पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-1

नौ जून की रात के नौ बजे तक मैं अपना सारा ज़रूरी सामान एक रकसैक में डाल चुका था। कुछ गर्म कपड़े, साफ़-सफ़ाई का सामान, कैमरा और यात्रा को वीडियो में दर्ज करने के लिए पिछली यूरोप यात्रा के दौरान ख़रीदा गया ‘गो प्रो’ वगैरह मेरे बैग में शामिल हो चुका था। मैंने कोशिश की थी कि सामान कम से कम हो लेकिन कोई ज़रूरी चीज़ छूट न जाए। दिल्ली 40 डिग्री में तप रही थी और जिस जगह मुझे जाना था वहां तापमान शायद 4 डिग्री भी न हो। इस लिहाज़ से दिमाग़ को जो-जो ज़रूरी लगा वो सब बैग में समा चुका था। 

कुछ घंटों पहले इस बात का दूर-दूर तक कोई अंदाज़ा भी नहीं था कि आज मैं एक नए सफ़र पर निकलने वाला हूं। अपने दोस्त रोहित जोशी को जन्मदिन की बधाई देने के लिए फ़ोन किया तो उसने कहा ‘रिटर्न गिफ़्ट में मैं तुम्हें पिंडारी ग्लेशियर चलने का ऑफ़र देता हूं’. पिंडारी ग्लेशियर जाने की तमन्ना बहुत पुरानी थी. मन बन गया. तो ज़ाहिर था कि यह एकदम अप्रत्याशित यात्रा थी, जो एक रोमांचक यात्रा की प्रत्याशा में शुरू हुई थी। इस फ़लसफ़े में मेरी आस्था अब कुछ और पुख़्ता हो रही थी कि जीवन जितना अप्रत्याशित हो, रोमांच उतना ही बना रहता है।  दिल्ली से उत्तराखंड के अल्मोड़ा होते हुए अगले दिन मैं बागेश्वर पहुंच चुका था. यही वो जगह थी जहां से पिंडारी ग्लेशियर की यह यात्रा असल में शुरू होती है.

दिन 1

11 जून 2019

बागेश्वरतोली

हम नौ लोगों को सुबह के दस बजे बागेश्वर से निकलना था ताकि वक़्त रहते उस जगह तक पहुंचा जा सके जहां से पिंडारी ग्लेशियर के लिए ट्रेकिंग की शुरुआत होनी थी। बागेश्वर से अभी हमें क़रीब 60 किलोमीटर का सफ़र तय करके कपकोट और भराड़ी होते हुए आगे बढ़ना था। लेकिन किसी न किसी वजह से हमें देर होती जा रही थी। अगले चार-पाँच दिन के लिए हम सभ्यता से दूर जा रहे थे इसलिए खाने-पीने से लेकर दवा-दारू तक का इंतज़ाम हमें आज ही कर लेना था। हम रात को रुकने के लिए कैम्पिंग के पूरे इंतज़ाम से जा रहे थे इसलिए जो-जो सामान याद आता रहता हम उसे खरीदते जाते। क़रीब दो बजे हम सारे इंतज़ाम करके निकल पाने की स्थिति में आ पाए। 

बागेश्वर से कपकोट की सड़क अपेक्षाकृत बेहतर थी लेकिन जैसे-जैसे हम कपकोट से आगे बढ़ते रहे सड़क और संकरी और खस्ताहाल होती रही। सोंग नाम के गाँव में एक डाइवर्जन पर हम ऊहापोह में फ़ंस गए। यहां से दो सड़कें आगे की तरफ़ जा रही थी। स्थानीय टैक्सी वालों ने हमें बताया कि हमें चौड़ा स्थल की तरफ़ से आगे बढ़ना चाहिए क्योकिं वो सड़क बेहतर है। एक सड़क जो खड़ी चढ़ाई पर चढ़ रही थी उस सड़क पर जाने से हमें मना किया जा रहा था हालाकि ये रास्ता क़रीब 15 किलोमीटर छोटा था। एक बुज़ुर्ग ने हमें खड़किया तक के रास्ते का पूरा नक़्शा एक सादे पन्ने पर बनाकर दिया। सेना से रिटायर इस शख़्स ने बताया कि अभी तक वो क़रीब 10 लोगों को ऐसे ही नक़्शे बनाकर दे चुके हैं। 

