हमारे बीच वो लोग अभी ज़िंदा हैं : जयपुर यात्रा भाग-2

तुलिका पांडेय गोरखपुर से हैं. लखनऊ में रहती हैं. अंग्रेज़ी साहित्य में मास्टर किया है पर लिखती हिंदी में हैं. अंडमान नीकोबार आइलैंड सहित आठ शहरों में घूम चुकी हैं. कहती हैं कि उनके पैरों में पहिए लगे हैं. उन्होंने हाल ही में की अपनी राजस्थान यात्रा के क़िस्से हमें लिख भेजे हैं. आज पेश है इस यात्रा वृत्तांत का दूसरा भाग. ये रहा पहला भाग.

 

आज की यात्रा के लिए एक रोज पहले ही गाड़ी के लिए हमारी बात हो चुकी थी एक लोकल ट्रैवल एजेंट से। एक पूरे दिन के लिए 1300 में स्विफ्ट डिजायर आने वाली थी। हम सब खुश थे की आज ऑटो से सफर नहीं करना पड़ेगा। पर काफी समय बीत जाने के बाद भी हमारी सवारी का कोई अता पता नहीं था। एजेंट से बात करने के बाद पता चला कि वो गाड़ी नहीं भेज पाएगा। ये सरासर उसकी लापरवाही थी। उसने हमारा बहुत सारा समय खराब कर दिया था। अब हमारे पास अपना प्लान रीशड्यूल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। हमने अब जयपुर शहर के अंदर रह कर ही घूमना ठीक समझा। इसलिए हमने उबर पर कैब बुक की और निकल पड़े हवा महल की तरफ।

हम अब कैब में थे। रास्तों को ध्यान से देखते हुए आगे बढ़ रहे थे और एक चीज जो मैंने और मेरी दीदी दोनों ने महसूस की थी वो ये कि यहां लोकल महिलाएं बहुत कम दिखाई दे रही थी।

कुछ समय कैब में गुजारने के बाद अब आगे हमारे सामने था एक बड़ा गेरुआ लाल सा बड़ा गेट । हमारे कैब चालक ने बताया इसका नाम सांगानेरी गेट है। गुलाबी शहर में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वारों में से एक। इसका निर्माण पारंपरिक राजपूताना शिल्प कला के आधार पर ही किया गया था। यह जौहरी बाज़ार ( सोने चांदी के आभूषणों के भंडार के रूप में जाना जाता है। ) के ठीक सामने स्थित है। इसमें प्रवेश करते ही जैसे हम अलग दुनिया में आ गए थे। सड़क के दोनों तरफ एक ही रंग और एक ही साइज की दुकानें थी। अलग सा नज़ारा था ये बिल्कुल। ये सभी दुकानें टेराकोटा पिंक कलर से रंगी हुई थी। इसी वजह से इसे पिंक सिटी का नाम दिया गया था। हमारे कैब ड्राइवर ने कहा इसके पीछे भी इतिहास है। आप सुनना चाहेंगे? हमने एक स्वर में कहा कि जी बिल्कुल सुनाइए,इतिहास देखने,सुनने और महसूस करने के लिए ही तो हम दिल्ली से यहां जयपुर आए हैं।

तब उन्होंने बताना शुरू किया, जिसके अनुसार यहां के महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने प्रिंस अल्बर्ट के 1776 में हिंदुस्तान में 17 सप्ताह के प्रवास के दौरान उनको प्रभावित करने,खुश करने और अपने राजपरिवार और ब्रिटिश राजघराने के बीच आपसी अच्छे संबंध विकसित करने के लिए राजा जी ने प्रिंस अल्बर्ट के नाम पर एक हॉल का निर्माण कराया जिसे अल्बर्ट हॉल कहा जाता है और उसके साथ ही उनके स्वागत में इस शहर के मध्य भाग को टेराकोटा गुलाबी रंग से रंगा दिया। वास्तव में हमारे कैब चालक भी किसी टूर गाइड से कम नहीं थे। उन्होंने हमें हवा महल के सामने छोड़ दिया।

