Village woman benefitted by solar lantern

सौर ऊर्जा वाली लालटेन ने कैसे बदली ग्रामीण महिलाओं की ज़िंदगी

उत्तर प्रदेश के कानपुर के रूरा से सोलर लालटेन (Solar lanterns) के ग्रामीण महिलाओं के जीवन पर आधारित यह ग्राउंड रिपोर्ट उमेश पंत ने मूलतः गाँव कनेक्शन के लिए फ़रवरी 2013 में लिखी थी जिसे यात्राकार आर्काइव के तहत यहाँ पेश किया जा रहा है.

रूरा (कानपुर)। कानपुर से तकरीबन 70 किलोमीटर दूर अकबरपुर के रूरा गाँव में महीने की 4 तारीख को 25 महिलाएं इकठ्ठा होती हैं। दूर दराज़ के गाँवों से आने वाली ये महिलाएं हर महीने अपने अपने गांवों से 1700 रुपये कमाकर लाती हैं और उन्हें खुशी-खुशी  एक कोष में  जमा कर देती हैं।

25 अलग अलग गाँवों से आने वाली ये वो औरतें हैं जो आज से कुछ साल पहले या तो अपने पतियों द्वारा ठुकरा दी गई, या वो जिन्हें उनके बच्चे गाँवों में अकेला छोड़कर शहरों में जा बसे या फिर जिनके पति अब इस दुनिया में नहीं रहे।

इनमें से हर महिला का अपना एक त्रासद इतिहास है जिसकी अंधेरी गलियों से निकलकर न केवल ये महिलाएं अपनी जिन्दगी को रौशन कर रही हैं बल्कि गाँवों में फैले अंधेरे को भी ये पूरे जीवट से दूर कर रही हैं। इन सारी महिलाओं की जि़न्दगी में आये इस बदलाव के पीछे हैं वो सोलर लालटेन (Solar lanterns) जो कुछ महीनों पहले एक गैर सरकारी संगठन चेतना महिला समिति ने इन्हें मुहैया कराई।

सौर लालटेन ने दी ज़रूरत भर की रौशनी (Solar lanterns story)

अकबरपुर तहसील के मड़ौली गाँव की अरुणा देवी (50) बताती हैं, “हमारे बच्चे बाहर पढ़ते हैं, लड़कियों की शादी हो चुकी है। दो साल पहले पति की मौत हो गई। घर में बड़ा अकेलापन होता था। 2004 में मैं स्वयं सहायता समूह से जुड़ी। दो महीने पहले समूह में हमें सोलर लाईट के बारे में जानकारी दी गई। हमारे गाँव में दिन भर में केवल चार से पांच घंटे बिजली आती है। पहले लोग अंधेरे में बैठे रहते थे। पर जब से सोलर लालटेन गाँव में आई है तबसे ये हर इन्सान की ज़रुरत बन गई है।” फिर अपनी साथी महिलाओं की तरफ देखकर वो शरमाते हुए बोलती हैं, “अब तो लालटेन का नशा हो गया है।”

गाँवों से होने वाले पलायन ने जहां अरुणा देवी जैसे बजुर्गों को अकेला रहने पर मजबूर किया है वहीं गाँवों से काम के सिलसिले में शहर आकर शहरों में शोषण का शिकार होने की मजबूरियों से भी गाँव वाले जूझते रहे हैं। सौर ऊर्जा को लेकर हुई इस पहल से जुडऩे से पहले अकबरपुर के तिंगाई गाँव की गीता कश्यप (35) दिल्ली जाने वाले हाईवे पर मजूदूरी का काम करती थी।

रुरा नाम के इस गाँव में एक संकरी सी गली के भीतर छप्पर वाले बहुत छोटे से घर में रहने वाली गीता बताती हैं,

“हम पहले हाईवे पे मजदूरी करते थे। दिन का 150 रुपये मिलता था। जब हमें समूह के बारे में बताया गया तो हम घबरा रहे थे। हमने कहा था कि हम गरीब हैं, चला नहीं पांएंगे। हमारे घर पर यूनिट मत लगाईये। हमारे घर में लालटेन लगाने की जगह भी नहीं थी। बाद में घर की गृहस्थी का कुछ सामान हटाकर हमने लालटेन  के पैनल लगाये। शुरु में हमने लोगों की दुकानों में फ्री में लालटेन बांटे। कहा कि दो दिन इस्तेमाल करके देखो। धीरे धीरे लोग हमें जानने लगे। घर के बाहर बोर्ड भी लगवा दिया। अब एक लालटेन से हमें दिन की 5 रुपये की कमाई हो जाती है। इस तरह से महीने में दो ढ़ाई हज़ार रूपये हम आराम से कमाने लगे हैं।”