यात्रा के साथी
 

बुज़ुर्ग से रास्ते की जानकारी लेकर हम आगे बढ़ गए। सोंग से तोली होते हुए जाता ये रास्ता पूरी तरह से भूस्खलन का शिकार था। सड़क पर बेतरतीबी से बिखरे हुए पत्थर बार-बार गाड़ी के तलवे में चोट करते तो समझ आता कि ऑफ़ रोडिंग के लिए गाड़ी का ग्राउंड क्लीयरेंस कितना ज़रूरी होता है। हमारी गाड़ी भी एकदम ओवरलोडेड थी। कहीं-कहीं तो गाड़ी का लोड कम करने के लिए कुछ लोगों को उतरना पड़ जाता। तोली पहुँचते-पहुँचते सूरज पूरी तरह डूब चुका था। अंधेरा होने से पहले हमें कैम्पिंग के लिए जगह तलाशनी थी। तोली गाँव से कुछ ऊपर हमने अपने टेंट लगाने का फ़ैसला किया।

ये एक ख़ूबसूरत बुग्यालनुमा पहाड़ था। जंगल के बीचोंबीच पहाड़ी के ऊपर बनी ये एक खुली सी जगह थी जिसपर मखमली खास उगी हुई थी। कैम्पिंग के लिए इससे मुफ़ीद जगह हमें फ़िलहाल नहीं मिल सकती थी। गाड़ी से सामान उतारकर हम पहाड़ी पर चढ़ गए। 

तौली गाँव में कैंपिंग की जगह

क़रीब एक घंटे बाद अंधेरा होते-होते हमारे टेंट लग चुके थे। कुछ लोग पानी लेने गाँव की तरफ़ चले गए। कुछ जंगल में लकड़ियाँ ढूँढने निकल पड़े। कुछ ने आग जलाने के लिए पत्थर का चूल्हा बनाने का इंतज़ाम किया और कुछ खाना बनाने के लिए सब्ज़ियाँ काटने लगे। नौ लोगों की हमारी टीम ने काम अलग-अलग बाँट लिए। 

गाँव से हमारे से साथ दो कुत्ते भी साथ हो लिए जो किसी भी अमानवीय और अपरिचित आहट पर भौंकने लगते। खासकर जंगली जानवरों की गंध मिलते ही ये कुत्ते तुरंत प्रतिक्रिया देने लगते। उनकी ये प्रतिक्रिया हमें जंगली जानवरों से सतर्क रहने में एक अहम भूमिका निभाने वाली थी। 

पहले चाय और फिर खाने की व्यवस्था करके हमने टेंट से कुछ दूर आग भी जला ली। ताकि रात को जंगली जानवर कैंप के पास न फटकें। इस आग के किनारे बैठकर हम काफ़ी देर तक आँच सेंकते रहे और गाने गाते रहे। हल्की-हल्की ठंड और खुले आसमान के नीचे क़रीब घंटे भर तक गाने गाने का यह सत्र चलता रहा। 

रात के क़रीब साढ़े ग्यारह बजे हम अपने-अपने टेंट में सोने के लिए चल दिए। टेंट के अंदर अच्छी ख़ासी गर्मी थी। स्लीपिंग बैग में लेटे हुए कुछ देर में ही शरीर पसीना-पसीना हो गया। कपड़े धीरे-धीरे उतरते रहे और आख़िरकार एक टीशर्ट में भी गर्मी लगने लगी। स्लीपिंग बैग की आधी चेन खोली तब जाके गर्मी से कुछ राहत मिली। ये टेंट और स्लीपिंग बैग वाक़ई बहुत कारगर थे।

