हमारे बीच वो लोग अभी ज़िंदा हैं : जयपुर यात्रा भाग-3

तुलिका पांडेय गोरखपुर से हैं. लखनऊ में रहती हैं. अंग्रेज़ी साहित्य में मास्टर किया है पर लिखती हिंदी में हैं. अंडमान नीकोबार आइलैंड सहित आठ शहरों में घूम चुकी हैं. कहती हैं कि उनके पैरों में पहिए लगे हैं. उन्होंने हाल ही में की अपनी राजस्थान यात्रा के क़िस्से हमें लिख भेजे हैं. आज पेश है इस यात्रा वृत्तांत का तीसरा भाग.

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आज हमें जाना था जयगढ़ किला, आमेर किला/पैलेस, और जल महल। ये किले एक ही मार्ग में स्थित हैं। हालांकि नाहरगढ किला भी इसी मार्ग पर है पर हमारी गलती और ऑटो अंकल की स्वार्थी बुद्धिमत्ता की वजह से हम वो पहले दिन ही देख चुके थे। दूसरे दिन भी हम ट्रैवल एजेंट की गैर जिम्मेदराना रवैये की वजह से इन जगहों को नहीं देख पाए थे। सो आज का हमारा दिन था इन किलो के नाम।

गाड़ियों के साथ हमारे छत्तीस के आंकड़े को देखते हुए कल ही हमने एक ऑटो वाले भाई से बात कर ली थी। हमारा आज का दिन शायद अच्छा जाने वाला था। आज सुबह से सब कुछ पॉजिटिव जा रहा था। इसी क्रम में हमारे ऑटो वाले भाई भी दिए हुए समय से पहले ही हमारे होटल के सामने पधार पहुंचे थे। इसलिए तनिक भी देर ना करते हुए हम सब भी झटपट ऑटो में सवार होकर निकल पड़े आमेर की तरफ। आमेर राजधानी जयपुर से 11 कि.मी. उत्तर में स्थित एक कस्बा है जिसका विस्तार 4 वर्ग किलोमीटर है। जयगढ़ किला और आमेर किला दोनों ही अरावली पर्वतमाला में चील का टीला नामक पहाड़ी पर स्थित हैं।

रास्ता पहाड़ी था। एक तरफ सूखी बंजर सी दिखने वाली ऊंची टिलाएं तो दूसरी तरफ वैसी ही सूखी खाई। इसे देख कर इसके वीरान और अकेले होने का दुखद एहसास होता था। सैकड़ों गाड़ियां थी इन रास्तों पर, पर ये रास्ते फिर भी अकेले से थे। पतली सड़क होने की वजह से गाड़ियां एक दूसरे के पीछे कतारबद्ध होती हुई, तो कभी कभी बगल से रास्ता बनाती हुई निकल रही थी। यहां राजस्थान की गाड़ियों से कहीं ज्यादा दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड की गाड़ियां दिख रही थी, और आश्चर्य तो तब हो रहा था जब उनके बीच पश्चिम बंगाल, असम, सिक्किम, कर्नाटक की भी गाड़ियां गुजर रही थी। भारत के पूर्वी और दक्षिणी कोनों से भी लोग देश के राजपूताना और मुग़ल इतिहास के साक्षी बनने आए थे। निःसंदेह साल का यह समय (दिसंबर,जनवरी, फरवरी) राजस्थान पर्यटन का सबसे व्यस्त समय होता है।

इन पहाड़ी रास्ते में जाते हुए आपको तरह तरह के पंछी दिख जाएंगे। हालांकि ऑटो में बैठने का सबसे नकारात्मक पक्ष ये है कि इसकी सीट ऊंची होने और साइड रूफ नीचे की तरफ मुड़ी होने की वजह से आप बाहर आसानी से नहीं देख सकते। फिर भी हम सिर झुका कर बाहर देखते रहे क्योंकि एक बार शहर की भीड़ में वापस आने के बाद हम प्रकृति का ये असली स्वरूप नहीं देख पाएंगे। इन पहाड़ों को, इन पेड़ों को, इन पंक्षियों को, प्रकृति ने ही बनाया है,उसने ही उकेरा है। कुछ भी कृत्रिम नहीं था यहां। इस तरह हम प्रकृति के सामने नतमस्तक होकर उसे सम्मान दे रहे थे, इन सभी चीजों के लिए अपना आभार प्रकट कर रहे थे। इस कृतज्ञता भरी भावनाओं से ओतप्रोत हम कब जयगढ़ किले तक पहुंच गए पता भी नहीं चला।