सौर ऊर्जा ने कैसे बदली बंगाल से यहां लाई गई महिला की ज़िंदगी बदली

सौर ऊर्जा (Solar energy) से अपनी जि़न्दगी रौशन करने वाली इन महिलाओं की जि़न्दगी की असल कहानियां खोजने निकलते हैं तो लगता है जैसे कोई फिल्मी सफर तय कर आये हों। रामपुर के कुड़हा गाँव की शिखा यादव, 38, को उनका नसीब हज़ारों किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल ये यहां ले आया। अपने हल्के से बंगाली लहजे में वो बताती हैं,

“हम पश्चिम बंगाल से यहां आये। गरीब घर के थे। हावड़ा में एक सरदार जी ने हमें पाला। थोड़ा बड़े हुए तो उन्होंने हमारी शादी करवा दी और हमें यहां भेज दिया। हमें तो पता भी नहीं था कि हम जा कहां रहे हैं। यहां 20 साल तक हमने पति के साथ अपनी ज़मीन जोती। लेकिन अब गाँव का ज़मीदार उस ज़मीन को बेच देना चाहता है। पति हैं नहीं, और ज़मीन जेठानी के नाम पर है। लालटेन किराये पर देने में जो कमाई होती है, उससे अब हम अपना मुकदमा लड़ेंगे।”

शिखा की ये मजबूरी गाँवों में रहने वाले कमोवेश हर खेतीहर मजदूर की कहानी कहती है। गरीबी और क़र्ज़ का ये गणित उन्हें सम्मान के हक से हमेशा वंचित करता रहा है। “पहले ज़मीदारों से उधार लेना पड़ता था। उनका पैसा नहीं चुका पाते थे तो  उनके घर काम करना पड़ता था। एक बार कर्जा इतना ज्यादा हो गया कि भैंस बेच के कर्जा चुकाना पड़ा। 6 महीने पहले पति की मौत हो गई।” कहते हुए शिखा कुछ रोंआसी हो जाती है। 

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फिर जैसे कुछ याद करके उनकी हिम्मत वापस लौट आती है। चेहरे पर जऱा सी मुस्कुराहट की शक्ल में सूरज की रौशनी से बटोरा और आंखों में सहेजकर रखा हुआ उनका आत्मविश्वास लौट आता है। वो आगे कहती हैं, “जबसे हमारे घर में यूनिट लगा है महीने की अच्छी कमाई हो जाती है। साथ ही लोग इज्जत भी करने लगे हैं कहते हैं तुम तो हमारे घर में उजाला लेके आ गई। अब बच्चे कभी पैसे मांगते हैं तो उन्हें मना नहीं करना पड़ता।” जऱा सा रुककर वो आगे कहती हैं, “बच्चे ज्यादा इज्ज़त करने लगे हैं अब।”

अब तक अपने वर्तमान से लड़ती रही शिखा अब बेसाख्ता अपने भविष्य के सपने भी संजोने लगी है। सौर ऊर्जा से कमाये पैसे से उन्होंने सालाना 2500 रुपये का बीमा भी करवाया है। “बहुत पहले से सुनते थे अपना बीमा होना चाहिये। बड़ा ज़रुरी होता है। पर कभी पैसे नहीं रहते थे। अब जि़न्दगी में पहली बार बीमा कर पाये हैं।” कहते हुए उनके चेहरे पर सन्तोष के भाव साफ झलक आते हैं।

अँधेरे में डूबे गाँवों को सौर ऊर्जा ने दी उम्मीद (Solar lantern gave the hope)

गाँवों में सौर ऊर्जा को लेकर आये इस नये उत्साह ने सरकारी तिरस्कार से अंधेरे में डूबे गाँवों को रौशनी की एक उम्मीद ज़रुर दिखाई है। नरियागाँव की रामवती, 38, बताती हैं कि कैसे उनके गाँव की  जि़दगी शाम को सूरज डूबने के साथ खत्म हो जाया करती थी उसे इन सौर ऊर्जा से चलने वाली लालटेनों ने जैसे फिर से जिला दिया है। 

रामवती बताती हैं, “हमारे गाँव में बिजली की हालत बहुत खराब है। कभी 15-15 दिन तक बिजली नहीं आती। कन्ट्रोल से ढ़ाई लीटर मिट्टी का तेल लेकर आते थे। लेकिन तेल महीना भर नहीं चल पाता था। इसलिये हम शाम को अंधेरा होने से पहले ही घर का सारा काम निपटा लेते थे।”

सोलर लालटेनों की इस रौशनी से केवल रातों का अंधेरा ही नहीं छंटा बल्कि रामवती और उसके परिवार के खेतों की बंजऱ होती जा रही ज़मीन को फि र से लहलहाने की वजह भी मिल गई।

