ट्रैवल बुक रिव्यू : तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत, चंद्रभूषण ( अंतिका प्रकाशन)
समीक्षक : गीता श्री
[dropcap]प[/dropcap]त्रकार चंद्रभूषण जी की यात्रा पुस्तक “ तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत “ ( अंतिका प्रकाशन) मंगा ली . तिब्बत नाम मुझे खींच रहा था. आख़िर एक पत्रकार दूसरे पत्रकार का लिखा कैसे न पढ़ें वो भी उस देश के बारे में जहां दोनों घूम कर आए हों. भूमिका में उन्होंने सही लिखा है कि एक पत्रकार की मजबूरी होती है कि अक्सर उसको वही देखने को मिलता है जो उसे दिखाया जाता है. लेकिन हक़ीक़त को लेकर उसकी अपनी बात तब निकलती है जब वह दिखाई जाने वाली चीजों के अलावा छिपाई जा रही चीजों को को भी कुछ हद तक देख सके. “
लेखक -पत्रकार ने वह तिब्बत देखा जो चीनियों ने दिखाया और उस तिब्बत को महसूस किया जिसे छुपाया गया लेकिन स्थानीय और प्रवासी तिब्बतियों ने अहसास कराया.
तिब्बत के इतिहास, सभ्यता और संस्कृति को खंगालती किताब
मैं चंद्रभूषण जी से पहले चीन और तिब्बत की यात्रा कर चुकी हूँ. मेरी यात्रा पुस्तक में तिब्बत पर एक चेप्टर भर है. ये पूरी किताब है. तिब्बत एक पूरी किताब की माँग करता है. यह किताब तिब्बत के इतिहास , सभ्यता और संस्कृति को खंगालती है. किताब पढ़ रही हूँ और मुझे brad pit अभिनीत फ़िल्म याद आ रही है -seven years in Tibet .
तिब्बत की ग़ुलामी का इतिहास वहाँ हैं. उसके कारण भी हैं और दलाई लामा का वहाँ से अपने समर्थकों के साथ पलायन भी.
चीन किस तरह वहाँ घुसता है और उस पर क़ब्ज़ा कर बैठता है. तिब्बत में विकास की बहार मिलेगी जिसे चीन गर्व से भर कर पर्यटकों समेत दुनिया भर के पत्रकारों को दिखाना चाहता है.
तिब्बत की तस्वीर का हर पहलू खोलते हैं लेखक चंद्रभूषण
चंद्रभूषण जी सजग पत्रकार हैं … विस्तार में जाते हैं. तिब्बत की तस्वीर का हर पहलू खोलते हैं. वो लोग भी मिलते हैं जो तिब्बत के विकास से बहुत खुश हैं और जो दलाई लामा के शासन काल को याद नहीं करना चाहते. वो पीढ़ी बूढ़ी हो चुकी है .
नयी पीढ़ी ने चीन का काम और चमचमाता हुआ तिब्बत का वैभव देखा है. वहाँ की नयी पीढ़ी हमारी तरह ही सिर्फ़ अपने बारे में सोचती है, तिब्बत की निर्वासित जनता के बारे में नहीं. लाखों की संख्या में तिब्बती निर्वासित होकर दुनिया भर में फैले हुए हैं. वे ग़ुलाम तिब्बत में लौटने को तैयार नहीं. उन्हें फिर से दलाई लामा का शासन चाहिए. तिब्बत को क़ब्ज़ा करते समय चीनी सेना प्रमुख ने कहा था – धर्म ज़हर है और तिब्बत की धार्मिक पहचान मिटाते चले गए.
मेरे मन में सवाल उठता है कि क्या निर्वासित तिब्बती ख़ासकर युवा पीढ़ी, जो ज़्यादातर भारत में जन्मे हैं, क्या धार्मिक पहचान वाला देश वापस चाहेंगे? चीन मुक्त देश तो सभी चाहते जो वहाँ चीनी सरकार की नौकरी करता है, वो भी आत्मा से मुक्त तिब्बत चाहता है. लेकिन क्या फिर से धार्मिक गुरु के शासन में जाना चाहेगा या कोई और शासन व्यवस्था चाहेगा? फिर धार्मिक गुरुओं की भूमिका क्या होगी? शायद जिस तरह निर्वासित तिब्बत सरकार मैक्लोडगंज में चल रही है, वो ही मॉडल होगा.
अभी निर्वासित तिब्बती संसद में 45 सदस्य हैं. इनमें दो दो सांसद तिब्बत की पाँच धार्मिक परंपराओं – न्यिंग्मा, साक्या, काग्यु, गेलुगु ( बौद्ध धर्म के पंथ) और बोन धर्म की रहनुमाई करते हैं. सबके क्षेत्र बंटे हुए हैं. किताब में विस्तार से निर्वासित सरकार की कार्यप्रणाली और दलाई लामा की भूमिका का वर्णन है. दलाई लामा उम्र के नौंवे दशक में पहुँच गए हैं. उनके बाद उनके अवतार की तलाश होगी. भय है कि चीन कहीं इनके बाद अपना दलाई लामा न खड़ा करेंगे जैसे पहले पणछेन लामा खड़ा करके हंगामा मचा दिया था.
ग़ुलाम तिब्बत की मुसीबतों पर बात
ग़ुलाम तिब्बत की बहुत -सी मुसीबतें हैं. वहाँ रहते हुए अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं मिल सकती. चीन के खिलाफ बोलना है तो निर्वासन ही एकमात्र रास्ता. या चुपचाप यथास्थिति बनाए रखिए. हमने वहाँ स्थानीय लोगों से बातें की थीं जो हमसे छुप कर गुपचुप तरीक़े से की गई थी. हमारे पीछे जो चीनी जासूस , गाइड के तौर पर साथ थे, हमने उन्हें चकमा दे दिया था.
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मुझे पत्रकार मित्र रेणु अगल याद आ रही है जो उस वक्त बीबीसी में काम करती थी. ऐसा दुस्साहस हमदोनों ने एक साथ किया था.
ख़ैर !
फ़िलहाल चीन मुक्त तिब्बत का स्वप्न आकाश कुसुम है. इसलिए मेरा सवाल भी हवा में तैरता रहेगा.
इस किताब के बहाने मेरी स्मृतियाँ हरी हो गईं.
एक बढ़िया कथेतर किताब पढ़ने का सुख मिला जिसने मुझे झकझोर कर स्मृति गाछ से कुछ पत्ते गिराए.
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