पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-2

यहां पढ़ें : पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक – भाग एक 

दिन 3

13 जून 2019

खातीफुरकिया

सुबह के 8 बजे जब हम खाती गाँव से निकले तो हल्की-हल्की धूप खिली हुई थी। सूरज बादलों की ओट से निकलता और थोड़ी देर में फिर कहीं उन्हीं के बीच छिप जाता। मौसम का साथ रास्ते भी दे रहे थे। जिस पगडंडी पर हम चल रहे थे वो एकदम छायादार थी। रास्ते में जहां पानी के धारे दिखते हम पानी भर लेते। पत्थरों और पेड़ों के बीच से छनकर आता हुआ ये पानी एकदम ठंडा और मीठा था। इसे पीकर जैसे सारी थकान को भुला देने का मन होता।

हरी-भरी वादियों के बीच रास्ते में झरने हमारा स्वागत करते। उनकी कल-कल की आवाज़ दूर से ही सुनाई देने लगती। बीच-बीच में किसी मोड़ के बाद एक विस्तार सा खुलता और बर्फ़ से ढँके पहाड़ एकदम सामने नज़र आने लगते। फिर अचानक जैसे हम पेड़ों, झाड़ियों के बीच छिपी किसी गुफ़ा के बीच चलने लगते। रिंगाल की नयी-नयी उगी झाड़ियां किसी गोल से स्वागत द्वार के आकार में पगडंडी के छोर पर नज़र आती। उकाल (उतार) और होलार (चढ़ाई) बारी-बारी से रास्तों को ख़ुद में ढाल देते। बीच-बीच में सामान से लदे घोड़े आते तो हमें पगडंडी छोड़कर किनारों पर चढ़ना पड़ता। इक्का-दुक्का यात्री भी नज़र आते लेकिन अमूमन रास्ते एकदम वीरान ही रहते। 

खाती और द्वाली के बीच बहती पिंडारी नदी
   

एक झरने के बग़ल में बने पुल के पास चारखोला नाम की एक जगह पर खड़क सिंह नाम के शख़्स के ढाबे पर हम चाय पीने के लिए रुके। खड़क सिंह जी रोज़ सुबह 5 बजे खाती गाँव से क़रीब 7 किलोमीटर चलकर यहां आते हैं। लोगों की यात्राएं उनकी जीविका का ज़रिया हैं। 

“अब ज़्यादा लोग तो नहीं आ रहे। फिर भी हमें तो दुकान खोलनी ही हुई”

खड़क सिंह जी कुछ निराश ज़रूर लग रहे थे पर उनके होंठों पर एक धैर्य भरी मुस्कुराहट कभी ग़ायब नहीं होती। उनके इस छोटे से ढाबे में चूल्हे के बग़ल में तख़्तों से एक बिस्तर भी बनाया गया था। ये उन यात्रियों के लिए था जो रहने की व्यवस्था के साथ नहीं आते। अब तक चलते-चलते टीशर्ट एकदम पसीना-पसीना हो गयी थी। तिपाही चूल्हे पर जलती आग के सामने पीठ कर कुछ देर टीशर्ट सुखा लेना कोई बुरा ख़याल नहीं था।

द्वाली से पहले चारखोला नाम की जगह पर खड़क सिंह जी का अकेला ढाबा
 

इस बीच ढाबे के बग़ल में बनी टीन की शेल्टर में दो लड़कियों और तीन लड़कों का एक समूह ट्रेकिंग से लौट चाय पीते हुए सुस्ता रहा था। उन्होंने बताया कि वो बागेश्वर के ही रहने वाले हैं।

“इससे ऊपर बीड़ी भी नहीं मिलेगी। जो चाहिए हो यहीं से खरीद लेना”

एक शख़्स ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा। साथ आई दोनों  लड़कियाँ पहली बार ट्रेकिंग के लिए आई थी। पूछने पर उन्होंने बताया 

“इतना मुश्किल तो नहीं लगा हमें। लेकिन बीच-बीच में रास्ते बहुत ख़राब हैं।”

कुछ देर में हमें यात्रा की शुभेच्छा देकर ये लोग वापसी के रास्ते पर आगे बढ़ गए। खड़क सिंह जी ने हमें चाय पिलाई और फिर ख़ुद कहीं ग़ायब हो गए।हमारे साथ आए कुत्ते अब थक के बेहाल थे। वहीं किनारे पर वो पस्त होकर पड़ गए। उनके लिए हमने बिस्किट निकाला तो उनकी लार टपकने लगी। बिस्किट के दो पैकेट वो पलक झपकते ही चट कर गए। हमारे लौटने का वक़्त हो चुका था लेकिन खड़क सिंह जी अभी लौटे नहीं थे। हम जंगलों के बीच उन्हें पुकारते रहे लेकिन काफ़ी देर हो गई वो लौटने का नाम नहीं ले रहे थे। हमें अब आगे भी बढ़ना था। न जाने जंगलों के बीच वो कहां ग़ायब हो गए थे। 

ख़ैर हम क़रीब पंद्रह मिनट उनका इंतज़ार करते रहे। और फिर एक मोड़ से वो भागते हुए अचानक प्रकट हुए।

“आपका एक घोड़ा बिदक गया था। सामान-वामान गिरा दिया उसने। घोड़े वाले के साथ वही सामान चढ़ा रहा था”

खड़क सिंह जी ने बताया। ख़ैर उन्हें चाय-बिस्किट वगैरह के पैसे देकर हम आगे बढ़ गए। हम द्वाली गाँव की तरफ़ बढ़ रहे थे। जो अभी क़रीब 6 किलोमीटर दूर था। 

 
रिंगाल, बांज और देवदार वगैरह के पेड़ों से घिरा छायादार रास्ता जिसकी हरियाली मन ख़ुश कर देती है
 

चलते-चलते अब दिन के 12 बज चुके थे। धूप एकदम सर पर थी। क़रीब 5 किलोमीटर बाद एक मोड़ के बाद अचानक एक विस्तार सा खुला। एक भरा-पूरा पहाड़ जैसे सरककर नीचे आ गया हो। यहां कभी हुए भूस्खलन की एक ज़बरदस्त छाप छूटी हुई थी। सैकड़ों पत्थर लुड़ककर पगडंडी की तरफ़ आ गए थे। पगडंडी कई जगह पूरी तरह धँस गयी थी। बस एक पैर रखने की जगह बची रह गयी थी। कुछ दूर से नदी के गरजने की आवाज़ लगातार कानों में पड़ रही थी। ये पिंडर नदी थी। जो छुपते-छुपाते एक बार फिर हमारे सामने थी। नदी के पास रास्ते के कोई निशान नहीं थे। दूर लकड़ी के पुल नज़र आ रहे थे। इन पुलों और हमारे साथ आए कुत्तों के भरोसे हम रास्ता ढूँढने में सफल हो सके। पिंडर नदी के पास पहुँचे तो देखा कि नदी अपने उरूज पर बह रही थी। पत्थरों की सफ़ेदी के बीच नदी की धार भी अपनी गति की वजह से एकदम सफ़ेद हो गयी थी। उसकी आवाज़ दूर चट्टानों को अपने वजूद के क़िस्से सुना रही थी। और इस शोर में हमारी इंसानी आवाज़ें लगातार दबी जा रही थी। इस नदी ने 2013 की आपदा के दौरान यहां क्या क़हर बरपाया होगा वो आस-पास का मंज़र देखकर समझ आ रहा था। नदी के कैचमेंट एरिया में दूर-दूर तक बिखरे हुए बड़े-बड़े पत्थर उस क़हर की बानगी दे रहे थे।  

द्वाली में उफान पर बहती पिंडर नदी पर बना लकड़ी का टेम्प्रेरी पुल
 

ये कन्याधार का इलाका था जिसे तपड़ का मैदान भी कहा जाता है। पास ही एक पत्थर पर लिखा था ‘क्रीपया पुल पर एक-एक कर के तैरे”।