अच्छी बात ये थी कि हमने कल ही 300/ व्यक्ति के हिसाब से अपने लिए कंपोजिट टिकट ले लिया था। जिसके अन्तर्गत जयपुर के अन्य मुख्य पर्यटन स्थलों के साथ साथ ये दोनों किले भी सम्मिलित थे। सो हमें टिकट सम्बंधित कोई दिक्कत नहीं हुई। हमे वहां टिकट के लिए नहीं रुकना पड़ा था। यहां आकर हमें पता चला कि 100 रुपए की ग्रांट टिकट लेकर हम अपनी गाड़ी को अंदर तक ले जा सकते थे। पर हमने ऐसा नहीं किया था। हम पैदल ही चल पड़े थे। यहां बच्चो की 2-3 कतारें देख कर लग रहा था किसी स्कूल का टूर भी था आज। जो कभी बिल्कुल शांत सुशील आज्ञाकारी बच्चे थे तो कभी किले को कंपा देने लायक शोर करते हुए साक्षात शैतान के रूप थे।

खैर इन किलों को देखकर एक बात तो हमेशा ही मन में आती है की उस समय जब कोई उपकरण नहीं थे,जब कोई सीमेंट,गिट्टी और सरिया नहीं प्रयोग होता था तब के बने हुए ये किले आज हज़ारों सालों बाद भी कैसे बेख़ौफ़ खड़े हैं जबकि आज के उन्नत तकनीक द्वारा बनायी जाने वाली घर,सड़क,इमारतें कैसे कुछ वर्षों में ही धराशाई हो जाती है। ये सोचते हुए और विमर्श करते हुए ही हम अब प्रवेश कर चुके थे जयगढ़ किला परिसर के भीतर। बताती चलूं इस दुर्ग का निर्माण जयसिंह द्वितीय ने 1726 ई. में आमेर दुर्ग एवं महल परिसर की सुरक्षा हेतु करवाया था और इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। इस किले को विजय किला भी कहा जाता है। आमेर पैलेस से लेकर जयगढ़ किले तक लगभग 4 किलोमीटर की खूफिया सुरंग है, जिससे किसी भी युद्ध जैसी आपातकालीन घटना के दौरान राजपरिवार को सुरक्षित आमेर पैलेस से निकाल कर इस फौलादी किले या यूं कहिए सैन्य बंकर तक लाया जा सके।

अगर आप देखेंगे तो समझ जाएंगे कि इसे आमेर किले के आकार का ही बनाया गया है। हूबहू आमेर पैलेस फर्क बस इतना है कि आमेर पैलेस राज परिवार का निवास स्थान था तो जयगढ़ किला सेना का बंकर। जहां से सैनिक दिन रात आमेर पैलेस की निगरानी करते थे। इस किले के दो प्रवेश द्वार है जिन्हें दंगुर दरवाजा और अवानी दरवाजा कहा जाता है जो क्रमशः दक्षिण और पूर्व दिशाओ पर बने हुए है। इस किले की बाहरी दीवारें लाल बलुआ पत्थरों से बनी हैं और दीवारों पर राजपूती और मुग़ल कालीन शिल्प और वास्तुकला के मिश्रित बेहतरीन नमूने है।

किले के प्रत्येक कोने में ढलानदार प्राचीरें हैं जो ऊपरी संरचनाओं तक पहुंच प्रदान करती हैं। किले में जालीदार खिड़कियों वाली कोर्ट रूम और हॉल भी हैं। यहां हमने रानियों और राजाओं का आमने सामने बना भोजनालय देखा और उनके विश्राम गृह भी देखे। कभी कभी राज परिवार इस किले में भी अपना समय बिताया करता था। एक उभरे हुए मैदान पर एक केंद्रीय वॉच टॉवर भी है जो आसपास के परिदृश्य का 360 व्यू प्रदान करता है। परिसर के उत्तरी किनारे पर अराम मंदिर है। यहां एक चारबाग़ उद्यान है। इसे देखते ही आप समझ जाएंगे कि इसकी बनावट मुगलिया शैली में है। ये आज भी उतना ही खूबसूरत दिखता है जैसा कि वो पहले कभी होगा। हालांकि इसमें प्रवेश वर्जित है पर आप किले कि प्राचीर से इसे देख सकते है। मै सशर्त कह सकती हूं कि ये बाग देखने के बाद आपको एक बार उसमे उतर कर टहलते का मन जरूर करेगा।

