होली है तो पर यहां कहां

कल होली है तो पर होने जैसा कुछ नजर नहीं आया अब तक। हर त्यौहार की तरह इस होली में फिर घर की याद हो आयी है। घर जाने का मन तो था पर जाना हो नही पाया। कारण वही एकैडमिक प्रेशर। खैर घर यानी गंगोलीहाट में होली के अपने अलग रंग हैं। वहां आज भी होली पारम्परिक तरीके से मनायी जा रही है। वहां की होली की खास बात है कि उसमें रंग भी है ता साफ सुथरे। वहां कोई हुडदंग जैसी चीजें नही हैं। औरतों की अपनी अलग होली होती है और आदमियों की अलग। होली वहां लगभग 15 दिनों तक चलती है।

पहले दिन चीर बांधी जाती है। चीर बांधने का तरीका यह होता है कि एक डंडे में कपडों की पटिटयां घर घर जाकर बांधी जाती है। पहली पटटी कुलदेवता के मंदिर में बंधती है। यह चीर होली भर में होल्यारों के साथ साथ चलती है। होली में मौजूद सभी आदमियों या औरतों को होल्यार कहा जाता है। आदमियों की होली में बैठकी और खड़ी दोनों तरह की होलियों का चलन है। खड़ी होली में एक के बाद एक दूसरे घरों में जाकर सौंपसुपारी जिसमें चीनी मिली होती है खाने का मजा कुछ और ही है। वो भी दिन थे जब होल्यारों की इस मस्त भीड़ में हम भी शामिल हुआ करते थे। इसी बहाने सबके घर जाना होता थ। गांव जाना होता था। जब पापा अपने हिस्से की सौंप सुपारी हमें दे दिया करते थे हम कितने खुश हो जाते थे। जैसे सौंप सुपारी न हो कोई निधि हो जो हाथ लग गई हो।

खैर जिस घर में बैठकी होली रमती है उसकी शान कुछ और ही होती है। तबला, हारमोनियम, सारंगी, ढ़ोल, दमुआ और उसके साथ एक लोटा जिसे सिक्के से बजाया जाता है, की धुनों पर ठेठ पहाड़ी अन्दाज में गाये जाने वाले खड़ीबोली के होली के गीत। साथ ही जिस घर में होली जम जाये वहां आलू के गुटकों और गुड़ के टपुके वाली चाय का मजा। और फिर रात की होली। रात को दो दो बजे तक होली गाने बजाने का रस। होली के अन्तिम दिन सारे घरों का एक चक्कर। छलड़ी के इस दिन रंग पोतने पुतवाने में एक अलग ही आनन्द है।

दूसरी ओ छुटपन में औरतों की होली में जाने और उसे देखने का भी मजा होता है। वहां सबसे अच्छी चीज होती है स्वांग। औरतें गांव भर की औरतों और पुरुषों का स्वांग करती हैं और लोट पोट होकर हंसती हैं। ये सबकुछ बड़ा मजेदार होता है।

लेकिन इस बार नहीं। आज मुझे अपने गांव चिटगल की याद आ रही है। यह स्वार्थ ही सही पर होली का असली मजा तो गांव में ही है। इस बार होली आ चुकी है और चली भी जायेगी। बिना किसी तरह का रंगीन अहसास कराये। और यहां इस माहौल में होली खेलने का मन भी नहीं है। ना पिचकारी का क्रेज है ना गुलाल का रंग। हाइडोफोबिया नही है फिर भी पानी से दूर दूर रहने का मन है। डर है कि कही कोई भिगा न दे और गांव की होली की याद दिमाग को तर बतर न कर दे। ऐसा हुआ तो मुश्किल हो जायेगी। यकीन मानिये।

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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