मुनस्यारी के मोड़ों पर हमारे लिए ट्विस्ट था : भाग-1

लतिका जोशी पत्रकार हैं. उत्तराखंड से हैं. कहानियां और कविताएं भी लिखती हैं. उनकी यात्राओं के क़िस्से पहले भी यात्राकार पर प्रकाशित हो चुके हैं. आज उसी सिलसिले में पेश है उत्तराखंड के खूबसूरत हिल स्टेशन मुनस्यारी की यात्रा पर लिखे उनके वृत्तांत का पहला भाग. 

हम साल के आखिरी दिनों में वाकई उस तरह घूम रहे थे, जिस तरह हम पूरे साल घूमने की प्लानिंग करते हैं। दिल्ली से शुरू हुई ये यात्रा हल्द्वानी से होते हुए रानीखेत तक पहुंची थी और अब हमें इसे बढ़ाते हुए मुनस्यारी तक जाना था। हमारे ड्राइवर (सुंदर) ने बताया था कि रानीखेत से बिरथी के सफर में कम से कम 7 घंटे लगते हैं। पिछले अंक में मैंने बताया था न कि हमें बिरथी में रुकना था। बिरथी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी से 30 किलोमीटर पहले बसने वाला एक छोटा सा गांव है और एक बहुत बड़े झरने के लिए जाना जाता है। 

हम सुबह 6 बजे ही रानीखेत से निकल पड़े थे। सोचा था कि अगर 7 घंटे भी लगे तो हम 1 बजे तक तो बिरथी पहुंच जाएंगे और थोड़ी देर आराम करके आज ही कुछ जगहें देख लेंगे। लेकिन ये हमने सिर्फ सोचा था, होना कुछ और तय था। अभी हम रानीखेत से बाहर भी नहीं निकले थे कि प्रसून (पति) ने गाड़ी रुकवा ली। गाड़ी रुकते ही वो तेजी से बाहर निकले और मैं पीछे-पीछे। मोशन सिकनेस शुरू हो चुका था। हल्द्वानी से रानीखेत तक के सफर को आराम से तय करने के बाद उन्हें इस बात का भरोसा था कि आगे का सफर भी मजे से बीतेगा पर पहाड़ तो इम्तेहान लेता ही है। 

वहां एक ओर वो हर 5 मिनट बाद गाड़ी रुकवा के उतर पड़ते और यहां मेरी हंसी रुक नहीं रही थी। मुझे खुद के पहाड़ी होने पर बड़ा ही दुष्ट गुरूर हो रहा था। ‘अपनी तो घर वाली बात है’ टाइप दुष्ट लेकिन मज़ेदार फीलिंग। अंधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था। जाने कितने ही दिनों बाद मैंने देखा कि उजाला धीरे-धीरे आसामान में अपनी जगह बना रहा है, वो चारों ओर पसरे अंधेरे को कोहनियों से ढकेलते हुए वैसे ही आगे बढ़ रहा है जैसे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर मैं भीड़ से बाहर निकलती हूं।  

ये तुलना अगर आपको हंसा रही है तो आप उस भीड़ से इसी तरह निकल चुके हैं और अगर आप ये इमैजिन नहीं कर पा रहे तो चैन की सांस लीजिए। ख़ैर सूरज का आकार धीरे-धीरे बढ़ रहा था और उसी स्पीड से भूख भी बढ़ रही थी। मोशन सिकनेस यात्रा की शुरुआत से ही हौसला तोड़ने को कमर कस चुकी थी। ख़ैर सुंदर ने गाड़ी एक छोटी सी चाय-पानी की दुकान के पास रोकी, जो अभी खुली भी नहीं थी। लगभग सारे ड्राइवर्स का उस रूट पर अक्सर ही आना-जाना होता है इसलिए सभी दुकानदारों और दूसरे ड्राइवर्स से उनकी जान-पहचान होती है। तो इसी जान-पहचान पर भाईसाहब ने दुकान खोली और बन-बटर और चाय से हमारी जान बचाई। 

प्रसून ने चाय की एक भी घूंट न पी। उन्हें डर था कि कुछ भी अंदर जाएगा तो अंदर से कुछ न कुछ लेकर ही बाहर आएगा। सुंदर और मैंने उन्हें खूब समझाने की कोशिश की लेकिन वो अपने व्रत पर कायम रहे। खैर हमने नाश्ता किया और फिर निकल पड़े सफर पर। सुबह फैल कर धीरे-धीरे दिन हो रही थी और रास्ते सिकुड़ते जा रहे थे। कभी आंख लग जाती और खुलती तो हम अपने सिर को कार के शीशे से टकराता पाते। गोल-गोल सड़कों में इतना सिर घूम चुका था कि नशीली नींद आंखों से छंट ही नहीं रही थी। 