यहां पर एक द्वार है जिसे अवनी द्वार कहा जाता है। इसके बाहर ही एक कृत्रिम झील बनाई गई थी जिसका नाम सागर झील था। इस झील से हाथियों के द्वारा और फिर मनुष्यों द्वारा पानी किले के भीतर लाया जाता था। इसके ऊपर ही किले की दीवारों के साथ लाल और पीले रंग में रंगा हुआ ट्रिपल आर्क गेटवे है। यह पूर्व-पश्चिम दिशा में है और पश्चिम की ओर खुलता है।  यह इंडो-फ़ारसी शैली में है। किले के परिसर के भीतर दो मंदिर हैं, एक 10 वीं शताब्दी का राम हरिहर मंदिर और दूसरा 12 वीं शताब्दी का काल भैरव मंदिर है। किले में जल आपूर्ति के लिए अरावली के आसपास जल संचयन संरचनाएं बनाई गई थी। आप देख सकते हैं कि कैसे नहर के माध्यम से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी से पानी किले में बनाई गई टैंको तक पहुंचाया जाता था। अद्भुत था ये। हमारे टूर गाइड ने बताया कि कैसे कछवाहा शासनकालीन खजाने की एक अफवाह के मद्देनजर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी ने इस किले की और इन टैंको की खोज कराई थी आपातकाल के दौरान। खोज तो बेकार गई थी क्योंकि कोई खजाना नहीं मिला था आयकर विभाग और सेना को पर इस खोज की खबर संसद में जरूर ली गई।

ये हिस्सा देख कर और इससे जुड़ी रोचक कहानियां सुन कर हम बढ़ चले अार्मरी की तरफ। यहाँ की अर्मेरी में तलवारों, ढालों, बंदूकों, कस्तूरी और 50 किलोग्राम (110 पौंड) की तोप रखी हुई है । यहां पर जयपुर के महाराजाओं, सवाई भवानी सिंह और मेजर जनरल मान सिंह द्वितीय की पुरानी तस्वीरें हैं, जिन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों के रूप में भारतीय सेना में कार्य किया। तस्वीरें देखते हुए आपको राजशाही शान और अंदाज का पता चलेगा।

यहां से हम आगे बढ़े तो आ पहुंचे संग्रहालय में, जो अवामी गेट के बाईं तरफ स्थित है; इसमें जयपुर के रॉयल्टी, टिकटों और कई कलाकृतियों की तस्वीरों का प्रदर्शन किया गया है, जिसमें कार्ड का एक सर्कुलर पैक शामिल है। संग्रहालय में 15 वीं शताब्दी के महलों की हाथ से तैयार मैप भी देखी जा सकती हैं।

ये सब देखने के बाद अब हम जाने वाले थे वो देखने या उसके दर्शन करने जिसके लिए ये किला विश्व प्रसिद्ध है। जिसका ये घर भी माना जाता है। जिसके कमरे की टीनदार छत आपको यहां आते हुए सड़क से ही दिख जाती है। वैसे तो ये किला बहुतायत शस्त्रों का भंडार था,राजपूतों का तोपखाना और फाउंड्री हुआ करता था। पर एक ऐसा शस्त्र है जिसने इसी फाउंड्री में जन्म लिया और आज तक यहीं स्थित हैं। वो है “जयवाण तोप”।

जयवाण तोप का निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय (1699-1743) के शासनकाल में जयगढ़ किले की ही एक फाउंड्री में हुआ था। ऐसा यहां एक बोर्ड पर लिखा हुआ है,और हमारे गाइड ने भी यही बताया कि तोप को केवल एक बार 100 किलोग्राम बारूद के चार्ज के साथ निकाल दिया गया था और जब फायरिंग की गई तो लगभग 35 किलोमीटर की दूरी तय की गई। यह इसकी ट्रायल फायरिंग थी। इसके बाद इसे कभी उपयोग नहीं किया गया क्योंकि कभी उसकी जरूरत ही नहीं पड़ी। हम सबने इतिहास थोड़ा बहुत पढ़ा है और हम सब जानते हैं कि राजपूतों के तत्कालीन हिंदुस्तान के शासकों अर्थात् मुगलों के साथ बहुत अच्छे और पारिवारिक संबंध भी थे। जिसके कारण उनके बीच कभी युद्ध की स्थिति ही उत्पन्न नहीं हुई। ये जयगढ़ किले पर हमारा आखिरी पड़ाव था। हम पहले ही दोपहर के 2 बजा चुके थे इसलिए अब हमें आमेर फोर्ट की तरफ निकलना था।