अब तक छायादार रहा रास्ता अचानक वनस्पति विहीन हो गया था। सूरज की तेज़ किरणें अब सीधे शरीर को झुलसा रही थी। थकान अब अपने चरम पर थी। भूख उसे और प्रबल कर रही थी। शरीर अब पस्त सा हो गया था। द्वाली गाँव बस आँखों के सामने था।

द्वाली पहुँचकर ढाबे पर हमने खाने का ऑर्डर दिया। और सब निढाल होकर वहीं मौजूद घास के एक छोटे से मैदान नुमा अहाते में लेट गए। जब तक खाना नहीं आया किसी की उठने की हिम्मत नहीं हुई। खाना आते ही सब उसपर पिल पड़े। सादी सी अरहर की दाल और चावल के सामने इस वक़्त किसी छप्पन भोग की कोई बिसात नहीं थी। 

कुछ देर खाना खाकर और सुस्ताकर शरीर में जैसे जान लौट आई हो। यहां मौजूद जटा दानू नाम के एक शख़्स ने बताया कि 2013 की आपदा के दौरान वो इसी इलाक़े में थे।

“ये जगह तो ऐसे-ऐसे हिल रही थी”

उन्होंने हाथों से इशारा करके बताया। सामने एक झरना न रहा था। एक शख़्स ने बताया कि इसका कोई नाम नहीं है। जिस चट्टान से ये निकल रहा है उसे कोतेला की चट्टान कहते हैं। तो हमने उस झरने का नाम रख दिया – कोतेला छीर। 

“आज से कोई पूछे तो इस झरने का नाम बता देना ‘कोतेला छीर’

हमें उस शख़्स को कहा तो वो मुस्कुरा दिया। कुछ लोग पास ही में चटाई बिछाकर पत्ते खेल रहे थे। यहां भी नंदादेवी एक्सपीडिशन पर गए लापता पर्वतारोहियों की चर्चा चल रही थी। उन यात्रियों की लाशों को लाने के लिए एक रेस्क्यू टीम बस अभी-अभी द्वाली पहुँची थी। उनका ढेर सारा सामान नीचे केएमवीएन के गेस्ट हाउस में उतारा गया था। 

“एक ज्योतिष ने बताया है कि 3 लोग ज़िंदा हैं बल। अगले 7 दिन तक ढूँढ लिया तो जिंदे मिलेंगे। चेतन पांडे का भाई भी आया है। अब उन्होंने कोशिश थोड़ी छोड़नी हुई। ज्योतिष ने कहा है तो ज़रूर बचे होंगे तीन लोग। उनके पास तो महीने- मनीने ज़िंदा रहने का सामान रहता है। भूख की एक गोली भी आती है बल। क्या पता बचे हों”

 
फ़ुर्किया पहुंचने से पहले पहाड़ की चोटी से पृष्ठभूमि में नज़र आती नंदाकोट की विशाल चोटी
 

एक शख़्स ने उमीद जताते हुए कहा। हमारे साथ आए हितेश को पर्वतारोहण का अनुभव था। वो नेहरू माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट से कोर्स भी कर चुका था। और इंडियन माउंटेनियरिंग फ़ेडरेशन का सदस्य भी था।

“ऐसी कोई गोली नहीं आती। अब तक ज़िंदा होने का मतलब ही नहीं है”

वो बड़बड़ाया।

क़रीब डेढ़ दो घण्टा यहां सुस्ताकर हम द्वाली से आगे बढ़ गए। हमारा अगला पड़ाव फ़ुर्किया था,  जो यहां से अभी 5 किलोमीटर दूर था। अब एक बार फिर हमें खड़ी चढ़ाई चढ़नी थी। क़रीब ढाई किलोमीटर चलकर हमें अपने सामने बर्फ़ का एक विस्तार दिखाई दिया। ये पहला ग्लेशियर था जिसे हमें पार करना था। संभलकर बर्फ़ में पैर धंसाते हुए हमने ग्लेशियर पार किया। फ़ुर्किया से पहले-पहले ऐसे दो और ग्लेशियर हमारे रास्ते में आए। 

 
इस तरह के कई ग्लेशियर रास्ते भर पार करने होते हैं
 

फ़ुर्किया में कमाऊ मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस पर हमने चाय पी। घोड़े वाला कुछ आगे जा चुका था। उसने कैम्पिंग के मुफ़ीद जगह तलाश ली थी।

चाय पीकर आगे बढ़े तो एक मोड़ पर हमारी मुलाक़ात सैकड़ों भेड़ों के एक झुंड से हुई। भेड़ें हमारी आहट पाकर अपना रास्ता बदलनते हुए पहाड़ी पर चढ़ गयी। उनके पीछे-पीछे दृश्य में कुछ चरवाहे भी नुमाया हो गए। भेड़ें चरागाहों से लौट रही थी। उच्च हिमालयी इलाकों में मौजूद हरी-भारी घास के बुग्याल उन भेड़ों की प्राकृतिक चराहगाहें होती हैं। ऐसी दुरूह जगहों पर प्रकृति ने इन पशुओं के भरण-पोषण का इंतज़ाम किया हुआ है। इन भेड़ों की यात्राओं में उनके हमराह चरवाहों की आजीविका भी जुड़ी होती है। ऐसे ही एक चरवाहे ज्योत सिंह से हमारी मुलाक़ात हुई। क़रीब 60 साल के ज्योत सिंह अपनी विरासत को आगे बढ़ाते हुए कई सालों से इन इलाकों में भेड़ें चरा रहे हैं।

“2013 की बाढ़ में मेरी चालीस भेड़ें भी मर गई।”

ये कहते हुए उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर एक निराशा तैर गई। उन्होंने बताया कि वो लोहारखेत होते हुए क़रीब 500 भेड़ों को यहां चराने लाते हैं। सबके हिस्से बँटे हुए हैं। 6 महीने तक एक भेद को चराना होता है। हर भेड़ के उन्हें 300 रुपए मिलते हैं। ये भेड़ें कपकोट के लोगों की हैं। किसी की 5, किसी की 10 तो किसी की इससे भी ज़्यादा। 

“थोड़ी बहुत कमाई हुई इनसे। मेहनत तो बहुत हुई।”

वाक़ई ऐसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों में मौसम के साथ अपने वजूद की लड़ाई लड़ते हुए ये चरवाहे जितना कमाते होंगे क्या इनके लिए काफ़ी होता होगा? कितना धैर्य चाहिए होता होगा महीनों-महीनों इतने सारे जानवरों के टूटे-फूटे खतरनाक रास्तों में गुज़ार देने के लिए। 

दूर उड्यार से कुछ काले भोटिया कुत्ते हम लोगों में अनजान ख़तरा सा भांपते हुए भौंक रहे थे। चट्टानों के बीच में प्राकृतिक रूप से बने गुफानुमा ऐसे ही उडियार इन चरवाहों का ठिकाना होते हैं। हम चलते-चलते अब एक बुग्याल पर आ गए थे। शाम घिर चुकी थी। इस घास के खुले मैदान में तेज़ ठंडी हवाएं चल रही थी। घोड़े वाला घोड़ों से सामान उतार चुका था। बुग्याल में ये घोड़े अब घास चर रहे थे। हवाएं इतनी सर्द और तीखी थी कि ठंड से शरीर कामपने लगा था। लगातार चलते हुए ठंड महसूस नहीं होती लेकिन जैसे ही हम रुके पहने हुए कपड़ों का पसीना शरीर में सिहरन पैदा करने लगा। गीले कपड़े उतारकर तुरंत गरम कपड़े पहन लेने में ही अब भलाई थी। 

मैदानी सी चट्टान के चारों ओर बर्फ़ से ढके पहाड़ थे। दो ग्लेशियर अलग-अलग पहाड़ों से नीचे उतर रहे थे। जैसे पहाड़ों पर किसी ने सफ़ेद चादर फैला दी हों। 

