आस्था के लिए जीता एक नगर: त्रयम्बकेश्वर

इस बार त्रयम्बकेष्वर जाना हुआ। लगा कि भक्ति और आस्था ये ऐसे शब्द हैं जिनका कटटरवाद से कोई लेना देना नहीं है। महाराष्ट में नासिक के पास एक छोटा सा कस्बा है त्रयम्बकेश्वर जिसका अस्तित्व अगर है तो उसके पीछे बस यही भक्ति और आस्था है। लगता कि है कि ये कस्बा इसी आस्था से है और इसके लिए जीता है। आस्था न होती तो ये कस्बा न होता। एक पिछड़ा सा नजर आने वाला इलाका, पिछड़े से नजर आने वाले लोग लेकिन बावजूद इसके देश भर से लोगों की आवाजाही । स्थानीय लोगों की आजीविका भक्ति के इई गिर्द लिपटी समायी सी आम हिन्दू मानसिकता से चलती है।
पन्डित भक्ति के नाम पर कमाते हैं, दुकानदार भक्ति से पैसा कमाते हैं और एक भीख मागने आदमी आप से यह कहकर कमाने की कोशिश करता है कि भोलेनाथ भला करेंगे। एक औरत एक घास का छोटा गटठर सा लेकर आपके पास आती है, पास में उसकी ही गाय बधी है और वो आपको एक रुपये में इस गटठर को यह कहकर बेच देना चाहती है कि गौदान एक पुण्य काम है। एक बच्ची फूल की माला लेकर आपके इर्द गिर्द मडराती है, कहती है ले लो ना भगवान भला करेगा। यहां आने वाले लोग अपनी आम दिनचर्या के बिगड़े हुए नियम छोड़कर सुबह पांच बजे उठ जाएंगे और सुबह पवित्र माने जाने वाले कुंड में पूरी भक्ति से स्नान करेंगे इस आस्था के साथ कि उनके पाप धुल जाएंगे। सुबह होते होते त्रयम्बकेश्वर के मुख्य मन्दिर में लोगों का तांता लग जाएगा कि भगवान की मूर्ति के दर्षन भर हो जायें। आगन्तुक दिन भर कही अपने पूर्वजों का स्राद्ध करेंगे कि उनकी अतृप्ति आत्माएं शान्त हो जांये, कहीं कोई अपने कालसर्प दोश का निवारण कर रहा होगा। आदमी औरतें सफेद कपड़ों में जगह जगह बैठे हवन कर रहे होंगे। शाम होगी लोग अपने लिए खरीदे हुए रात के ठिकानों में चले जाएंगे और अगले या उसके अगले रोज इस कस्बे में अपनी यादें और आस्था छोड चले जाएंगे अपने घरों को। ये इस कस्बे का जीवन है। कहानियों परम्पराओं और धर्मिक मान्यताओं के पहनावे को खुद में ओढ़े लिपटे एक कस्बे का जीवन।
इस पूरी आस्थावान विरासत का कहीं कोई नुकसान होता नहीं दिखाई देता। यहां आकर कभी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि धर्म कभी हिंसा से सरोकार रख सकता है। यहां धर्म आपको एक अजीब तरह की उर्जा देता है, एक अलग तरह का भावनात्मक लगाव जो न मालूम किससे है? भगवान जैसी किसी चीज से, जिसे मानते ना मानते अपने परिवार के साथ यहां आ पहुंचे हैं। उन मान्यताओं से जिनमें आपको कहीं को लौजिक जैसी चीज नहीं दिखाई देती, ना आप तलाशते हैं या अपने परिवार से जो आपके साथ है बस इसीलिए आप भक्ति का दिखावा करना चाहते हैं ताकि आपके बुजुर्गों, या मम्मी पापा को अच्छा लगे। इन सारी भावनाओं में कहीं दुराग्रह नहीं छुपा है। किसी के प्रति कोई हिंसात्मक अलगाव जैसा कुछ दन भावनाओं के आवेश में नहीं है। धर्म अगर है तो किसी के जीने के लिए, एक कस्बे को जिन्दा रखने के लिए, वहां के गरीब लोगों को आजीविका देने के लिए, उन्हें भूखों मरने से बचाने के लिए और जो धर्म में विश्वास रखते हैं उनके पुण्य के लाभ की आकांक्षा को पूरा कर देने भर के लिए। ऐसे धर्म से किसी को परहेज होने ना होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। त्रयम्बकेश्वर जाने के बाद ये कुछ भावनाएं धर्म के बारे में उमड़ रही हैं। धर्म के प्रति किसी सहमति असहमति से परे, धार्मिक होने के किसी लेबल के चस्पा होने ना होने के भय के परे आप तक इन भावनाओं को पहुंचा रहा हूं। त्रयम्बकेश्वर पर एक फीचर लिखा है। एक समाचार पत्र को भेजा है। छप जाने के बाद यहां भी प्रकाशित करने का मन है।

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

3 Comments

  • पिछले साल ही हो कर आये हैं यहाँ से..यादें ताजा हुई..बिल्कुल सही लिखा.

  • भक्ति दरअसल हमारी शांत मनोस्थिति और आत्म्संयमित होने का परिचायक है.. जब-जब हम अपने करीब होते हैं, हम उस शक्ति के भी करीब होते हैं जो सम्पूर्ण श्रृष्टि को नियंत्रित किये हुए है.. त्रयम्बकेश्वर जैसी जगह जाना जीवन में अपने ही करीब आने का मौका देने जैसे अवसर होते हैं.. दरअसल वहां केवल भक्ति ही नहीं होगी, बहुत कुछ मतलब और ज़रूरत से संचालित भी होगा, लेकिन चूँकि हम अब सब कुछ अच्छा देखते और महसूस करते हैं, इसलिए भी वहां सब इश्वर की भक्ति में डूबे नज़र आते हैं.. ऐसी यात्राएं करना सुखद अनुभव रहता है… मुबारक!

  • भक्ति दरअसल हमारी शांत मनोस्थिति और आत्म्संयमित होने का परिचायक है.. जब-जब हम अपने करीब होते हैं, हम उस शक्ति के भी करीब होते हैं जो सम्पूर्ण श्रृष्टि को नियंत्रित किये हुए है.. त्रयम्बकेश्वर जैसी जगह जाना जीवन में अपने ही करीब आने का मौका देने जैसे अवसर होते हैं.. दरअसल वहां केवल भक्ति ही नहीं होगी, बहुत कुछ मतलब और ज़रूरत से संचालित भी होगा, लेकिन चूँकि हम अब सब कुछ अच्छा देखते और महसूस करते हैं, इसलिए भी वहां सब इश्वर की भक्ति में डूबे नज़र आते हैं.. ऐसी यात्राएं करना सुखद अनुभव रहता है… मुबारक!

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