“हम किसानी करते हैं लेकिन खेतों में पानी लगाने के लिये पैसा पूरा नहीं हो पाता था। खाद पानी के लिये सुनार या पैसे वालों से 5 से 10 रुपये सैकड़ा के हिसाब से ब्याज पर पैसा उठाते थे। 110 रुपये घंटा के हिसाब से खेतों में पानी लगाने के लिये देना पड़ता था। 1 बीघा खेत में ढ़ाई तीन घंटे तो पानी देना ही पड़ता है। लालटेन आने से महीने का 4 हज़ार रुपये कमा लेते हैं। पति की अपनी कोई खास कमाई नहीं है इसलिये वो भी मुझे मदद करते हैं। पिछले दो महीने से हमें खेती के लिये पैसा ब्याज पर लेने की ज़रुरत नहीं पड़ी।” रामवती बताती हैं।

गाँवों में बढ़ रही है सोलर लालटेन की लोकप्रियता

शिव लाल यादव, सेल्स और मार्केटिंग एक्जि़क्यूटिव, टाटा बीपी सोलर, लखनऊ

आने वाला वक्त सौर ऊर्जा का ही है। अभी तक हमने उत्तर प्रदेश के गाँवों में लगभर 14 लाख सोलर यूनिट लगाई हैं। शुरुआत में सौर ऊर्जा के उपकरणों के लिये सरकार गाँव वालों को  सब्सिडी तो देती थी। लेकिन वो एडवांन्स में नहीं होती थी ऐसे में उपभोक्ताओं को पहले खुद की जेब से पूरा पैसा खर्चना पड़ता था।

लेकिन अब सरकार ने अपनी व्यवस्थाएं बदली हैं। जिससे लोगों को सब्सिडी एडवांस में मिल जाती है। ये सब्सिडी सीधे उनके बैंक खातों में पहुंचाई जाती है। सौर ऊर्जा के उत्पादों पर अब 40 फीसदी तक सब्सिडी दी जाने लगी है। इसका फ़ायदा ये हुआ है कि अकेले उत्तर प्रदेश में हमसे 4 से 5 लाख सोलर लाईटें लोगों ने खरीदी हैं।

गाँवों में सोलर लाईटों को लकर आ रही लोकप्रियता की वजह ये है कि इनकी कीमत अब काफी कम हो गई है। हम लोग 200 रुपये महीना की किश्तें लेकर अपने ग्राहकों को 2 सोलर लालटेन और एक मोबाइल चार्जर देते हैं।

उत्तर प्रदेश के सात जिलों में हमारी शाखाएं हैं। और अब तक सौर ऊर्जा से जुड़ी हुई परियोजनाओं में हम इन जिलों के 70 फीसदी से ज्यादा गांवों के बाज़ार को कवर कर चुके हैं।

 कैसे हुए सौर ऊर्जा से गाँव रौशन

पिछले दो सालों से गैर सरकारी संगठन श्रमिक भारती से जुड़े आलोक श्रीवास्तव बताते हैं , “सौर ऊर्जा की मदद से चलने वाली इन लालटेनों से गाँव वालों को तो फायदा हुआ ही लेकिन जो सबसे बड़ा फायदा हुआ वो इन महिलाओं को। हमने अकबरपुर तहसील के हर गाँव से उन औरतों को चुना जो सबसे ज्यादा वंचित तपके से आती थी।

इन औरतों के घरों में हमने सोलर पैनल लगवाये। और इन्हें 50-50 सोलर लालटेन दी। जिन औरतों के घरों में पैनल लगाये गये उनसे हमने इन्स्टालेशन के वक्त कुछ पैसे भी लिये। लेकिन जिनके पास पैसे नहीं थे उनके घरों में भी पैनल लगाये गये। अब ये औरतें गाँव वालों को किराये पर सोलर लालटेन देती हैं। क्योंकि हमने ये पैनल लोन लेकर खरीदे थे इसलिये इस लोन को वापस करने के लिये हम इनसे महीने के सत्रह सौ रुपये लेते हैं। कुल मिलाकर महीने के 5 हज़ार तक ये महिलाएं लालटेन किराये पर देकर कमा लेती हैं। 1700 देने के बाद महीने 3 से 4 हज़ार ये अपने लिये बचा लेती हैं। “

महिलाओं के इस समूह चेतना महिला समिति के स्थानीय संयोजक खुशी लाल बताते हैं कि हमारे संगठन से कुल 1650 ग्रामीण महिलाएं जुड़ी हैं हमने इनमें से 25 महिलाओं के घरों में सोलर पैनल लगवाये। पहले यह सब डरती थीं पर अब सब बहुत अच्छा काम कर रही हैं।

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