मुनस्यारी के मोड़ों पर हमारे लिए ट्विस्ट था : भाग-3

लतिका जोशी पत्रकार हैं. उत्तराखंड से हैं. कहानियां और कविताएं भी लिखती हैं. उनकी यात्राओं के क़िस्से पहले भी यात्राकार पर प्रकाशित हो चुके हैं. आज उसी सिलसिले में पेश है उत्तराखंड के खूबसूरत हिल स्टेशन मुनस्यारी की यात्रा पर लिखे उनके वृत्तांत का तीसरा और आखरी भाग. पहला और दूसरा भाग यहां पढ़ सकते हैं.

इतने बड़े-बड़े काले पत्थर जिन्हें हम चट्टानें भी कह सकते हैं, सड़क के दोनों तरफ दिख रहे थे। दूर कहीं इक्का-दुक्का पेड़ थे, हरियाली के लिए बेचैन मेरा मन टूट रहा था। बार-बार लग रहा था जैसे इतनी दूर यूं ही चले आए। अपने दिल की बात मैंने प्रसून से कही, तो वो बोले, ‘ये भी तो प्रकृति का एक हिस्सा है ना…सोचो जब तक तुम्हें सिर्फ झरने का पता था तुम कितनी खुश थी, कितनी एक्साइटेड थी और अब जब ये भूरी-काली चट्टानें दिख रही हैं तो तुम्हें यहां आना ही बेकार लग रहा है। प्रकृति के हर रूप से प्यार करना चाहिए।‘ प्रसून ने बात बड़ी सही कही थी लेकिन उस समय मेरा ये सब सुनने का मूड नहीं था। हमारी बातें सुनकर सुंदर ने कहा, ‘जनवरी-फरवरी में हम आते ना तो अभी बर्फ के बीच से होकर गाड़ी चलानी पड़ती’

अब मुझे इस बात पर चिड़ हो रही थी कि हमने दिसंबर में आकर गलती कर दी शायद। मैं उन घुमावदार मोड़ों में भूरी सूखी घास उगलती काली चट्टानों के बीच से निकलते हे उस रास्ते को इमैजिन करने लगी कि जब यहां से बर्फ के बीच से गाड़ी निकलती होगी और इतने में नींद आ गई।  

कहीं बहुत जोर से पानी गिरने की आवाज आ रही थी। देखा सामने झरना बह रहा है। बिरथी फॉल। मैं गाड़ी से उतरी तो देखती रह गई। झरना काफी ऊंचा था लेकिन क्योंकि दिसंबर का समय था तो पानी कुछ कम था। मैंने एक नज़र चारों ओर देखा सड़क के नीचे एक छोटे सा गांव कुछ घरों में फैला हुआ था। सामने का पहाड़ हरा दिख रहा था लेकिन पीछे एक बहुत बड़ी काली चट्टान थी, जिसको चीरते हुए बहुत ऊंचाई से झरना बह रहा था और ये उसके ठीक सामने था हमारा गेस्ट हाउस। ये लोकेशन देखकर मैं खुश हो गई तो प्रसून मेरी शक्ल देखकर चिढ़ाने लगे, ‘मतलबी कहीं की! झरना देखा तो खुश हो गई और अभी तक कैसे मुंह लटकाए खड़ी थी।‘  मैं चाहती तो इस बात के 10 जवाब दे सकती थी लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा, मैं वाकई में खुश थी।

गेस्ट हाउस पहुंचकर अपने रूम में गए। पीछे का दरवाजा खोला तो झरना सामने था। इतना सामने कि पानी के गिरने की आवाज मुझे अपने कमरे में सुनाई दे रही थी। घड़ी देखी तो साढ़े चार हो चुके थे। बिरथी में बिरथी फॉल के अलावा कोई स्पॉट था नहीं तो हमें बस आराम करना था और झरने को देखना था। दिन भर की थकान थी और भूख तो इतनी थी कि बस पेट से चूहे कूदकर खुद ही खाना ढूंढने को निकलने वाले थे। हमने वहीं खाना खाया, एकदम ऑर्गेनिक, सादा और स्वादिष्ट खाना। 

थोड़ी देर आराम करने के लिए लेटे तो शाम 6 बजे नींद खुली। बाहर देखा घुप अंधेरा। झरना दिख नहीं रहा था लेकिन अंधेरे की खामोशी में उसके सुर और ऊंचे हो गए थे। बाहर निकले तो दूर पहाड़ किसी संजीवनी पर्वत की तरह टिमटिमा रहा था। मतलब मुझे पता नहीं कि संजीवनी पर्वत कैसे जगमगाता रहा होगा लेकिन अगर ये कहानी सच्ची है तो वो बिल्कुल ऐसा ही दिखता होगा। ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों जुगून रात में पर्वत यात्रा के लिए निकल पड़े हों।

सड़क के उस ओर हम एक बड़े से पत्थर पर बैठ गए, पीछे से बिरथी फॉल था और आगे था ये छोटा लेकिन जगमागाता हुआ खूबसूरत गांव। मैं समझ नहीं पा रही थी कि किस ओर पीठ करूं और किस ओर पैर लटकाकर बैठ जाऊं। यहीं पर बैठे-बैठे एक कप चाय पी और बातें करने लगे। मुझे इस समय इस खूबूसरत जगह से भी ज्यादा प्रसून के चेहरे की खुशी सुकून दे रही थी। मैंने उसे इस तरह दिल्ली में कभी भी नहीं देखा था, फोन से और ऑफिशियल कामों की टेंशन से इतना दूर, मेरा क्या था मैं तो हर जगह ही खिलंदड़ हूं। मुझे हंसी आ रही थी लेकिन यहां आकर वो खूब दर्शन की बातें करने लगा था।

सच में, उस जगह पर आकर मुझे अहसास हुआ कि जीवन भी तो ऐसा ही है। कभी-कभी हम किसी चीज़ के बेहद हसीन सपने देखते हैं। हकीकत में उसे हासिल करते हुए हमारा मन कई बार सवाल करता है, पूछता है कि क्या तुम यहीं पहुंचना चाहते थे, कई बार इस दौरान आपको अपना फैसले गलत लग सकते हैं, लेकिन अंत तक पहुंचकर सब ठीक हो जाता है। बस रास्ता मत छोड़िए, चलते जाइए। और अगर सब ठीक न हुआ हो तो भी चलते जाइए, शायद मंजिल बस थोड़ा ही दूर हो। 

मैं भी दार्शनिक हो रही हूं, अच्छा लग रहा है। यात्राएं इसी तरह आपको आपसे मिलाती हैं। आपको वक्त देती हैं कि आप उस सबसे अलग सोचें, जिसे सोचकर आपको कुछ और सोचने का वक्त ही नहीं मिलता। मतलब दिल्ली में जॉब के बीच में आप ये सब सोचें तो लोग कहेंगे गजब वेल्ली लड़की है।

अभी सिर्फ 7 बज रहे थे लेकिन अंधेरा ठंड के साथ मिलकर गजब का माहौल बना रहा था। हम गेस्ट हाउस में आ गए और डिनर करके सो गए। हमने प्लान किया कि सुबह सबसे पहले बिरथी फॉल को पास से देखने जाएंगे और फिर 8 बजे मुनस्यारी के लिए निकल पड़ेंगे। लेकिन सुबह इतनी ठंड थी कि लग रहा था जैसे लोग घूमते ही क्यों रहते हैं। चुपचाप सो क्यों नहीं जाते। मतलब क्या ही मिल जाएगा इस ठंड में रजाई छोड़कर यहां वहां भटकने फिरने से।

तो इस तरह मन को समझाते हुए साढ़े 7 बज गए। सुंदर दो बार फोन कर चुका था। मैंने उससे कहा कि पहले झरना देखने का मन है। उसने बड़े प्यारे से पहाड़ी एक्सेंट में कहा, ‘हाइ खिड़की खोलकर तो दिखी रहा है झरना अब ऊपर जाकर क्या जो देख लोगे और…’ मैंने कहा, ‘सुंदर यही देखने के लिए तो आए हैं इतनी दूर से…’ ये सुनते ही वो हंस पड़ा और फिर संभलते हुए बोला,’अच्छा….झरने के टायर जो क्या लग रक्खे फिर, वो तो कभी भी देख सकते हो आप…मुनस्यारी से आकर देख लीजिएगा शाम को…’ बात उसने दिल दुखाने वाली की थी लेकिन गलत नहीं थी, सो हम उसकी बात मान गए और शाम को झरने के पास जाने का प्लान बनाया।

पर्स मेरा जा चुका था और उसके साथ ही काजल, आईलाइनर, लिप्सिटक और दूसरे कॉस्मैटिक्स भी जा चुके थे। बिना काजल के मेरी आंखें मुझे बीमार बना रही थीं। प्रसून ने चुटकी लेते हुए कहा, ‘नैचुरल जगह पर आई हो, नैचुरल बनके घूमो।’

ब्रेकफास्ट करके गाड़ी में बैठे तो सामने कई सारे पहाड़ एक-दूसरे को कोहरे से ढके हुए से लग रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे रात में ठंड से बचने के लिए सब सफेद चादर ओड़ के सो गए हों। सुंदर फुल मजे में था, प्रसून की ओर देखकर बोला, ‘आज कैसी तबीयत है आपकी, आज ये पूरा पहाड़ लांघकर उस तरफ जाना है।‘ उसकी ये बात सुनकर मैंने मन ही मन उसे एक हाई फाइव दे दिया। प्रसून जोक समझ चुके थे, ये उनके चेहरे से साफ था।

ख़ैर हम आगे बढ़े। कहने को सिर्फ 30 किलोमीटर दूर था मुनस्यारी लेकिन उन पहाड़ों में ये दूरी कम नहीं थी। बिरथी में हमें किसी ने बताया था कि अभी कुछ 4-5 दिन पहले ही बर्फ पड़ी थी मुनस्यारी में। तो हम उम्मीद कर रहे थे कि शायद हमें बर्फ मिल जाए लेकिन धूप इतनी चटख थी कि ये उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही लग रहा था।

हम एक ही पहाड़ के चक्कर लगा रहे थे। कभी ठंड लगने लगती तो कभी पसीने आने लगते। इस दौरान हमें कहीं-कहीं पर बर्फ की कतरनें दिखीं। मन में उम्मीद जगी कि शायद आगे चलकर बर्फ मिले। दूर एक पूरी चट्टान सफेद नज़र आ रही थी। इस जगह पर ठंड इतनी थी कि 4-5 जिन पहले पड़ी बर्फ अब भी वैसी ही थी। सफेद, शाश्वत और चमकदार। वहां पहुंचकर गाड़ी से बाहर निकले तो सुंदर वहीं से चिल्लाया, ‘ये बर्फ पाले से जम गई है, पैर धँसा के चलिएगा…फिसलन है।‘ हम सुंदर की सलाह गांठ बांधकर आगे बढ़े, वास्तव में इधर जरा सी असावधानी से पैर फिसल सकता था। 

वहीं से एक रास्ता ट्रैकिंग के लिए निकलता था। सुंदर ने बताया कि वहां जंगल के बीचोंबीच थामरी कुंड है, लेकिन बहुत दूर पड़ेगा, अगर समय रहा तो लौटते हुए जा सकते हैं। थोड़ी देर फोटो खिंचाकर और बर्फ के साथ खेलकर हम कालामुनि से होते हुए आगे बढ़े। अब हमें मुनस्यारी जाना था। रास्ते में हमें एक बोर्ड दिखा जो बता रहा था कि मिलम ग्लेशियर के लिए रास्ता वहां से जाता है। इसी तरह रालम, पोंटिंग, हीरामणि और कई दूसरे ग्लेशियरों की ओर जाने वाले रास्ते भी नजर आ रहे थे। मन तो कर रहा था गाड़ी घुमा दी जाए, लेकिन अभी प्लान के हिसाब से ही चलने का फैसला लिया।

धारचूला की मार्केट उतनी ही है कि वहां के लोगों को रोजमर्रा की चीजें मिल जाएं। ज्यादातर गर्म कपड़े, शॉल और जैकेट्स की दुकानें। मैंने एक काजल लिया। बिना काजल की आखों को सुकून मिला। इसके बाद हम गए नंदादेवी मंदिर में। एक छोटे से द्वार से हज़ारों लाखों श्रद्धालुओं की श्रद्धा इस नंदादेवी मंदिर तक पहुंचती है। सामने से पंचाचली पर्वत बाहें फैलाए स्वागत खड़ा दिख रहा था। पंचाचूली यानी पांच पर्वत, इन पर्वतों को पांडवों के स्वर्गारोहण के प्रतीक के तौर पर भी माना जाता है।

