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‘एक सौ दर्द जले जब दिल में, एक नज़्म का जन्म हुआ’

Mumbai Diary : 17 (December 2013)

गुलज़ार  साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने की बधाई देते हुए मोहल्ला लाइव पर छपने वाली अपनी ‘मुंबई डायरी’ में से एक दिन जो गुलज़ार के नाम है, ‘गुल्लक’ पढने वालों के लिए भी ..

गुलज़ार। ये नाम मेरे लिये उन शुरुआती साहित्यिक सुविधाओं में से था जो मुझे अपने छोटे से कस्बे गंगोलीहाट में रहने के दिनों में ही मिल गई थी। पुखराज, त्रिवेणी और रात पस्मिने की, ये तीन किताबें ऐसी थी जिनके नाम अपने कुछ साथियों से सुने थे। और सर्दी के दिनों छतों पर बैठे गुनगुनी सी धूप सेंकते हुए इन किताबों में लिखी कविताओं के कुछ कुछ टुकड़े भी उन्होंने ही सुनाये थे। इन किताबों को खरीदना तब हसरतों में शुमार हो गया था। ये वो दौर था जब आड़े तिरछे शब्दों को जोड़कर कुछ लिखना शुरु किया था मैने भी, जिसे दिल के खुश रखने को मैं कविता कह देता था। बर्फ का गिरना, ठंड, धूप ये सब गुलजार को पढ़ने के बाद केवल घटना नहीं लगते थे। इन छोटी छोटी बातों में अहसास होता है गुलजार को पढ़ते हुए इतना तो सीखना शुरु कर दिया था। एक पुरानी हसरत थी कि उनका कोई सैशन अटेंड किया जाये जहां वो खुद हों और उनके होने को उनकी कविताओं का साथ मिले। पिछली बार जब सुना कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में वो नहीं आ रहे तो दुख हुआ था। इससे पहले वो वहां जाते रहे हैं ऐसा मैने सुना था।

आज मुददतों बाद वो हसरत भी पूरी हुई। मुम्बई के ऐतिहासिक महबूब स्टूडियो में। टाइम्स लिट फेस्ट में गुलजार के सैशन को शुरु होने में तकरीबन पन्द्रह मिनट थे, पिछले सैशन के दर्शक कुर्सियां छोड़ रहे थे, आगे की पंक्तियों में खाली हुई ऐसी ही एक छोड़ी हुई कुर्सी हमने भी छेंक ली। सैशन शुरु होने में पांच मिनट रहते सारी कुर्सियां भर चुकी थी। और उन कुर्सियों इर्द-गिर्द गुलज़ार के इन्तज़ार में सैकड़ों लोग खड़े हो गये थे।

कुछ ही देर में एक खामोश सी हलचल हुई। मंच के दांई ओर बने दरवाजे पर झक सफेद लिबास में गुलज़ार खड़े थे। हाथ जोड़कर। उन्हें देखते ही पता नहीं वो कौन सा सम्मान था कि अनकहे ही हाॅल में मौजूद सारे लोग अपनी जगह पर खड़े होकर तालियां बजाने लगे थे। सुनहरे रंग की जूतियों से ढ़के गुलजार के पैर रफ्ता-रफ्ता मंच की ओर बढ़ रहे थे और लगातार बजती जा रही तालियां उनके कदमों की आहट पर सम्मान की न जाने कितनी परतें चढ़ा रही थी।

गुलज़ार के साथ मृणाल पांन्डेय मंच पर थी। 21 फिल्मफेयर, 7 नेश्नल अवार्ड जैसे कई पुरस्कारों की फेहरिस्त से नवाजे और करोड़ों चाहने वालों द्वारा सराहे जाने वाले गुलजार मंच पर एक मामूली से आदमी की तरह बैठे मृणाल से बात कर रहे थे। गुलज़ार होते हैं तो शायद मामूली होना भी एक खासियत हो जाता है।

मासूम बचपन इस विषय पर गुलज़ार बोलना शुरु करते हैं तो दर्शकों के बीच में कहीं से आवाज़ न सुनाई देने की शिकायत आती है। गुलज़ार हंसते हुए कहते हैं- अबसे न आये तो सीटी बजा देना।

फिर बात दादी-नानी की कहानियों के खत्म हो जाने से शुरु हुई। गुलज़ार ने एक बच्चों सी शिकायत की कि मैं नाना की हैसियत से इतनी किताबें लिख रहा हूं तो फिर क्यूं हमेशा दादी और नानी की कहानियों का जिक्र होता है, दादा और नानाओं की कहानियों का क्यों नहीं।

