जयपुर के हवामहल की यात्रा : जयपुर यात्रा भाग-4

(Last Updated On: January 28, 2022)

राजस्थान के जयपुर शहर की यात्रा में हर घुमक्कड़ के अपने अलग अनुभव होते हैं। ऐसी ही घुमक्कड़ तुलिका पांडेय ने हमें लिख भेजे हैं अपने जयपुर यात्रा वृत्तांत जिन्हें आप किश्तों में यहाँ पढ़ रहे हैं। यह रहा चौथा और आख़री भाग।



 

आज क्रिसमस है और आज ही हमें इस शहर को अलविदा कहना है। अच्छा तो नहीं लग रहा पर क्या कर सकते है। यहां से निकलेंगे तभी तो कहीं और पहुचेंगे।

सो आज हमारा प्लान था सबसे पहले हवा महल जाने का, फिर जंतर मंतर, उसके बाद अलबर्ट हॉल और फिर इसारलेट टॉवर। ये सभी स्थल एक दूसरे के करीब करीब में ही स्थित हैं,पैदल एक से दूसरे तक पहुंचा जा सकता है। आखिर में हमें बापू मार्केट होते हुए जाना था जयपुर स्टेशन की तरफ।

हालांकि हमें होटल से निकलते वक़्त ही जानकारी मिल गई थी कि आज अलबर्ट हॉल बंद रहने वाले था क्योंकि अक्टूबर से लेकर मार्च महीने तक महीने का आखिरी मंगलवार रख रखाव के लिए निर्धारित है और आज महीने का वही आखिरी मंगलवार है।


 

हवामहल की यात्रा

 

जयपुर के हवा महल की यात्रा
जयपुर के हवा महल की यात्रा

 

चलिए संग्रहालय नहीं सही बाकी स्थलों को घूमने के उद्देश्य से हम सब सुबह ही निकल पड़े होटल से। हमारा पहला रास्ता सबसे पहले पहुंचा हवा महल की तरफ। आज हम एक बात को लेकर संतुष्ट थे कि हमें कहीं भी प्रवेश टिकट नहीं लेना था क्योंकि हमने कल ही कंपोजिट टिकट ले लिया था सो आज हमें बस गंतव्य तक पहुंचना था, मजे करना था। रास्ते में ट्रैफिक काफ़ी थी क्योंकि क्रिसमस से लेकर न्यूईयर तक छुट्टियां होने के वजह से यहां बहुत ज्यादा भीड़ बढ़ गई। ये तो हमने तभी अंदाजा लगा लिया था जब हम अपने होटल के डाइनिंग हॉल पहुंचे थे सुबह नाश्ते के लिए। मुश्किल से खाली टेबल दिखी था।


 

हवामहल का प्रवेश द्वार

 

 

ख़ैर ट्रैफिक को चीरते हुए हम पहुंच चुके थे हवा महल के सामने। हवा महल, सिटी पैलेस के बिल्कुल पास में ही है। आपको बता दूं की हवा महल में सामने की तरफ कोई प्रवेश द्वार नही है। अगर आपको अंदर जाना है तो आपको पिछले भाग से जाना होंगा। मतलब ये कि महल का पिछला भाग दरअसल महल का अगला भाग है और सड़क की तरफ से सामने दिखने वाला भाग इसका पिछला भाग है।

आज सामने से इसे (महल का पिछला भाग) देखते हुए एक बार फिर वही खयाल आया की इसकी खूबसूरती पर कितनी धूल जमा है ( बाहरी दीवारों पर)। इस ऐतिहासिक और बेहतरीन महल के ऊपर इतनी धूल, जिसे देखने ना केवल अपने देश के लोग बल्कि अन्य देश के लोग भी हजारों की संख्या में रोज आते हैं। थोड़ी सफाई की हक़दार तो है ये महल भी। चलिए सफाई तो जब होगी तब होगी, अभी चलते है हवा महल के थोड़ा और करीब।


 

हवामहल का इतिहास

 

 

यह महल भी जयपुर की अन्य ऐतिहासिक इमारतों की तरह ही लाल गुलाबी बलुआ पत्थर से बनी हुई है। रोचक बात ये है कि यह महल बिना किसी आधार का बनाया गया है और 87° पर झुका हुआ है। पर अपने पिरामिड कि तरह आकर होने के कारण यह आज भी बेपरवाह होकर खड़ा है। राजपूत राजा सवाई प्रताप सिंह, जो कि भगवान श्री कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे, उन्होंने इसे भगवान के मुकुट के आकार में ही 1799 ई में बनवाया। इसे मूर्त रूप दिया स्थापत्य कलाकार लाल चंद उस्ताद जी ने।


 

हवामहल की वास्तुकला

 

 

इसकी वास्तुकला भी मुग़ल और राजपूत शैली की मिश्रण है। यह महल एक 5 मंजिली इमारत है और बाहरी बनावट बिल्कुल ऐसी है कि देखने पर इसपर नक्काशीदार मधुमक्खी के अनेक छत्ते सी दिखती है। इस महल का नाम हवामहल रखा गया, नाम से ही मालूम पड़ता है कि इस महल का हवा से जरूर कुछ लेना देना है। हां तो बिल्कुल है, क्योंकि इस महल में कुल 953 छोटी खिड़कियां या झरोखे बनाए गए हैं जिसकी वजह से इस महल की आबोहवा हमेशा ही ताज़ी बनी रहती है।

जयपुर जैसे शहर में जहां इतनी गर्मी पड़ती है वहां जब आप इस महल के भीतर होते हैं तो उस गर्मी का एहसास तक आपको छू नहीं सकता। क्योंकि हवा और प्रकाश को महल के भीतर आने की पूरी पूरी छूट मिली हुई है। इसी वजह से यह महल गर्मी के मौसम में शाही परिवार का गृष्मावास हुआ करता था।

इतिहास की बात हो ही रही है तो ये जानना तो बहुत जरूरी है कि महल की खिड़कियों का काम केवल हवा और प्रकाश को भीतर लाना नहीं था बल्कि शाही महिलाओ को बाज़ार और महल के बाहर हो रहे उत्सवों को दिखाना भी था। शाही महिलाएं इन्हीं खिड़कियों पर खड़ी होकर बाहर का नज़ारा देखती थी और पर्दा प्रथा के नियमों के अनुसार बाहरी लोगो की नज़रों में भी नहीं आती थी।


 

हवामहल के अंदर का नजारा

 

 

अब हम हवामहल के अंदर आ चुके थे। यह महल बाहर से जितना ही भव्य और वास्तुकला से अलंकृत दिखता है, भीतर से उतना ही सामान्य सा है। बिल्कुल किसी निजी आवास की तरह।

भव्य द्वार से प्रवेश करते ही हमें सामने एक बड़ा प्रांगण या आंगन दिखा और इसके तीन तरफ दो मंजिली इमारत। यहां एक खूबसूरत पानी का फब्बारा है। जो इस साधारण से आंगन को असाधारण बना देता है।

 

ऊपरी मंजिलों तक ले जाते संकरे रास्ते

 

महल के ऊपरी मंजिल तक जाने के लिए सीढ़ियां नहीं है बल्कि संकरे ढलान भरे संकरे रास्ते हैं। ऊपर के हॉल में खिड़कियों पर रंगीन शीशे लगे हुए हैं जिनसे होकर आने वाली सूर्य की रोशनी हॉल में अद्भुद छटा बिखेरती है। इस महल के ऊपरी छत से जब हम आसपास नजरे दौड़ा रहे थे हमे हवा महल के पीछे ही जंतर मंतर और उससे थोड़ा और पीछे की तरफ इसर्लेट दिखा और थोड़ा सा धुंधलाता हुआ पहाड़ी के ऊपर किला भी दिखा।

ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए जहां काफी संकरे स्लोप हैं तो ऊपर पहुंचने के बाद वहां रुकने के लिए भी काफी कम जगह ही है। इसी वजह से गार्ड एक बार में केवल दस से बारह लोगो को ऊपर जाने दे रहे थे वो भी ऊपर से लोगो के नीचे आ जाने के बाद और वहां व्यतीत करने के लिए समय भी कम दिया जा रहा था।

पुरातात्विक संग्रहालय

भीड़ बहुत ज्यादा थी और सभी को वहां व्यतीत करने के हेतु बराबर समय देने के लिए इस तरह की व्यवस्था जरूरी भी थी । महल के नीचे की मंजिल पर आने के बाद हम गए यहां बने एक पुरातात्विक संग्रहालय में। जिसमे कुछ पुरातात्विक स्तंभ के भाग और ढेरों पुराने वाद्य यंत्र है, उनकी पूर्ण जानकारी है, जो आज चलन में भी नहीं हैं।

प्रताप मंदिर

 

जब हम सवाई प्रताप सिंह के निजी कक्ष में पहुंचे तो वहां हमने महाराज प्रताप सिंह की एक खड़े मुद्रा में मूर्ति देखी जिनके एक हाथ में रुद्राक्ष सी दिखने वाली माला और दूसरे हाथ में पंक्षी पंख से बनी कलम है। कहा जाता है इस कक्ष में महाराज भगवान श्री कृष्ण की वंदना किया करते थे, उनके लिए भक्तिरस की कविताएं लिखा करते थे, इसी वजह से इसका नाम प्रताप मंदिर पड़ गया।

इस कक्ष के बाहर बना बरामदा शुभम भवन्तु नाम से जाना जाता है जिसे फूलों और लताओं से सजाकर कृष्ण भक्ति के लिए सुगंधित मनोरम वातावरण बनाया जाता था। हवा महल के बारे में स्वयं महाराज ने डिंगल भाषा में लिखा था –

हवा महल थाटे कियों, सब समझो यह भाव।
राधा कृष्ण सिधारसी, दरस परस का भाव।।

इस प्रताप मंदिर प्रांगण में आकर हम सब भी भक्तिमय हो गए थे। एक प्रकार की पॉजिटिव एनर्जी है इस भवन में।

 

खूबसूरत फब्बारे

 

जब हम महल में आए थे उस वक़्त फब्बारे बंद थे पर अब संचालकों ने उसे चालू कर दिया था। इस फब्बारे की एक सीधी धार भी महल की लाल गुलाबी दीवार और आसमान के नीले रंग में एक सफेद सी रेखा खींच रही थी जिसे देख कर लगता था जैसे ये उस आसमान को भेद कर उसके पार चली जाएगी।

 

 

महल से बाहर आते हुए हम एक अजीब से भाव से ग्रस्त हो चुके थे। हम इस महल को अब केवल एक इमारत की तरह नहीं बल्कि मंदिर की तरह देख पा रहे थे, जहां जाकर सारी भौतिकता खत्म हो जाती है वैसे ही जैसे महाराज सवाई प्रताप सिंह बाहर से भले ही एक राजा थे पर भीतर से भगवान श्री कृष्ण के एक अनन्य भक्त थे ठीक वैसे ही यह महल भी बाहर से बिल्कुल शाही और विशेष प्रकार से अलंकृत है पर भीतर से उतना ही साधारण और सामान्य है। हमारी आंखों को जितनी इसकी भव्यता रास आयी थी उतनी ही इसकी शालीनता हमारे मन में बस गई थी।


 

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लेखिका के बारे में


तुलिका पांडेय गोरखपुर से हैं. लखनऊ में रहती हैं. अंग्रेज़ी साहित्य में मास्टर किया है पर लिखती हिंदी में हैं. अंडमान नीकोबार आइलैंड सहित आठ शहरों में घूम चुकी हैं. कहती हैं कि उनके पैरों में पहिए लगे हैं. उन्होंने हाल ही में की अपनी राजस्थान यात्रा के क़िस्से हमें लिख भेजे हैं. 

 

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