उनको धन्यवाद देते हुए जब हमने अपना ध्यान हवामहल की तरफ मोड़ा तो जो पहला इंप्रेशन हवा महल का खास करके मेरे ऊपर पड़ा वो ये था की उसके ऊपर बेतहाशा धूल जमी हुई थी, पॉल्यूशन का शिकार थी ये बेहतरीन इमारत। इस ऐतिहासिक इमारत से ज्यादा साफ तो वो रास्ते में दिखने वाली दुकानें थीं। शायद उन दुकानों की देखरेख करने वाले ज्यादा कर्मठ थे। बाहर से हमने इसे ठीक से निहारा तस्वीरें लीं। यहां दिसंबर आखिरी के दिनों में भी बहुत गर्मी थी शायद इसलिए यहां नारियल पानी की बिक्री जोर शोर से हो रही थी। यहां पास में ही कुछ राजस्थानी पगड़ी बेचने वालों की भी दुकानें थी जो 50 रुपए एक पीस के हिसाब से पगड़ी बेच रहे थे। देशी तो देशी विदेशी पर्यटकों में इन पगड़ियों को लेकर अलग ही उत्साह था।सभी इन रंग बिरंगी पहाड़ियों में दिखाई दे रहे थे।

रघुनाथ जी को प्रणाम करते हुए हम सीढ़ियों से नीचे उतरे उस मार्ग पर जो जाता है हवा महल की तरफ। सीढ़ियों के नीचे ठीक बगल से ही एक बार फिर दुकानें शुरू हो जाती हैं। हर दुकान से कम से कम 2 लड़के लोगो को घेर रहे थे पारंपरिक राजस्थानी परिधान में फोटो बनवाने के लिए। इस परिसर में रंग बिरंगे कपड़ों के अलावा बच्चों के लिए खिलौने और खाने – पीने की चीजें भी उपलब्ध है।

सीढ़ियों से नीचे उतरते ही जो नज़ारा सामने आया वो देखने लायक था। वहां टिकट काउंटर पर 200 से ज्यादा लोगो की लंबी कतार थी। ये देख कर हमारे तो होश ही उड़ गए थे। कतार को देख कर मुझे हंसी भी आ रही थी, रोना भी और गुस्सा भी। फिर हमने निर्णय लिया कि आज हवा महल रहने देते हैं। कुछ मिनटों में ही ये फाइनल हो गया कि अब इस एरिया की सभी चीजे आखिरी दिन घूमेंगे। इस तरह जो दिन हमने पुष्कर के लिए बचा कर रखा था अब वो हवा महल, जंतर मंतर, इसार्लेट और अल्बर्ट हॉल को समर्पित हो गया था।

सो बचे हुए समय का सदुपयोग करने के लिए हम सब सिटी पैलेस की तरफ निकल पड़े। वहां भी टिकट की लाइन थी। पर इतनी लंबी नहीं थी कि हम वहां खड़े ना हो सकें। मै लाइन में लग गई। 130/ व्यक्ति के हिसाब से मैंने भी टिकट ले लिए।

एक पर्यटक होने के नाते हम सब एक बार फिर एक्साइटेड हो गए थे। फिर हम चल पड़े  सिटी पैलेस के भीतर। बताती चलु की सिटी पैलेस की बाहरी दीवारों का निर्माण जय सिंह द्वितीय द्वारा कराया गया था, जब की भीतर के महल का निर्माण कार्य समय के साथ साथ अन्य लोगो द्वारा कराया जाता रहा। यह पैलेस निःसंदेह मुगल और राजपूती कला के संगम का जीता जागता उदाहरण है।

अंदर प्रवेश करते ही ठीक सामने कठपुतलियों का शो चल रहा था यानी पपेट शो। पपेट शो राजस्थान कि विशेषता है। आप कहीं भी जाएंगे आपको ये देखने को जरूर मिलेगा। जैसे कि कल नाहरगढ फोर्ट में भी हमने ये देख था।  बात अलग है कल हम रुक कर वो एन्जॉय नहीं कर पाए थे। ये शो देखना भी अनोखा अनुभव था। हमने उसे भरपूर एन्जॉय किया और शो मास्टर्स को कुछ पेशगी दी जिसे खुशी खुशी उन्होंने एक्सेप्ट किया। इन पपेट को आप 250 रुपए के दर से खरीद भी सकते हैं। शिकायत इन पपेट शो से बस इतनी है कि ये शो अब पारंपरिक लोक गीतों पर नहीं बल्कि बॉलीवुड के गीतों पर दिखाए जाते हैं।