रानीखेत से द्वाराहाट होते हुए हम कौसानी की ओर बढ़ रहे थे। धूप अब और जवान हो गई थी और कार के शीशों से टकराकर सीधे चेहरे पर बिछने लगी थी। जहां पर रास्ता सीधा-सीधा होता वहां देवदार के पेड़ चेहरे को ढांके रहते और जहां मोड़ आता चेहरे पर धूप यूं पड़ती जैसे यहीं मोड़ पर खड़ी होकर इंतज़ार कर रही थी। प्रसून अब तक करीब 6-7 बार गाड़ी रुकवा चुके थे। एक पॉइंट पर आकर लगा कि क्या हमें आगे बढ़ना भी चाहिए या नहीं। अगर रास्ते में तबीयत खराब हो गई तो? लेकिन हम आगे बढ़े। 

सुंदर एकदम रफ्तार से गाड़ी चला रहा था, सड़क पर गाड़ियां भी 2-3 से ज्यादा नहीं थीं। रास्ते में कहीं-कहीं तो इतनी शांति थी कि लग रहा था जैसे पूरे गांव में बस हम ही हैं। खिड़की से बाहर देखते हुए ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के बीच मुझे अचानक सफेद पहाड़ दिखाई दिए। ‘कौसानी पहुंच गए क्या?’ मैंने सुंदर से कहा तो उसने पहाड़ी टोन में ‘हां, बस आ ही गया फिर।‘ आप आए हो पहले कौसानी? मैंने कहा, ‘हां आई थी एक बार दोस्तों के साथ।‘ और फिर खो गई। कार की विंडो से एकटक उन सफेद पहाड़ी चोटियों को तेजी से भागते हुए देखने लगी। वो चोटियां जो रानीखेत से काफी दूर दिख रही थीं, उनमें से कुछ यहां कौसानी आकर पास आ गई थी। जो हौसला कम होता सा दिख रहा था वो इन बर्फ से ढके पहाड़ों ने बढ़ा दिया, जैसे कह रहे हों बस थोड़ा और…

यात्राओं की यही बात मुझे बहुत अच्छी लगती हैं कि ये आपको कुछ यादों से बांध देती हैं। हो सकता है कि हर यात्रा में आपके साथी पथिक अलग हों, लेकिन रास्ते हर किस्से को याद रखते हैं।

हम बागेश्वर जिले के एक छोटे लेकिन खूबसूरत गांव कांडा में पहुंच चुके थे। सुंदर ने लंच के लिए गाड़ी रोक दी। अगर आप अक्सर पहाड़ों में सफर करते हैं तो ये आप चौकेंगे नहीं जब मैं ये बताऊंगी कि एक छोटी सी दुकान के बाहर बस की सीट को सोफे की तरह बैठने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। ‘शुद्ध पहाड़ी खाना’ का बोर्ड देखा तो लगा कि बहुत सही जगह गाड़ी रोकी गई है। प्रसून अभी भी खाना खाने को तैयार नहीं थे लेकिन धूप सेंकने के लिए बाहर आ गए थे। दुकान पर कुछ कंस्ट्रक्शन का काम भी चल रहा था। ख़ैर मैंने एक थाली मंगाई और प्रसून से खाने के लिए जिद करने लगी। थाली में, पालक-आलू की सब्जी, गर्मागरम फुलके, पकौड़ा कड़ी, भट के डुबके और चावल था। एकदम सादा और स्वादिष्ट खाना। उस ठंड में ये खाना किसी अक्षत पात्र से निकला हुआ लग रहा था। प्रसून ने भी थोड़-थोड़ा खा ही लिया। चाय पीकर हम फिर अपने सफर के लिए निकल पड़े। 

हम निकल पड़े थे लेकिन इस घुमावदार जगह ने पहले से ही हमारे लिए एक ट्विस्ट सोचा हुआ था… जारी….

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लतिका जोशी

लतिका जोशी पत्रकार हैं. उत्तराखंड से हैं. कहानियां और कविताएं भी लिखती हैं. घुमक्कड़ी की शौकीन हैं और घूमे हुए को शब्दों में ढालने में भी यकीन रखती हैं.

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