कहा जाता है कि द्रौपदी ने यहीं अंतिम बार पांडवों के लिए भोजन बनाया था और इसके बाद वे स्वर्ग की ओर चले गए। गौरीगंगा नदी के साथ फैले हुए मुनस्यारी में आपको शौका और भोटिया जनजातियां मिल जाएंगी जिनका मूल तिब्बत और नेपाल माना जाता है, जो कि पिथौरागढ़ राज्य की सीमाओं में बसे हुए देश हैं।

इस मंदिर के बारे में कही जाने वाली कहानियां कितनी सच्ची हैं, मुझे नहीं पता। ना ही ये पता है कि इसके पौराणिक इतिहास की कहानियां सत्य हैं। मुझे यहां कर ये पता चला कि ये जगह आपको पॉजिटिविटी से भर देती हैं। ये पर्वत जैसे हर तकलीफ में आपके अपने होने की शांत्वना देते हैं, जैसे कह रहे हों, तुम जब भी यहां आओगे मुझे यहीं पाओगे।

मंदिर बहुत विशाल नहीं है लेकिन इससे जुड़ी मान्यताएं बहुत हैं। हर नंदाष्टमी को यहां नंदादेदवी मेला लगता है और दूर-दूर से श्रद्धालु इस उत्सव में शामिल होते हैं। 

इसके बाद हम गए खलिया टॉप की ओर। खलिया टॉप यानी बुग्याल। कुछ देर चलने के बाद घास से हरा-भरा एक मैदान आता है, जिसे बुग्याल कहा जाता है। कहते हैं कि इन बुग्यालों में कस्तूरी मृग दिखते हैं लेकिन हमें नहीं दिखे। दूर-दूर तक घास के मैदान जरूर दिखे थे।

स्थानीय लोगों ने बताया कि अगर मुनस्यारी घूमना हो तो सबसे सही समय मई से अक्टूबर के बीच का है। इस दौरान आप प्रकृति की हर व्यवस्था का आनंद दे सकते हैं। इतना पैदल चलकर हम थक रहे थे और भूख हावी हो रही थी। चलते-चलते वायु का दवाब बन रहा था सो अलग। 3 बज रहे थे, सुंदर ने सुझाव दिया कि हमें वापस निकलना चाहिए तभी हम 5 बजे तक वापस बिरथी गेस्ट हाउस पहुंच पाएंगे। 

हम उसी रास्ते से वापस हो लिए। साढ़े 5 बजे गेस्ट हाउस पहुंचे और उसके बाद झरने के पास जाने के लिए बिल्कुल भी एनर्जी नहीं बची और फिर हमने झरने का प्रोग्राम अगली सुबह के लिए पोस्टपोन कर दिया। अगली सुबह ही हमें वापस हल्द्वानी लौटना था। लंबा सफर होना था इसलिए सुबह जल्दी निकलने का प्रोग्राम बना।

अगले दिन सुबह ही हम झरने के पास पहुंचे। हमें कम से कम 15 मिनट लगे थे। पानी इस समय कम था। हमने सोचा था कि रूम से तो देखा ही है झरना बस थोड़ी देर बैठ के आ जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। झरने ने बांध लिया था। कुछ यादें जुड़ रही थीं, कुछ यादें पिघल रही थीं लेकिन वापस निकलना जरूरी था इसलिए हमने एक नज़र भर के उसे देखा और फिर निकल पड़े वापसी के लिए। 31 दिसंबर का दिन था और हल्द्वानी पहुंचते-पहुंचते 7 बज चुके थे। न्यू ईयर सेलिब्रेशन हल्द्वानी में करके हम साल की पहली तारीख को लौट पड़े अपने कर्मक्षेत्र दिल्ली की ओर। कहीं से आना दिल तो भारी कर ही देता है लेकिन यादें उस दिल को संबल देती हैं। 

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लतिका जोशी

लतिका जोशी पत्रकार हैं. उत्तराखंड से हैं. कहानियां और कविताएं भी लिखती हैं. घुमक्कड़ी की शौकीन हैं और घूमे हुए को शब्दों में ढालने में भी यकीन रखती हैं.

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