देर रात मुझे टेंट के बाहर कुछ आहट सी सुनाई दी। आधी नींद में ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरा पैर खींचा और मुझे टेंट से बाहर घसीट लिया। तेज़ी से धड़कते हुए दिल की आहट के साथ नींद पूरी तरह खुली। ये एक सपना था जो जंगली जानवरों के डर से उपजा था। 

ख़ैर थोड़ी ही देर में नींद ने दस्तक दी और रात आख़िर कट ही गई।

दिन 2

12 जून 2019

तोलीखाती

सुबह-सुबह नींद खुली तो आस-पास की हरियाली ने मन भी हरा-भरा कर दिया। सुबह के नित्यकर्म के लिए पास ही के एक धारे की तरफ़ चल दिए। जंगल के बीच पानी की आवाज़ का पीछा करते हुए पानी के उस स्रोत की तरफ़ जाते हुए पंछियों की आवाज़ और पत्तियों की सरसराहट लगातार साथ बनी रही। बहते हुए पानी के किनारे ब्रश किया और हाथ मुँह धोकर पीने का पानी बोतलों में भरकर अपने साथ कैम्प में ले आए। कैम्प में अब तक कुछ साथी आग जलाकर सुबह की चाय बना चुके थे। सुबह-सुबह मैगी का नाश्ता करके हमने टेंट और अपना सामान समेट लिया। 

तौली से सुबह-सुबह का नज़ारा

निकलते-निकलते नौ बज गया। अभी हमें खड़किया की तरफ़ बढ़ना था। रोड की हालत धीरे-धीरे और ख़राब होती जा रही थी। भूस्खलन की वजह से कई जगह रोड का ज़्यादातर हिस्सा उखड़ चुका था। एक आध जगह तो बस इतनी जगह बची थी कि गाड़ी मुश्किल से पार हो सकी। इस सड़क पर स्थानीय इक्का-दुक्का स्थानीय टैक्सियाँ ही चल रही थी। रास्ते का ज़्यादातर हिस्सा एकदम वीरान था। रास्ते में कई जगह प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के बोर्ड दिखाई देते। इस बोर्ड के कुछ आगे तक सड़क में डामर बिछा होता लेकिन थोड़ी ही आगे योजना की कलई खुल जाती सड़क की शक्ल फिर उखड़ जाती।

11 बजे के क़रीब हम खड़किया गाँव पहुँचे। यह गाँव हमारी गाड़ी से यात्रा का आख़री पड़ाव था। यहां से आगे का रास्ता पैदल था। इससे पहले सोंग से ट्रेक शुरू हो जाता था। रोहित ने बताया कि जब वो 2011 में पिंडारी ट्रेक के लिए आया था तो सोंग से आगे धाकूड़ी की तीखी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। धाकुड़ी से आस-पास के पहाड़ों का बेहद ख़ूबसूरत नज़ारा दिखाई देता था लेकिंग अब खड़किया तक सड़क आने से क़रीब दो दिन का ट्रैक  कम हो गया है। अब धाकूड़ी जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। 

खड़किया में हम जिस ढाबे में रुके वहां से सुंदरढ़ूँगा की बर्फ़ीली चोटी सामने दिखाई दे रही थी। ढाबे के मालिक प्रताप सिंह ने बताया कि ये गाँव कपकोट की सबसे बड़ी ग्रामसभा है। यहां के ज़्यादातर लोग लेबरी करते हैं। पत्थर तोड़ते हैं या फिर गाइड या पोर्टर के तौर पर यहां आने वाले टूरिस्ट या आर्मी वालों के साथ जाते हैं। यही उनके रोज़गार का ज़रिया है। उन्होंने बताया कि 2013 की आपदा ने यहां के पर्यटन को बुरी तरह प्रभावित किया। लोग अब यहां आने में डरते हैं। हालाकि इस साल फिर भी यात्री आए। 

“इस बार तो हम सबने इलेक्शन का बाइकॉट किया। सबने फ़ैसला किया कि जो वोट देगा उसे जुर्माना देना होगा।”