सुबह से घूमते घूमते अब भूख भी दस्तक दे चुकी थी। सो हमने किले से बाहर निकलते हुए ही वहां बने हुए रेस्टोरेंट और टी स्टॉल से कुछ हल्का नाश्ता खा पी लिया।

अब हम वापस अपने ऑटो के पास आ गए,ऑटो वाले भाई वही इंतज़ार कर रहे थे हमारे लिए। उन्होंने हमसे कहा भी कि आपने बहुत समय लगा दिया जयगढ़ में,ऐसा भी क्या है यहां। हमने विनम्रता से उनसे कहा कि भाई हम दिल्ली से यहां तक बस टहलने नहीं आए है। इतिहास को देखने, महसूस करने,समझने और उसे जीने आए हैं। उन्होंने भी हमारी बातों पे अपनी हामी भरी और हम चल पड़ें आमेर फोर्ट की तरफ।

उन्हीं रास्तों पर वापस लौट रहे थे पर फिर भी वो नया लग रहा था। जाते हुए ये पहाड़ मुझसे दूर थे क्यों की मै खाई की तरफ बैठी हुई थी और अब ये मेरे पास थे। सूखे बेज़ार जैसे जीवन ही ना हो उसमे। पर ये कैसे हो सकता है, लाखों जीवों और पेड़ पौधों को अपने आंचल में पालने वाले इस पहाड़ में जीवन ना हो ये कैसे हो सकता है। बेशक ये हमसे कहीं ज्यादा जीवित है क्योंकि ये दूसरो को जीवन और आसरा देती है। ये बातें अभी जहन में चल ही रही थी कि ऑटो के हॉर्न ने मुझे वापस इस दुनिया में ला पटका। तब मैंने देखा कि ये आसान नहीं होने वाला था। बहुत ज्यादा भीड़ थी यहां। उस वक़्त भी खुशी बस इसी बात की थी कि हमारे पास टिकट पहले से थे। सो इस भीड़ को देखते हुए हमने सोचा क्यों ना पहले भोजन कर लिया जाए। वहां किले के सामने कुछ रेस्टोरेंट दिख रहे थे। सो हम जा पहुंचे वहां। अपनी क्वालिटी के हिसाब से ये रेस्टोरेंट काफी महंगे थे, पर मजबूरी भी थी, लंच तो करना था। वो भी वेजेटेरियन खाना। यहां आपको नॉन वेज भोजन नहीं मिलेगा। लंच करके हम चल पड़े आमेर फोर्ट की तरफ।

इस किले को नीचे से देखते हुए मेरी तो नज़रें ही नहीं हट रही थी इससे। बेहद खूबसूरत महल। जब आप पहाड़ी के नीचे स्थित मावठा झील में देखते हैं तो ऐसा लगता है मानो ये किला अपनी खूबसूरती निहार रहा है इस झील में। किले की पूरी छवि को इस झील में देखना अद्भुद एहसास देता है। झील के बगल में बने मार्ग से जब आप किले की तरफ बढ़ते हैं तो एक अलग तरह का रोमांच होता है मन में। आपको भी राजशाही होने का भ्रम हो सकता है। आमेर पैलेस यूं तो यहां से बहुत पास दिखता है पर असल में वो अभी बहुत दूर है।

यहां बिना अल्प या पूर्ण विराम लिए शुरू हो चुके थे हमारे गाइड महोदय –

कचवहा राजपूत मानसिंह प्रथम ने इसका निर्माण 1558-1592 के मध्य कराया। जिसका पुनर्निर्माण और सुधार कार्य सवाई जयसिंह ने कराया। यह किला लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना हुआ है। यह किला व महल अपने कलात्मक विशुद्ध हिन्दू वास्तु शैली के घटकों के लिये भी जाना जाता है। किला विशाल प्राचीरों, द्वारों की शृंखलाओं और पत्थर के बने रास्तों से भरा हुआ है। पत्थर के ये ढलानदार और कभी कभी सीढ़ी नूमा रास्ता इतना लंबा है कि किसी भी व्यक्ति को थका सकता है। पर इनपर चल कर किले तक पहुंचने की वो चाह थकान को आप पर हावी नहीं होने देती है।

सीढ़ियां तो अब तक बहुत चढ़ ली थी हमने। अब हम पहुंच चुके थे किले की मुख्य द्वार पर। हालांकि ये किला 4 मुख्य भागों में बंटा हुआ है और प्रत्येक के अपने प्रवेश द्वार और अपने विशाल प्रांगण हैं। हम सब भी सूरज पोल से होते हुए जलेब चौक आ पहुंचे। यह इस किले का मुख्य और सबसे विशाल प्रांगण है गाइड महोदय ने हमे बताया कि किसी युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात इसी प्रांगण में विजय जुलूस निकाली जाती थी। पूर्व दिशा की तरफ खुलने की वजह से ही इस द्वार का नाम सूरज पोल रखा गया था। राजशाही अतिथियों के महल में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार होने के साथ साथ भगवान सूर्य नारायण के महल में प्रवेश का भी यही मुख्य द्वार था। जलेब चौक दरअसल अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका मतलब होता है सैनिकों के एकत्रित होने का स्थान। इसका निर्माण सवाई जय सिंह के शासनकाल (1693-1743 ई॰) के बीच किया गया था। इस प्रांगण के बगल में ही अस्तबल बना है, जिसके ऊपरी तल पर राजा व राजपरिवार के अंगरक्षकों के निवास स्थान थे।

जलेब चौक से हम आगे बढ़े और एक सीढ़ीनुमा रास्ते से हुए महल के मुख्य भाग में आ पहुंचे। यहां प्रवेश करते हुए दाई तरफ शीला देवी का मंदिर है,जिसके द्वार का निर्माण चांदी के पर्त से किया गया है। उसपर उभरी माँ दुर्गा के नौ स्वरूप देखते बनते हैं। हमारी टाइमिंग आज फिर गलत ही थी क्योंकि एक बार फिर मंदिर के कपाट बंद थे। सो हमलोग ने भी बाहर से ही माता रानी को मन में स्मरण करके प्रणाम किया और आगे बढ़ चले।

प्रथम प्रांगण से होते हुए सीढ़ी द्वारा हम द्वितीय प्रांगण में पहुंचे, जहां दीवान-ए-आम बना हुआ है,नाम से ही पता चलता है कि इसका प्रयोग जनसाधारण के दरबार हेतु किया जाता था। दोहरे खंभो की कतार से घिरा दीवान-ए-आम संगमरमर के एक ऊंचे चबूतरे पर बना लाल बलुआ पत्थर के 27 खंभों वाला हॉल है। इसके खंभों के ऊपरी भाग पर जो कि हॉल के छत से लगती हैं,उस पर हाथी के शीश रूपी स्तंभशीर्ष बने हैं एवं उनके ऊपर अन्य सुंदर चित्र उकेरे गए हैं। यह एक खुला हुआ बड़ा हॉल है। हम ऐसे वक़्त पर जयपुर आए थे जो राजस्थान पर्यटन का सबसे व्यस्त समय होता है। इसका प्रमाण हमें हर जगह मिल रहा था। इस वक़्त दीवान ए आम सचमुच दीवान ए आम ही लग रहा था,बहुत सारे लोग थे यहां। प्रजा थी, कमी बस महाराज की थी।

इसके बाद हम बढ़े गणेश पोल की तरफ। नाम से ही जाहिर है इस द्वार का नाम भगवान श्री गणेश के नाम पर था क्योंकि इस द्वार के ठीक ऊपर श्री गणेश की सुंदर प्रतिमा है। यह द्वार है इस किले के तीसरे प्रांगण का, जो की महाराज का निजी आवास होता था। इस द्वार के ऊपर सुहाग मन्दिर बना हुआ है, जहां से राजवंश की महिलायें दीवान-ए-आम में आयोजित हो रहे समारोहों आदि को बिना किसी की नजर में आए झरोखों से देखा करती थीं। इस द्वार की नक्काशी और चित्रकारी आपको इसे देखते रहने के लिए मजबूर जरूर करेगी। हमारे गाइड ने बताया कि इस द्वार के कलात्मक चित्रों का बखान सुनकर मुग़ल बादशाह औरंगजेब इतना चिढ़ गया था कि उसने इसे बनाने वाले सभी कारीगरों को मौत की सजा सुना दी और इन चित्रों को चुने व गारे से ढकवा दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि औरंगजेब ने अपने शासन के दौरान सभी तरह के कला पर प्रतिबंध लगा रखा था। पर समय के साथ जैसे जैसे ये चुने व गारे की परत गिर रही है वैसे वैसे इन चित्रों को देखा जा सकता है।

इस द्वार की खूबसूरती आपको अपने साथ तस्वीर लेने के लिए सौ प्रतिशत मजबूर करेगी। हमने भी तस्वीरें ली और आगे बढ़े और द्वार को पार करते हुए प्रवेश कर गए किले के उस भाग में जो राज परिवार का निजी आवास था। इसे देख कर जो पहली बात मन में अाई वो थी..”परियों के देश जैसा” है ये सब। मुगल बाग शैली के अनुसार मध्य में बने उद्यान के दोनों तरफ ठीक आमने सामने बनी 2 बेहद खूबसूरत इमारतें। क्रमशः जय मंदिर( शीश महल) और सुख महल।

प्रवेशद्वार के बायीं ओर की इमारत को जय मन्दिर कहते हैं। इस महल की दीवार संगमरमर की हैं जिसपर शीशे से जड़े हुए है और इसकी छत पर भी बहुरंगी शीशों का उत्कृष्ट प्रयोग कर अतिसुन्दर मीनाकारी व चित्रकारी की गयी है। अगर आप ध्यान से देखें तो इसके शीशे अवतल हैं जिसकी वजह से ये मोमबत्ती के प्रकाश में तेज चमकते एवं झिलमिलाते हुए दिखाई देते हैं। इसका निर्माण इस तरीके से शायद इसलिए किया गया था क्योंकि उस समय सूर्यास्त के बाद यहाँ मोमबत्तियों का ही प्रयोग किया जाता था। शीशे से जड़े होने के कारण ही इसे शीश-महल कहा जाता था। शीश महल का निर्माण मान सिंह ने 16वीं शताब्दी में करवाया था और ये 1727 ई॰ में पूरा हुआ। यहां लगे बोर्ड के अनुसार यहां की दर्पण एवं रंगीन शीशों की पच्चीकारी, मीनाकारी और नक्काशी को देखते हुए कहा गया है कि जैसे “झिलमिलाते मोमबत्ती के प्रकाश में जगमगाता आभूषण सन्दूक “।

जय मंदिर से मावठा झील बहुत सुंदर दिखता है। हालांकि समय के साथ साथ 1970-80 के दशक तक इस महल की कारीगरी लगभग खत्म होने के कगार पर थी जिसे देखते हुए इसका पुनरोद्धार एवं नवीनीकरण कार्य आरम्भ कराया गया जिसकी बदौलत यह महल अपनी मिटती हुई खूबसूरती को वापस पा सका। यह महल निहायत ही खूबसूरत है। इसे देखते हुए कब इतना समय निकल गया हमे पता भी नहीं चला।

हम अब इस मुगलिया अंदाज से बने बाग के बगल से शाही अंदाज में टहलते हुए आगे बढ़ रहे थे, कमी केवल हाथों में एक गुलाब के फूल और सिर पर ताज की थी। इसी अंदाज के साथ हम पहुंचे दूसरे प्रांगण में जिसे सुख निवास या सुख महल नाम से जाना जाता है। चंदन की लकड़ी से बना है इस भवन का प्रवेश द्वार जिसमें जालीदार संगमर्मर का कार्य है। गाइड ने बताया कि कैसे पाइपों से लाया गया पानी यहां एक खुली नाली द्वारा बहता रहता था, जिसके कारण इस भवन का वातावरण राजस्थान कि भयंकर गर्मी में भी ठंडा बना रहता था। इन नालियों से होते हुए यह पानी उद्यान की क्यारियों में जाता था।

इस महल का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार एक डोली जैसा ही है। डोली महल से पहले एक भूल-भूलैया भी बनी है। इसके बारे में बताते हुए शायद हमारे गाइड को भी बहुत मजा आ रही थी। वो बहुत रोचक तरीके से बता रहा था कि यहाँ पर महाराजा अपनी रानियों और पटरानियों के साथ लुका छिपी का खेल खेला करते थे। राजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब वे लड़ाई से लौटकर आते थे तो सभी रानियों में उनसे सबसे पहले मिलने की होड़ लग जाती थी। तब राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में घुस जाते थे और जो रानी उन्हें सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी, बिना विवाद उसके साथ चले जाते थे। इतने उत्साहित और आनंद में हमारे गाइड महोदय अभी तक किसी भी भवन में नहीं थे,यह तक की शीश महल में भी नहीं जहां हम सब इतने उत्साहित थे।