 
फ़ुर्किया के बुग्याल से नज़र आते ग्लेशियर
 

घोड़े वाले ने हमारा सामान थोड़ी दूर उतारा था इसलिए वहां से सामान लाकर अपने टेंट लगाने तक अंधेरा हो चुका था। आग जल चुकी थी। जंगल से लकड़ियों का इंतज़ाम हो चुका था। ग्लेशियर से पानी आ चुका था, जो साफ़ नहीं था। पर आज इसी से काम चलाना था। सर अब भी तेज़ दर्द कर रहा था। मुझे शक हो रहा था कि कहीं ये मसला अल्टिट्यूड सिकनेस का तो नहीं है। इस वक़्त हम क़रीब 3400 मीटर की ऊंचाई पर थे। यानी समुद्र तल से क़रीब 11 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर। कुछ देर टेंट में जाकर लेटने पर भी सर दर्द कम नहीं हुआ। हितेश ने बताया कि एक खास ऊंचाई पर आकर अगर सांस लेने में परेशानी होने लगे, शरीर में पानी भारी कमी महसूस हो, उल्टी आने का मन हो और सर घूम रहा हो तो ये चिंता की बात हो सकती है। वो पर्वतारोहण के दौर के अपने क़िस्से भी बता रहा था। ‘हैको’ नाम की एक शारीरिक अवस्था का ज़िक्र चल पड़ा। उसने बताया कि उनके साथ आए एक शख़्स को एक बार रास्ते का अंदाज़ा होना बंद हो गया। वो जिस रास्ते पर चलना था उसकी उल्टी दिशा में चलने लगा। ऐसे दिशा भ्रम की स्थिति को हैको कहते हैं। ओक्सीज़न की कमी की वजह से मौत तक हो जाना पर्वतारोहण की दुनिया में आम बात है। ख़ैर अभी मेरी स्थिति ऐसी नहीं थी। मैं इससे बहुत ऊंचाई पर बिना खास परेशानी के जा चुका था। आदि कैलास की यात्रा के दौरान 5000 मीटर तक की ऊंचाई तक मैं चढ़ चुका था।

“आपको अल्टिट्यूड सिकनेस नहीं है। आराम करो। कई बार थकान से भी ऐसा होता है।”

हितेश ने कहा तो कुछ राहत मिली। ऐसी ऊँचाई पर कई बार मनोवैज्ञानिक तौर पर भी असहज महसूस होने लगता है। दिल्ली के 40 डिग्री के पार जाते तापमान से यहां 4 डिग्री से नीचे आते तापमान पर पहुंच जाने पर शरीर को एडजस्ट करने के लिए भी कुछ वक़्त तो चाहिए ही। हमने एमर्जेंसी के लिए डायमोक्स की गोलियाँ भी साथ रख ली थी। ओक्सीजन की कमी होने पर इन गोलियों से राहत मिलती है।

चाय पीने के बाद साथ लाए अंडों से एग करी बना ली गयी। कुछ देर रेस्ट करके खाना खाया तो सब सामान्य लगने लगा। टेंट के अंदर ठंड का नामोनिशान नहीं था। थकान ऐसी थी कि कब नींद आ गयी पता भी नहीं चला।

जारी.. यहां पढ़ें  : पिंडारी ग्लेशियर ट्रैकिंग भाग-3

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Written by 

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

2 thoughts on “पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-2

  1. बहुत अच्छा लग रहा है …आपकी यात्रा के बारे में पढते हुए …कठिनाईयों को पार करते हुए बड़ी हिम्मत से आप लोग कैसे आगे बढ़ते रहे ..ये बहुत रोमांचित करता है …इसके साथ ही हमें वहां की संस्कृति के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है …
    अब इसके आगे की यात्रा के वर्णन की प्रतीक्षा रहेगी ..🙏🙏

    1. शुक्रिया आपका अंजना जी. यात्रा के तीनों भाग अब वेबसाइट पर हैं. आप आगे का हिस्सा भी पढ़ सकती हैं.

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