ऐसा क्यों, इस सवाल के जवाब में प्रताप सिंह ने गाँव के हालातों को लेकर अपनी नाराज़गी बयान कर दी।

“क्या होता है यहां। सब ऐसा ही ठैरा। बिजली के पोल लग गए हैं, बिजली आयी नहीं। बच्चों को हाईस्कूल इंटर करने के लिए 18 किलोमीटर दूर बदियाकोट तक जाना पड़ता है। टीचर दूर के हैं। आते नहीं। स्टाफ़ हुआ नहीं। शाम को बेचारे बच्चे टेंशन में रहते हैं कि सुबह-सुबह फिर स्कूल जाना होगा। कई बच्चे तो रास्ते में बेहोश भी हो जाते हैं।”

प्रताप सिंह हमारे लिए खाना बनाते हुए अपना रोना रो रहे थे। 

“हॉस्पिटल भी खाती में है। यहां से 6 किलोमीटर दूर। केस बिगड़ गया तो 80 किलोमीटर दूर बागेश्वर ले जाना पड़ता है। सड़क तो आपने देखी ही होगी, कैसी है”

गाँव के कुछ और लोग भी इस चर्चा में शामिल हो गए। उन्होंने बताया कि गाँव में कोई खेती नहीं करता। सबकुछ ‘ब्लैक’ में ख़रीदना पड़ता है।

ग्रामीण निराश लग रहे थे। यहां से आगे जाने के लिए हमें पोर्टर की ज़रूरत थी। एक आदमी तैयार हुआ लेकिन सामान देखकर कुछ ही देर में वो पलट गया। 

“इतना सामान अकेले कैसे जाएगा? दो लोगों को ले लो”

दो लोगों को लेने से बेहतर था कि घोड़े कर लिए जाएं। घोड़े सामान भी ज़्यादा ले जाएंगे और कुछ लोगों के बैग भी उठा लेंगे। यही सोचकर क़रीब घंटे भर की जद्दोजहद के बाद 1200 रुपए हर दिन के हिसाब से दो घोड़े करने की बात तय हो गई। 

खाना खाते-खाते और घोड़ों का तय करते हुए काफ़ी देर हो चुकी थी। 2 बज चुके थे। घोड़े वाले को गाँव जाकर घोड़े लाने में अभी आधा घंटा और लगना था। तय हुआ कि दो लोग घोड़े वाले के लिए सामान के साथ रुक जाएंगे बाक़ी आगे बढ़ जाएंगे। जो तय हुआ वही किया गया।

खड़किया से कुछ देर हल्की चढ़ाई रही और फिर एक ढलान भरा ख़ूबसूरत रास्ता नीचे उतरने लगा। बादल लगे हुए थे और रास्ता भी काफ़ी छायादार था और उसपर चढ़ाई भी नहीं थी। यात्रा का यह शुरुआती पड़ाव काफ़ी आसान और ख़ुशनुमा था। हम धीरे-धीरे तलहटी में बहती पिंडर नदी की तरफ़ उतर रहे थे। पिंडर नदी के क़रीब पहुँचते ही पानी की गर्जना ने एक उत्साह सा भीतर भर दिया था। वेग से बहती इस नदी को हमने एक लम्बे पुल के ज़रिए पार किया। यहां पर कुछ देर तस्वीरें भी खींची गई। पुल पार अब एक तीखी चढ़ाई हमारा इंतज़ार कर रही थी। 

ये दोनों तौली से हमारी पूरी यात्रा के साथी और कहीं-कहीं मार्गदर्शक बने रहे

यहां एक रोचक बात यह हुई कि खड़किया गाँव से 2 कुत्ते भी हमारी यात्रा में शामिल हो गए। खाती तक आते-आते हमारी टीम में 2 और कुत्ते शामिल हो गए। यानी मूल रूप से 9 यात्रियों के हमारे समूह में अब 4 कुत्ते, एक घोड़े वाले भैय्या और दो घोड़े भी शामिल हो गए थे।

“ये तो अब ऊपर तक आपके साथ ही रहेंगे। रास्ता भी बताएँगे आपको और जानवरों से भी बचाएँगे”

