कुछ ऐसा था ऐफ़िल टावर वाले पेरिस का नज़ारा

ज़िंदगी में कुछ चीज़ें अचानक होती हैं. मेरी यूरोप यात्रा भी एक दिन ऐसे ही अचानक तय हो गई. 

दिल्ली के इंदिरा गांधी एयर पोर्ट में चेकिंग और इमिगरेशन की औपचारिकता के बाद हम ‘अल इटालिया’ की फ़्लाइट में थे. दिल्ली से रोम की फ़्लाइट क़रीब दस घंटे की थी. रोम से कनेक्टिंग फ़्लाइट लेकर हम पेरिस आ गए. रोम के एयरपोर्ट में शॉपिंग एरिया और टर्मिनल गेट इतने मिले-जुले से हैं कि सही टर्मिनल तक पहुंचने में बहुत मशक़्क़त करनी पड़ी. हमारी कनेक्टिंग फ़्लाइट बस पंद्रह मिनटों में थी. लग रहा था फ़्लाइट पक्का मिस हो जाएगी. किसी तरह भागते-दौड़ते टिकिट पर लिखे बोर्डिंग गेट पर पहुंचे तो पता लगा बोर्डिंग गेट चेंच कर दिया गया है. ख़ैर आखिर बदले हुए गेट पर किसी तरह हम वक़्त रहते पहुंच ही गए. यह एक छोटा विमान था जो हमें लेकर बस थोड़ी ही देर में पेरिस की तरफ उड़ गया.

पेरिस में जब हमने लैंड किया तो मौसम बहुत ख़ूबसूरत था. एकदम नीले आसमान पर बादल बिखरे हुए थे. यहां जाने क्यों मुझे आसमान ज़्यादा खुला-खुला सा लग रहा था. एयरपोर्ट के पास रोईजी नाम के इलाके में हमारा होटल था. फ़्री शटल से हम अपने होटल आ गए. यहां हमें चेक इन करने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि हमारी बुकिंग का टाइम शुरू होने में अभी थोड़ा वक़्त था. आज जेट लेग उतारने का दिन था. यानी कि रेस्ट का. 

अगली सुबह-सुबह हम पेरिस घूमने के लिए निकल गए. बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी. हमारा आज का पहला पड़ाव था मशहूर एफ़िल टावर 


ऐफ़िल टावर

फ़्रेंच रेवल्यूशन के 100 साल साल पूरे होने की ख़ुशी में बना एफ़िल टावर 324 मीटर ऊँचा है. यानी क़रीब 84 मंज़िल की इमारत के बराबर. ये नायाब टावर गुस्ताव एफ़िल नाम के सिविल इंजीनियर के दिमाग की उपज माना जाता है. इसे आप मेरी नासमझी ही कहें पर यहां आकर मुझे पहली बार पता चला कि एफ़िल टावर में आप लिफ़्ट से ऊपर भी जा सकते हैं. एक बड़ी सी लिफ़्ट हमें टावर के सेकंड लेवल पर ले आई.

एफ़िल टावर के दूसरे लेवल से नज़र आता पेरिस का विस्तार (फ़ोटो : उमेश पंत)

इस लेवल की ऊंचाई थी यही कोई 110 मीटर और यहां ऊपर पहुँचकर क्या शानदार नज़ारा था. शीन नदी और उसके किनारे बसा पूरा पेरिस शहर यहां से दिख रहा था. पेरिस की खास यूरोपियन गोथिक शैली में बनी सबसे शानदार इमारतें यहां से नज़र आ रही थी. एफ़िल टावर के बारे में एक और खास बात ये है कि धूप और हवा के चलते यह टावर अपनी जगह से दाएं-बाएं होता रहता है. सूरज की गर्मी की वजह से ये अपनी जगह से सात इंच तक हिल जाता है. मेटल का जो बना है.

ऐफ़िल टावर से नज़र आती शीन नदी और ‘प्लेस डू ट्रोकाडीरो का फ़व्वारा’

टावर से जिस ओर नज़र ले जाओ उस ओर कोई ख़ूबसूरत इमारत हमसे नज़र मिलाने लगती. टावर के चारों तरफ़ पैसेज बने हुए थे जहां से हज़ारों लोग पेरिस की खूबसूरती को निहारते निहाल हो रहे थे.  

टावर में ही यादगारी की चीज़ो के साथ-साथ खाने-पीने के लिए कैफ़े भी बने हुए थे. सोविनियर्स से लेकर केक तक, यहां सब कुछ मिल रहा था. हमने आम भारतीयों की तरह फ़्रेंच फ़्राइज़ ऑर्डर किए साथ में कुछ मेक्रोन भी मंगा लिए गए और अपने पेट को तसल्ली दे दी गयी.

मन तो नहीं था पर अब हमें एफ़िल टावर से आगे बढ़ना था. 

फ़ोटो : उमेश पंत

शहर का चक्कर

यहां से निकलकर कुछ ही देर में हम बस में थे जो पूरे पेरिस शहर का चक्कर लगा रही थी. बस की बड़ी-बड़ी खिड़कियों के बाहर पेरिस की ऐतिहासिक इमारतें नज़र आ रही थी. एक टूर गाइड हमारे साथ थी जो इन इमारतों के बारे में बता भी रही थी.  इनवेलिड्स, एस्पीनादो एवलीत, बर्बन पैलेस होते हुए हम कॉनकॉर्ड स्कवायर या प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड की ओर बढ़ गए.