शो देख कर हम आगे बढ़ निकले, जहां से सबसे पहले सामने दिखता है मुबारक महल.  वीरेंद्र पोल से अंदर घुसते हुए, हमने 19 वीं शताब्दी के अंत में महाराजा माधोसिंह द्वितीय के लिए बनाए गए मुबारक महल को देखा, जो गणमान्य व्यक्तियों के लिए एक स्वागत केंद्र के रूप में बनाया गया है। इसका निर्माण इस्लामिक, राजपूत और यूरोपीय शैली में वास्तुकार सर स्विंटन जैकब द्वारा किया गया था। अब यह महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय का हिस्सा है, जिसमें कश्मीरी पश्मीना सहित शाही वेशभूषा और शानदार शॉल का संग्रह है। यहां पर सवाई माधोसिंह के कपड़ों को देखा जो कि सामान्य कपड़ों से बिल्कुल अलग था या यूं कहो बहुत बड़ा था। गाइड ने बताया कि महाराजा सवाई माधो सिंह जी 2 मीटर लंबे, 1.2m चौड़े और 250kg वजनी शक्स थे । अब हमे समझ आ गया था कि ये वस्त्र ऐसा क्यों था क्योंकि उसके पहले तो हम अपने ही तर्क भिड़ाए जा रहे थे।

इसके बाद हम आर्मरी पहुंचे। यह देश में हथियारों का सबसे अच्छा संग्रह माना जाता। इसे देखने के बाद निःसंदेह मै भी यह कह सकती हूं कि यह देश के शास्त्र संग्रहों में सबसे बेहतरीन है। कई वस्तुओं और हथियारों को भव्यता से उकेरा और जड़ा गया है। शास्त्रों से लगाव रखने वाले लोग यहां निश्चित रूप से खो सकते हैं। शास्त्रों का अद्भुद संकलन है यहां। अगर आप भी पूरी तरह डूब जाएं इस आर्मेरी में तो निश्चित रूप से आप भी वीर रस की कविताओं से ओतप्रोत हो जाएंगे।

कविताएं सुनते सुनाते हम सब बढ़ चले थे दीवान-ए-ख़ास की तरफ जिसे संस्कृत में सर्वतोभद्र कहा जाता है (यह शब्द ज्ञान मुझे वहीं पर प्राप्त हुआ)। आर्मरी और दीवान-ए-आम आर्ट गैलरी के बीच ये पिंक और व्हाइट मार्बल का बना खुला प्रांगण है जिसका उपयोग दीवान-ए-ख़ास (हॉल ऑफ़ प्राइवेट ऑडियंस) के रूप में किया जाता था, मतलब जाहिर है की ये वो जगह है जहाँ महाराजा अपने मंत्रियों से सलाह लेते थे/देते थे। यहां पर दो बड़े, दरअसल विशाल कहना ज्यादा ठीक रहेगा सो हां यहां पर 2 विशाल चांदी के बर्तन/पात्र रखे हुए हैं, जो लगभग 1.6 मीटर लम्बे हैं। इनको गंगाजली कहते हैं। ऐसा कहा जाता है राजा के लिए इन्हीं पात्रों में गंगा नदी का जल लाया जाता था क्योंकि वो केवल यही जल पीते थे। जो भी हो आज के डेट में ये पात्र दुनिया की सबसे बड़ी चांदी की वस्तुओं के रूप में गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हैं। अब हम आम जनता के दरबार यानी दीवान-ए-आम पहुंचे। यह बेहतरीन आर्ट गैलरी है। यहीं पर भागवत गीता सहित अन्य हिन्दू धर्म ग्रंथो की हाथ से लिखी हुई इतनी छोटी प्रतियां है। मुगल सेना के भय से इनको इस प्रकार संकलित किया गया था ताकि उन्हें छिपाया जा सके और मुगल सेना उन्हें नष्ट ना कर पाए। ये वाकई आई कैचिंग था।

महल के इनर कंपाउंड की ओर बढ़ने पर प्रीतम निवास चौक है। यहां चार शानदार द्वार हैं जो चार मौसमों का प्रतिनिधित्व करते हैं – मयूर गेट शरद ऋतु , लोटस गेट ग्रीष्म, ग्रीन गेट वसंत, और अंत में रोज गेट जो सर्दियों का प्रतीक है।

इस चौक के आगे ही चंद्र महल है जो अभी भी शाही परिवार के वंशजों का निवास स्थान है और यहां पर कोई भी कुछ सिलेक्टेड एरिया में 45 मिनट का रॉयल ग्रैंडराइड गाइडेड टूर ले सकते हैं। यहां पर अंदर पिक्चर लेना सख्त मना है। 500रुपए दण्ड शुल्क भी है हर एक पिक्चर पर। मैंने ये नोट पढ़ा नहीं और हॉल की खूबसूरती को देखते देखते कब मेरे फ़ोन से पिक्चर्स लेने लगी पता नहीं चला और ये भी पता नहीं चला कि कब एक गार्ड मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। उसने मुझसे कहा मैडम अपना फोन दीजिए।

मैंने कहा क्यों भाई?

