताब को ऐसे पढ़ रहा हूं जैसे मेरी पसंद की कोई वाइन हो जिसे किसी प्रिय ने उपहार के तौर पर दिया हो. छोटे-छोटे घूँट लेकर पी रहा हूं इसे ताकि वह देर तक बची रहे. अब यात्रा पूरी हुई है तो लग रहा है कि ‘हर यात्री का निज, हर दूसरे यात्री के निज से’ कितना मेल खाता है.

अगर आप यूरोप देखना चाहते हैं तो यह किताब आपके लिए नहीं है. ईमानदारी से कहूं तो यह आपको यूरोप के बारे में बहुत कुछ नहीं बताएगी , लेकिन  आप एक यात्री का जीवन देखना चाहते हैं तो फिर यह आपके लिए सबसे मुफ़ीद है. इस हिसाब से यह एक यात्री की डायरी है. उसका ख़ुद से किया एक खूबसूरत संवाद है.

अकेले की जा रही लंबी यात्राएं एक तरह से रेचन या केथार्सिस का काम भी कर रही होती हैं. वो जितनी रूमानी लगती हैं उतनी कई बार होती नहीं. एक यात्री के तौर पर रोज़ एक नयेपन से गुज़रते हुए हम अपने भीतर के बासीपन से भी लगतार गुज़रते हैं और एक बिंदु पर यह नयापन अपने बासीपन से टकराता है. इस मिलान बिंदु पर खीझ, ख़ालीपन, और अर्थहीनता का एक अजीब सा अहसास होता है. यह हर यात्री के लिए एक मुश्किल समय होता है. लेकिन इसके बाद एक सुकूनदेह हल्कापन महसूस होने लगता है.

मानव कौल की किताब पढ़ते हुए एक यात्री के तौर पर आप लम्बी यात्रा के दौरान होने वाले उन अहसासों को दुबारा जी पाते हैं. उस ख़ुशी, उस उत्साह, उस खीझ और उस खालीपन से मिल पाते हैं जो यात्रा के दौरान लेखक जी रहा है. यह उनकी धाराप्रवाह भाषा शैली का कमाल है कि यह इतना सहज होता है कि लगता है आप अपनी ही यात्रा का क़िस्सा पढ़ रहे हैं.

किताब में एक संवाद है जहां मानव से मिली एक लड़की कहती है ‘हम इंसानों ने कैसे बाज़ार के सामने घुटने टेक दिए हैं और समाजशास्त्र कोई दूसरा तरीक़ा जो एक सभ्य समाज को भी बनाए रखे, खोजने में नाकाम रहा है’. यह बात कितनी सच है इसका अहसास ऐसी ही लंबी यात्राओं में होता है.

निसंदेह बाज़ार ने ही हमें मौक़े दिए हैं कि हम दुनिया देख सकें लेकिन बाज़ार ही हमें हर उस मौक़े पर ऐसी यात्राओं को करने से रोक भी रहा होता है. बाज़ार के बीच तमाम जीवन काट देने के बाद भी कई बार यह लाचारी हमें समझ तक नहीं आती. हमारी बेचैनियाँ दरअसल उसी लाचारी को न समझ पाने का परिणाम होती हैं. इस आसान सी बात को समझने के लिए आपको ख़ुद से बहुत दूर तक जाना होता है लेकिन आपका वह ‘बहुत दूर’ कितना दूर होगा यह आपके सिवा कोई और नहीं समझ सकता.

यात्राओं में आप इतने लोगों और उनकी जटिलताओं से मिलते हैं कि आपको जीवन में सरलता की अहमियत समझ आने लगती हैं. यह भी समझ आता है कि तमाम जटिलताओं से जूझते हुए आख़िरकार सरल होकर निकलने की यात्रा ही जीवन है. शायद इसी में इसका मतलब भी छुपा है.

‘बहुत दूर कितना दूर होता है?’ इस मामूली से सवाल की रोचक दार्शनिक यात्रा पर निकलना चाहते हों तो यह किताब ज़रूर पढ़ें. यात्राओं पर हिंदी में लिखी गई किताबों में यह अपनी तरह की एक अनूठी किताब है. अगर आपने निर्मल वर्मा को पढ़ा हो तो यह किताब आपको उस लेखन शैली के बहुत क़रीब मिलेगी.

इस किताब में जीवन से कहानियां तलाशता एक लेखक अपने जीवन की कहानी में एक यात्री का किरदार निभाता हुआ आपको मिलेगा. यह लेखक क्योंकि एक अभिनेता भी है शायद इसलिए उसने यह किरदार भी बखूबी निभाया है.

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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