प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड

मिश्र से उपहार मिला लक्ज़र ओबलिस्क या स्तम्भ (फ़ोटो : उमेश पंत)

इसी स्क्वायर से फ़्रांस की क्रांति की शुरुआत हुई थी. इस चौराहे पर फ़्रांस की क्रांति के दौर में गुलेटिन पर दुश्मनों के सर कलम किए जाते थे. यहां एक स्तंभ भी नजर आ रहा था जो 3300 साल से भी ज़्यादा पुराना है. मूलतः मिश्र में लक्ज़र के मंदिर के बाहर लगे इस स्तम्भ को मोहम्मद अली पाशा ने फ़्रांस को एक मैकेनिक क्लॉक के बदले तोहफ़े में दिया था. हमारी ही तरह इसकी भी यात्रा कितनी रोचक रही होगी. 

यह चौक यहां के फ़व्वारों के लिए भी मशहूर है.

एवेन्यू डे सॉंज़ एलीसी

प्लेस डे ला कॉनकॉर्ड से शुरू होकर क़रीब 1.9 किलोमीटर के अहाते में बने इस इलाके को फ़्रांस की क्रांति के नायकों की यादगारी की जगह भी माना जाता है. यहां हर साल फ़्रांस की मशहूर आर्मी परेड भी होती है.

आर्क दी ट्रायंफ

‘आर्क दि ट्रायंफ़’ जिससे दिल्ली के इंडिया गेट की प्रेरणा ली गई थी (फ़ोटो: उमेश पंत)

आर्क दि ट्रायंफ़ फ़्रांस की मशहूर खूनी क्रांति में शहीद हुए नायकों का एक स्मारक है. इसमें उन सभी युद्धों के नाम लिखे गए हैं जिनमें फ़्रांस को जीत मिली. पहले विश्वयुद्ध के एक अनाम शहीद की याद में बना एक स्तम्भ भी इसके अंदर है.

ग्रों पैलेस और पिती पैलेस

यहां से आगे बढ़े तो हम ग्रों पैलेस और पिती पैलेस से गुज़र रहे थे. यह पेरिस की एक और मशहूर इमारत है.

सॉंज़ एलीसी मार्केट

पेरिस का मार्केट एरिया अपनी ख़ूबसूरत इमारतों के लिए मशहूर है (फ़ोटो : उमेश पंत)

इस चक्कर में सोंज़ एलीसी की मशहूर मार्केट में भी हम घूमे. कुछ देर बस यहां रुकी ताकि बाज़ार में घूमा जा सके. यहां दुनिया के सबसे मशहूर ब्रैंड थे और यूरोपीय फ़ैशन की चलती-फिरती प्रदर्शनी भी. युवाओं में सफ़ेद जूतों का खास क्रेज़ दिख रहा था जिस पर मेरी निगाह बार-बार जा रही थी.

लूव्र म्यूज़ियम

चलते-चलते फ़्रांस का यह मशहूर संग्रहालय हमारे सामने था. इस संग्रहालय में मोनालीसा की मशहूर पेंटिंग भी रखी गई है जिसे पुनर्जागरण के दौर के मशहूर चित्रकार लियोनार्दो दा विंची ने बनाया था.

नोट्रे डेम

दूर से नोट्रे डेम की इमरारत दिखाई दे रही थी. इस चर्च में मध्यकालीन फ़्रांस की वास्तुकला को हम अपने सामने देख सकते थे.


शीन नदी पर क्रूज़ राइड

क्रूज़ से सफ़र के दौरान एफ़िल टावर के सीने से गुज़रती ट्राम (फ़ोटो : उमेश पंत)

बस में तो हम पेरिस का एक चक्कर लगा चुके थे अब बारी थी शीन नदी पर क्रूज़ राइड की इस नदी से पेरिस का एक अलग ही चेहरा दिख रहा था. क्या सम्भाल के रखा है इन्होंने अपना आर्किटेक्चर. इस राइड को करते हुए तो ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी फ़िल्म का हिस्सा हो गए हों. जिस लम्हे में ज़िंदगी एक खूबसूरत फ़िल्म लगने लगे तो समझिए कि आप वाकई उसे जी रहे हैं.


रात के वक़्त पेरिस की सैर

हमने सुना था कि एफ़िल टावर रात को कुछ और ही ख़ूबसूरत लगता है. तो हम चले एक बार फिर उससे मिलने. वाकई ऐसा लग रहा था जैसे रोशनी में नहाके एकदम तैयार होकर आया हो एफ़िल टावर.

रोमांस के शहर में मिल गई एक रोमांटिक तस्वीर (फ़ोटो : उमेश पंत)

थोड़ी-थोड़ी देर में एफ़िल टावर पे हो रही लाइटिंग क्या कमाल थी. 100-200-1000 नहीं पूरी पांच अरब लाइट्स हैं एफ़िल टावर में. 

रोशनी में जगमगाती ‘दि इनवेलिड्स’ की इमारत (फ़ोटो : उमेश पंत)

एकदम जादुई नज़ारा था ये. रोशनी में जगमागाते इसी नज़ारे के साथ हमारी पेरिस की यह यात्रा पूरी हुई और अब बारी थी यूरोप के अगले शहर की.

‘आर्क दि ट्रायंफ़’ इंडिया गेट में रात की सैर की याद दिला देता है (फ़ोटो : उमेश पंत)

देखिए पेरिस ट्रिप पर बनाया यह व्लॉग यात्राकार के यूट्यूब चैनल पर


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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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