उसने कहा आपने शायद बाहर बोर्ड नहीं पढ़ा। उसपर लिखा है फोटो लेना मना है।

मैंने कहा ठीक है,नहीं लूंगी फोटो।

फिर उसने कहा अपना फोन लाइए, ये बोलते हुए ही मेरे हाथ से अचानक मेरा फ़ोन लेकर वो एक दूसरे गार्ड के पास जा पहुंचा। मै समझ नहीं पाई ये क्या हुआ अभी। मै भी पीछे पीछे गई। मैंने पूछा भाई क्या चल रहा है। क्या प्रॉब्लम है?

उसने कहा हम सारी पिक्चर डिलीट कर रहे हैं।

मैंने थोड़ा शख्त होकर कहा, फोन किसी की भी निजी संपत्ति होती है, आप ऐसे लेकर उसमे कुछ नहीं कर सकते। आप मुझे फोन दीजिए मै खुद यहां की पिक्चर डिलीट कर दूंगी।

ये सुन कर उसने फोन लौटा तो दिया पर लगातार मेरे फोन में झाकता रहा जब तक कि मैंने उस हॉल की सारी पिक्चर्स डिलीट नहीं कर दी। धन्यवाद बोलते हुए उसने कहा मैडम आपके फोन का कैमरा बहुत अच्छा है बस फोन थोड़ा भारी है।

मैं बदले में उसे आंखे तरेर कर देखते हुए पीछे मुड़ गई और बाकी सबके साथ हो ली।

सिटी पैलेस का एक एक कोना ठीक से निहारने और समझने के बाद हम वहां से रुखसत हुए। पैलेस गेट से बाहर वर्तमान की दुनिया में आ गए। कुछ हल्का फुल्का नाश्ता भी कर लिया सबने। शाम हो चली थी। गुलाबी शहर और भी खूबसूरत दिखने लगा था। हम साइड लेन पर टहलते हुए आगे बढ़ रहे थे। शाम की नेचुरल रोशनी और आर्टिफिशियल लाइट्स में हवा महल कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रहा था शायद इसलिए और भी की अब उसपर जमी धूल नहीं दिख रही थी। हम लेन पर खड़े होकर उसे देखने लगे। फिर मैंने कुछ पिक्चर भी कैमरे में उतार लिए। टहलते हुए ही हम उत्सुकतावश यहां की कई दुकानों के अंदर गए तो देखा की हमें प्रवेश करने के लिए  दुकानों में 2 सीढ़ी नीचे उतरना पड़ता था। जब हमने दुकानदारों से इसकी वजह जानने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि ये ग्राहकों का स्वागत करने का उनका तरीका है। उनका ये लॉजिक कुछ समझ नहीं आता था फिर भी हम उनके इस उत्तर पर मुस्कुरा देते थे।

कैब का इंतज़ार करते हुए हम सब चर्चा कर रहे थे कि सरकार को इस लेन में कम से कम शाम के वक़्त गाड़ियों की आवाजाही बंद कर देनी चाहिएं। ये लेन शाम के वक़्त टहलते हुए एन्जॉय करने का एक अलग ही अनुभव होता। अभी तो आप जब भी कुछ देखने लगे तभी कोई गाड़ी आ धमकती है आपके और उस नज़ारे के बीच में। बेहद निराशाजनक महसूस होता है उस वक़्त।

इसी निराशायुक्त क्षणों के बीच हमारी कैब आ पहुंची। हम सब सवार होकर होटल आ पहुंचे। कल के लिए आज ही एक ऑटो वाले से बातचीत पक्की हो गई थी। वो कल सुबह ही आ जाने वाला था और कल पूरे दिन वो हमारे साथ रहने वाला था। एक पूरे दिन के लिए 1000 रुपए में हमने उसे तय किया था। अब इंतजार था कल सुबह का क्योंकि आमेर फोर्ट वो जगह थी जहां पूरी शिद्दत से मै जाना चाहती थी। इसी उत्सुकता के साथ आज का दिन हमारे लिए समाप्त हो गया था।

Please follow and like us:
error

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *