Traditional farming tools in Kisaan mela

खेती के पारम्परिक उपकरणों से किसानों और पर्यावरण को हो रहा नुकसान – विशेषज्ञ

खेती के पारंपरिक कृषि उपकरणों (Traditional farming tools) से खेती पर पड़ने वाले प्रभावों पर आधारित यह ग्राउंड रिपोर्ट उमेश पंत ने मूलतः गाँव कनेक्शन के लिए अप्रैल 2015 में लिखी थी जिसे यात्राकार आर्काइव के तहत यहाँ पेश किया जा रहा है.

“उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मौजूदा समय में प्रयोग हो रहे कृषि यंत्र न केवल प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे हैं बल्कि कई बार वो जानलेवा भी साबित हो रहे हैं।”

उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में तकनीकी अधिकारी के बतौर कार्यरत शिव सिंह ये बताते हुए संजीदा हो जाते हैं।

कृषि यंत्रों के प्रयोग से किसानों और प्रकृति दोनों की सेहत को बचाने के लिये संस्थान ने हल, दरांती, खुरपी और कुटेला जैसे उपकरणों में कुछ मूलभूत बदलाव किये हैं जिनसे न केवल इनसे हो रहे नुकसान से बचा जा सकता है बल्कि इनकी कार्यक्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है।

अल्मोड़ा से 13 किलोमीटर दूर हवालबाग में तकरीबन 86 हैक्टेयर के फार्म में आयोजित किसान मेले में संस्थान के द्वारा ईजाद किये गये ऐसे ही उपकरणों की एक प्रदर्शनी लगाई गई जिसमें ज़िले के आस-पास के इलाकों से आये सैकड़ों किसानों, अधिकारियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया.

दरांती से घास काटने के दौरान लार के इस्तेमाल से महिलाओं में बीमारियों का खतरा

इस किसान मेले में मौजूद किसानों और विशेषज्ञों ने खेती में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों से जुड़े कुछ रोचक तथ्य सामने रखे. मेले में आए एक किसान शिव सिंह बताते हैं,

“दंराती की जो मूठ होती है वो लकड़ी की बनी होती है. घास काटते हुए दंराती फिसल न जाये इसलिये महिलाएं अपने हाथों में लार लगाती हैं. लार लगाने की यह प्रकृया वो दिन में कई बार दोहराती हैं. आपने गौर किया होगा कि मई से सितम्बर के बीच पहाड़ी क्षेत्र की ग्रामीण महिलाएं बहुत बीमार पड़ती हैं. ये घास कटाई का मौसम होता है.” 

“इस मौसम में उन्हें डिहाड्रेशन, गला सूखना और कई बार गले के कैंसर तक की बीमारियों से दो-चार होना पड़ता है. हमारा अध्ययन कहता है कि हाथों में इस लार का अत्यधिक प्रयोग करना इन समस्याओं की मुख्य वजह है. साथ ही साथ इस वजह से शरीर के पोषक तत्वों का नुकसान भी होता है. इसलिये हमने पहाड़ी घस्यारी महिला किसानों के लिये लकड़ी की मूठ की जगह रबर की मूठ वाली दरांतियां बनाई हैं. ये छोटा सा उपाय है जिससे बड़े खतरों से आसानी से बचा जा सकता है.“ शिव बताते हैं.

संस्थान द्वारा बनाये गये इन उपकरणों में लकड़ी की जगह लोहे और रबर के प्रयोग पर ज़ोर दिया गया है. 

हल में चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की  लकड़ी के इस्तेमाल से ज़मीन को नुक़सान

शिव आगे कहते हैं,

“हल बनाने के लिये अब तक बांज, सनड़ जैसे चौड़ी पत्ती वाले पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. ये पेड़ अपनी जड़ों में बारिश के पानी का संचय करते हैं. ज़मीन की सतहों पर अब 10 इंच तक भी पानी नहीं रह गया है जिसकी मुख्य वजह कृषि उपकरणों के लिये होने वाला लकड़ी का भारी कटान है. हमारे बनाये हल में लकड़ी की जगह लोहे का इस्तेमाल किया गया है. जिससे लकड़ी के भारी दोहन से प्रकृति को हो रहे नुकसान को काफी हद तक बचाया जा सकता है.“ 

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संस्थान के इस प्रयास को सराहते हुए उत्तराखंड सरकार ने तकरीबन 500 हलों के लिये सब्सिडी देने की भी घोषणा कर दी है.

दरांती, खुरपी, कुटेला बनाने वाली लकड़ी के कटान से आहार श्रृंखला को हानि

कृषि उपकरणों के लिये होने वाले लकड़ी के कटान ने जंगली जीवों की आहार श्रृंखला को भी प्रभावित किया है. दंराती, खुरपी, कुटेला जैसे उपकरणों के लिये मेहल, घिंघाड़ू, हिसालू और किल्मोड़ी आदि वन्य वनस्पतियों की लकड़ी का इस्तेमाल होता है. यही वो वनस्पतियां हैं जिनमें तीतर, खरगोश और जंगली मुर्गी जैसे वन्य जीवों का बसेरा हुआ करता था. 

इन वनस्पतियों के कटान की वजह से इन वन्य जीवों का बसेरा छिन गया है. अब जंगलों में ये जीव बहुत कम दिखाई देने लगे हैं. संस्थान का मानना है कि संकटग्रस्त होते जा रहे इन जीवों को भी कृषि उपकरणों में किये जा रहे इन मामूली संसोधनों से बचाया जा सकता है.

पहाड़ी इलाकों में रागी, (स्थानीय नाम-मडुआ) जैसे अनाज पैदा होते हैं जिनकी थ्रेशिंग बहुत कठिन होती है. थ्रेशिंग में सुविधा के लिये इन्हें पानी में भिगाकर रखा जाता है जिससे उसके विशैला होने की संभावना बन जाती है. 

साथ ही पारम्परिक तरीकों से रागी के दाने निकालने में महिलाओं का समय भी बहुत नष्ट होता है. संस्थान ने इस समस्या से निजात दिलाने के लिये मोटर चालित रागी थ्रैशर भी बनाया है जिससे केवल 1 घंटे में 40 से 50 किलोग्राम रागी की थ्रैशिंग सम्भव हो पाएगी. जबकि अब तक प्रयोग हो रहे पारम्परिक तरीकों स एक घंटे में महज 10 से 15 किलो रागी ही निकाली जा सकती है.

 इस थ्रेशर की खास बात ये है कि इसमें लगने वाली 1 अश्वशक्ति की मोटर को घर की बिजली से ही चलाया जा सकता है. इससे ऊर्जा की खपत भी ज्यादा नहीं होती और कार्यक्षमता भी 30 फीसदी से बढ़कर 99 फीसदी हो जाती है.

आपदा प्रभावित इलाकों में आधुनिक उपकरणों पर 80 फ़ीसदी तक की छूट

उत्तराखंड एग्रो इन्डस्ट्रीज़, किच्छा से आये उद्यमी राजीव त्यागी बताते हैं,

“पहाड़ी इलाकों में पलायन की समस्या ने खेती को बहुत प्रभावित किया है. जो किसान गांवों में रह गये हैं उन्हें आधुनिक उपकरणों की जानकारी देना हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है. आपदा प्रभावित इलाकों में तो ऐसे उपकरणों पर अस्सी फीसदी तक की छूट हम लोग सरकार की मदद से मुहैया कराते हैं. पहाड़ों में जोत बहुत छोटी होती है और उससे अगर किसानों को फायदा उठाना है तो उनमें पारम्परिक उपकरण छोड़कर आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल करने की जागरुकता होनी ज़रुरी है.“

अल्मोड़ा में कृषि विभाग में सहायक कृषि अधिकारी के पद पर कार्यरत आर. एस. मेहता बताते हैं,

“सरकार अपनी तरफ से कोशिश कर रही है कि किसानों को नये उपकरणों के प्रयोग के लिये प्रोत्साहन दिया जाये. हमारे पास ऐसे-ऐसे यंत्र मौजूद हैं जिनसे जो काम दिनभर में भी पूरे नहीं हो पाते थे वो महज एक से दो घंटे में हो जाते हैं. इससे समय और पैसा दोनों बचता है. हम किसानों को इन उपकरणों के इस्तेमाल की जानकारी भी दे रहे हैं, अब तक इन उपकरणों के प्रयोग से जो परिणाम आये हैं वो संतोषजनक हैं.“

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