इस प्रांगण के दक्षिण में मानसिंह प्रथम का महल है और यह महल का सबसे पुराना भाग है। यह महल राजा मान सिंह प्रथम के शासन काल (1589-1614 ई॰) के दौरान 1599 ई॰ में बन कर तैयार हुआ। यह यहां का मुख्य महल है। इसके केन्द्रीय प्रांगण में खंभों वाली बारादरी ( एक प्रकार का बैठक,जिसके 12 द्वार होते हैं) है जिसकी सजावट रंगीन टाइलों एवं भित्तिचित्रों द्वारा निचले व ऊपरी, दोनों ही तल पर की गई है। इस महल को बाकी महल से अलग और एकांत में बनाये रखने के कारण पर्दों से ढंका जाता था और इसका प्रयोग यहां की महारानियां अपनी बैठकों और मिलने जुलने के लिए किया करती थीं।

महल के इसी भाग में जनाना ड्योढ़ी है, जिसमे राजमाता, पटरानी और राजपरिवार की अन्य महिलाएं रहती थी। उनके साथ में ही दासियों के कमरे भी बने हुए हैं। यहाँ पर जस मन्दिर नाम से एक निजी कक्ष भी है, जिसमें कांच के फ़ूलों की महीन कारीगरी की गई है और साथ में प्लास्टर ऑफ पेरिस से नक्काशी भी कि गई है। इस किले या महल को देखते हुए आप समझ सकते हैं राजपूती वास्तुकलाके क्षेत्र में कितने धनी थे और अन्य किसी शैली को अपनाने में भी वो गुरेज नहीं करते थें। पी

इसकी राजपूताना – मुग़ल शैली कि अद्भुद वास्तु और शिल्प कला को देखते हुए ही यूनेस्को ने इसे राजस्थान के अन्य 5 पर्वतीय किलों (चित्तौड़ किला, गागरौन किला, जैसलमेर किला, कुम्भलगढ़ किला एवं रणथम्भोर किला) के साथ 2013 में विश्व धरोहरों में सम्मिलित किया।

इस किले/पैलेस में बहुत सारी बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों जैसे जोधा अकबर, मुगल ए आजम, भूल भुलैया, शुद्ध देसी रोमांस, नार्थ वेस्ट फ़्रन्टियर, और द बेस्ट एग्ज़ॉटिक मॅरिगोल्ड होटल आदि की शूटिंग हो चुकी है। हाल फिलहाल फिल्म बाजी राव मस्तानी के लिए मोहे रंग दो लाल गीत में हम मावठा झील और कैसर बाग़ को बैंक ग्राउंड में देख सकते हैं। यह महल जितना खूबसूरत इन फिल्मों में दिखाया गया है उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत आप इसे अपने सामने से पाएंगे। बस वहां जाकर एक बार इतिहास को महसूस कीजिए।

हालांकि जानकर बहुत दुख हुआ कि किसी फिल्म की शूटिंग के लिए सेट निर्माण के दौरान इस किले की जालेब चौक, चांद महल और कुछ अन्य स्थानों को काफी नुकसान हुआ था। जिसकी वजह से कोर्ट ने दखल देकर शूट को रोक दिया था। हम सब को ये ध्यान रखना चाहिए कि ये हमारी सांस्कृतिक विरासत है,  ये हमारे देश के गौरवशाली इतिहास का जीवित प्रमाण है और हम जब भी ऐसे किसी स्थान पर जाते हैं तो हमें इनकी सुरक्षा और सफाई का ध्यान रखना चाहिए। अगर दूसरे देशों से आए हुए लोग इन बातों का ध्यान रख सकते हैं तो हम क्यों नहीं।