एक ग्रामीण ने कुत्तों के बारे में जानकारी दी। पता चला कि ये कुत्ते ट्रैक पर जाने वाले यात्रियों के साथ चलते रहते हैं। मंज़िल तक उनका साथ देते हैं और उन्हीं के साथ वापस भी लौट आते हैं। क्या उन्हें भी यात्राओं का शौक़ होगा या फिर वो अपना अकेलापन दूर करने के लिए साथ चल देते होंगे। या फिर बस इसलिए कि उन्हें इन कुछ दिनों में खाने के लिए कुछ न कुछ मिलता रहेगा। वजह जो भी हो इन कुत्तों का साथ आना खल नहीं रहा था।

खाती गाँव के ठीक पहले दिखा यह ख़ूबसूरत नज़ारा

क़रीब 4 किलोमीटर की तीखी चढ़ाई चढ़ते हुए फेफड़ों की अच्छी ख़ासी कसरत हो गई। शरीर पसीना-पसीना था। लेकिन ऊपर पहुँचकर अब एक सीधा खड़ंजा हमें एक ख़ूबसूरत गाँव की तरफ़ ले जा रहा था। ये खाती गाँव था। आलू की फ़सलों से लहलहाते हरे-भरे खेत और पृष्ठभूमि में ऊँचे-ऊँचे पहाड़। लग रहा था कि हमारा पहाड़ खूबसूरती के मामले में स्विट्ज़रलैंड से कम थोड़ी है। लेकिन अपनी स्विट्ज़रलैंड की यात्रा के अनुभवों से मैं जानता था कि संसाधनों के मामले हम उनसे कितना पीछे हैं। दूर क़रीने से बना हुआ एक गाँव नज़र आ रहा था। गाँव के हर घर में खूबसूरत पेंटिंग की गई थी। लग रहा था जैसे सारे गाँव वालों ने मिलकर इसे रंगों से रंगने का फ़ैसला किया है। 

पूरे ट्रैक का सबसे ख़ूबसूरत गाँव -खाती

एक ढाबे पर पहुँचकर हमने चाय मँगाई। पास ही केएमवीएन के गेस्टहाउस के क़रीब एक मैदानी सी ज़मीन पर बैठकर हम सुस्ताने लगे। शाम का 4 बज चुका था। घोड़े के साथ आते हमारे साथी दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहे थे। यहां क़रीब डेढ़ दो घंटे का इंतज़ार करने के बाद दूर से घोड़े आते दिखाई दिए उनके पीछे हमारे दो साथी भी चले आ रहे थे। लेकिन अब बादल घिर चुके थे। बारिश की सम्भावना लग रही थी। ज़ाहिर था कि आज हमें आस-पास ही कहीं रात बितानी होगी। क़रीब छह बजे तक हमें टेंट लगाने की जगह मिली। लेकिन जैसे ही टेंट लग सके मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। टेंट को छोड़कर कुछ देर हम पास ही में बनी एक टीन की शेल्टर में आ गए। बारिश ने मौसम को बेहद ठंडक से भर दिया था। 

क़रीब घंटे भर झमाझम बरसने के बाद बारिश थमी तो हम अपनी कैम्पिंग साइट के नीचे बने ढाबे पर चले आए। गर्मागर्म चाय ने दिल ख़ुश कर दिया। यहां हमारी मुलाक़ात बलवंत ज़ौहरी नाम के एक शख़्स से हुई। उन्होंने बताया कि 2013 की आपदा के दौरान वो पिंडारी ग्लेशियर के ट्रैक पर थे। क़रीब 25 लोगों की टीम के वो गाइड थे। 

खाती से दिखती सुंदरढ़ूँगा की चोटी

“रस्सियों की मदद से किसी तरह लोगों को बचाया। रास्ते तो सारे खतम हो चुके थे। रस्सी छूटने का मतलब था सीधे मौत। खाना भी खतम हो गया था। किसी तरह सभी लोगों को बचाकर वापस ले ही आए। जान बच गई सबकी”