हमने आमेर फोर्ट देख तो लिया था पर बहुत ज्यादा भीड़ होने की वजह से हम उस हद तक संतुष्ट नहीं थे जैसा की हमे होना चाहिए था,और हो भी क्यों ना आखिर शिद्दत से इसे देखने की इच्छा थी इसे हमारे दिलों में। खैर शाम हो रही थी इसलिए हमे यहां से निकलना भी था। इस बीच में ऑटो वाले भाई की कॉल भी आ चुकी थी 2-3 बार। अब हमे निकलना ही था। बाहर आते हुए पास की मिठाई की दुकान से हमने प्रसाद लिया और भैरवनाथ जी मंदिर के( छोटा सा मंदिर है यहां) दर्शन किए। फिर निकल पड़े सीढ़ियों से उतरते हुए अपने ऑटो की तरफ।

काफी भीड़ होने की वजह से हमारी ऑटो हमसे लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर लगाई थी भाई ने। हम ऑटो ढूंढ रहे थे तभी ऑटो वाले भाई हमे दिख गए और अपने साथ ऑटो तक ले गए। हुजूम लोगो का इस कदर था की गाड़ियों को स्टैंड से बाहर निकलने के लिए भी जगह नहीं मिल रही थी और निकलने के बाद वो वहां खड़े नहीं हो सकते थे अपनी सवारी को बैठाने के लिए। सो जैसे ही ऑटो वाले भाई ने ऑटो निकाली वो हमसे लगातार फटाफट बैठ जाने के लिए कहने लगे जब तक कि हम सब रेंगती हुई ऑटो में बैठ नहीं गए। अब हम पहाड़ों की ठंडी हवा अपने चेहरों पर लेते हुए और आत्मा तक उतारते हुए बढ़ चले थे हवा महल की तरफ। वाकई दिन भर जितनी गर्मी थी यहां दिसंबर के महीने में, शाम के वक़्त की हवा उतनी ही ठंडी थी पर इस हवा ने हमारी सारी थकान को भी जैसे अपने झोंको से कहीं उड़ा दिया था। हम एक बार फिर तरो ताज़ा हो गए थे। हम जैसे ही जल महल के सामने पहुंचे,हमारे ऑटो चालक ने बताया कि यहां इस वक़्त गाड़ी लगाने की अनुमति नहीं है,इसलिए मै 5-10 मिनटों के लिए कहीं ऑटो लगा लेता हूं और आप सब जल महल के तस्वीरें लेकर आ जाइए। हमें भी ठीक लगी ये बात क्योंकि जल महल

मान सागर झील के बीचों बीच बना हुआ है और आप इसे पास जाकर नहीं देख सकतें। हम ऑटो से उतरकर रोड पार करते हुए आ गए उस स्थान पर जहां खड़े होकर लोग जलमहल के साथ तस्वीरें लेते हैं। जलमहल को आईबॉल के साथ साथ रोमांटिक महल के नाम से भी जाना है। रोमांटिक क्यों,ये तो आप जब इसे देखेंगे तो जान जाएंगे। महाराजा जयसिंह अपनी रानियों के साथ रोमांटिक समय बिताने यहां आया करते थे। यह वर्गाकार दो मंजिली इमारत राजपूताना शैली में बनाई गई है। हमने सुना कि चांदनी रात में मान सागर झील के पानी में यह महल बेहद खूबसूरत दिखता है। आप चांदनी रात में भले ना देख पाएं इस महल को लेकिन आप इस बात पर विश्वास जरूर कर लेंगे क्योंकि बग़ैर चांदनी रात के भी झील के पानी में ये महल बहुत खूबसूरत दिखता है। जलमहल को अब पक्षी अभ्‍यारण के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। यहाँ की नर्सरी में 1 लाख से अधिक वृक्ष लगे हैं जिसमें राजस्थान के सबसे ऊँचे पेड़ भी पाए जाते हैं।

जलमहल के आसपास कपड़ों के,आर्टिफिशियल ज्वेलरी के, सजावट की वस्तुओं के लिए छोटी छोटी दुकानें हैं और बच्चो के लिए कुछ एक्टिविटी उपलब्ध हैं। यहां पर भी जल महल के साथ पारंपरिक वेशभूषा में तस्वीर बनाने वाले मिल जाएंगे जो 100/पिक्चर के हिसाब से तस्वीर बनाते हैं।

यहां जल महल के पास भी 20-25 मिनट गुजार कर हम अपने होटल को आ गए। ये था हमारा जयपुर में व्यस्ततम और हां थका देने वाला दिन, पर वो कहते हैं ना “फूल पैसा वसूल”, यही दिन था ये हमारे लिए।

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