बलवंत से उन आठ पर्वतारोहियों के बारे में भी बातचीत हुई जो नंदा देवी ईस्ट पर एक्सपीडिशन के दौरान ग़ायब हो गए थे। इनमें से कुछ की लाशें पिंडारी ग्लेशियर के पास ही देखी गयी थी। रेस्क्यू टीम का एक दल इसी बीच उन लाशों को तलाशने जा रहा था। 30 से ज़्यादा लोगों के इस रेस्क्यू दल की अगुवाई पहाड़ के मशहूर पर्वतारोही ध्रुव जोशी कर रहे थे। जो आठ पर्वतारोही ग़ायब थे उनमें से एक अल्मोड़ा के चेतन पांडे भी थे। इस दल में मार्टिन मोरन भी शामिल थे जो इस तरह के चालीस से ज़्यादा उच्च हिमालयी अभियानों की अगवाई कर चुके थे। अमरीका के ट्रैकिंग सर्किल में उन्हें ‘लेजेंडरी’ पर्वतारोही माना जाता था। 12 लोगों के इस दल ने 26 मई को नंदा देवी के पास 6477 मीटर ऊँची एक ऐसी अनाम चोटी को समिट करने की कोशिश की थी जिसपर इससे पहले कभी किसी ने चढ़ाई नहीं की थी। इसके बाद से इस दल से कोई सम्पर्क नहीं हो पाया। इस दल के उन चार लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया, जो अनाम चोटी पर जाने वाले दल के सदस्यों से अलग निकल आए थे। लेकिन आठ लोग यहां आए बर्फ़ीले तूफ़ान की चपेट में आ गए।

“अरे मार्टिन तो ग़ज़ब आदमी था बल। 15 दिन तक क्रेवास में फँसा रहा फिर भी ज़िन्दा बचकर लौट आया। ज़िंदा रहने के लिए आदमी तक का मांस काटकर खा लेता था वो। नंदादेवी तो उसने कई बार समिट किया था। अब कहाँ ज़िंदा होगा बेचारा”

बलवंत की बातों में मार्टिन का नाम लेते हुए सम्मान का भाव था। वो उनके बारे में ऐसे बात कर रहे थे जैसे लोककथाओं के किसी नायक की बात कर रहे हों। क़रीब घंटे भर तक इस छोटी सी मिट्टी से लीपी गई रसोई में धुएँ के ग़ुबार के बीच तिपाई चूल्हे से आग सेंकते हुए चर्चा चलती रही। घंटेभर बाद बारिश रुक गई तो हम कैंपसाइट में लौट आए।

खाती से एक किलोमीटर दूर हमारी कैंपिंग साइट

साथियों ने आग जलाई और अपने साथ लाए चिकन को बनाने की प्रक्रिया शुरू की। रात के क़रीब ग्यारह बजे हम चिकन चावल खा रहे थे। पास के जंगल से बार-बार किसी जंगली जानवर की आवाजाही की आवाज़ आ रही थी। हमारे साथ खड़किया से आए कुत्ते लगातार भौंक रहे थे। हमने अपने हेडलैंप की रोशनी से जंगल की तरफ़ देखकर पक्का किया कि कम से कम ये जानवर तेंदुआ तो नहीं है। आमतौर पर मांस और मसालों की महक अक्सर जंगली जानवरों को अपनी तरफ़ आकर्षित करती है। इसलिए कैम्पिंग के दौरान उनका हमला करने का ख़तरा भी बना रहता रहा। पर हमारे पास उजाले की कोई कमी नहीं थी। लाइटों से हमारी कैम्प साइट जगमगा रही थी। आज फिर देर रात तक गाने गाने का दौर चलता रहा। कुछ लोग ज़रा जल्दी जाकर सो गए। लेकिन हम कुछ लोग रात 1 बजे तक गाने गाते रहे। और जब गाना गाते-गाते थक गए तब जाकर सोने के लिए गए। 

जारी… पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-2  पिंडारी ग्लेशियर ट्रैक : भाग-3

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उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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