एक गाने का जि़क्र करते हुए गुलजार कहते हैं कि अब गुल्लक जैसे शब्द आम जि़न्दगी में प्रयोग से बाहर होने लगे हैं। बीड़ी जलइले गाने में कचेहरी जैसा शब्द इस्तेमाल किया है पर कचेहरी अब कौन समझता है। ये एक अकेला शब्द पूरी ज़मीदाराना तहज़ीब को बयां कर देता है। गुलज़ार आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि मैं अपने दौर की तहज़ीब इकट्ठा कर लूं तो मैं समझ लूंगा कि मैने एक गुल्लक बना लिया है, ताकि लोगों को जब भी ज़रुरत पड़े वो उस गुल्लक को तोड़कर उस तहज़ीब की नकदी का इस्तेमाल कर लें।

गुलज़ार अपनी कविताओं के शब्दों का जि़क्र करते हुए कहते हैं कि मैं जहां से इनको उंगली पकड़ के लाया ये मुझे वहां उंगली पकड़ ले चलते हैं।

मृणाल चर्चा आगे बढ़ाती हैं और कहती हैं कि इन्सान ही नहीं भाषा भी जड़ें टटोलती है, उसे भी अपनी मिट्टी बुलाती है। इसपर गुलज़ार 1857 के दौर में जा पहुंचते हैं जब दिल्ली उजड़ रही थी। वो कहते हैं उस दौर में गालिब ने फारसी में भी लिखा पर हमें जो याद रहा वो उनका उर्दू में लिखा दिल्ली के उजड़ने का दर्द था। क्योंकि उर्दू दिल्ली की ज़बान थी।

फिर चर्चा भाषा और बोलियों के रिश्ते को टटोलने की कोशिश करने लगती है। मृणाल कहती हैं कि जब तक उर्दू और हिन्दी जैसी भाषाएं बोलियों से जुड़ी रहती हैं उनमें नये-नये मुहावरे और बिम्ब गढ़ने की, नये प्रयोग करने की पवृत्ति बनी रहती है। लेकिन जब वो हिन्दू और मुसलमान की भाषा बनकर बोलियों से अलग हो जाती है तो उसका राजनीतिकरण हो जाता है।

मृणाल गुलज़ार की उपलब्धियों पर कहती है कि 100 साल बाद जब भाषा का इतिहास लिखा जाएगा तो गुलज़ार याद आयेंगे, रियालिटी टीवी नहीं। इस पर गुलज़ार मुस्कुराते हुए कहते हैं कि मैं आप सबका होमवर्क करके जा रहा हूं ताकि बाद में आपको इन लफ्ज़ों को सहेजने का होमवर्क न करना पड़े।

मृणाल फिर एक मज़ेदार बात कहती हैं कि इन्सान की तरह लफ्ज़ों का भी एक इतिहास होता है। भाषा दरअसल एक सराय होती है, जिसमें कई तरह की संस्कृतियां, बोलियां, शरण लेती हैं जो इस इतिहास में कुछ न कुछ जोड़ती चली जाती हैं।

गुलज़ार की कविताओं में भारत पाकिस्तान का विभाजन कई बिम्बों में नज़र आता है इस पर गुलज़ार कहते हैं कि वहां से मैं यादें और इमेज़ लेके आया हूं। वो एक वाकये का जि़क्र करते हुए बताते हैं कि विभाजन के दौर में जब मांएं गहने पोटली में बांध रही थी। पिता रुपये पैसे, बोरिया बिस्तर समेट रहे थे उन्होंने एक बच्चे को देखा तो अपना लट्टू अपने पायजामे की जेब में संभाल रहा था। क्योंकि उसके लिये उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका वो बचपन है जिसमें लट््टू की बड़ी भागीदारी है।

अब गुलज़ार अपनी लिखी कविताओं को भी बीच बीच में शामिल करने लगते हैं। अपनी नई किताब हार्ट ऑफ हिन्दी की एक कविता वो पढ़ते हैं

“आकाश पे एक खुदा है कहीं,
आज सीढ़ी लगाके ढ़ूंढें उसे,
आराम से सोया होगा।

तालियों के शोर को थामती हुए एक और कविता खालिश गुलजार की आवाज में कानों को नसीब होती है

“एक कवि यूं भस्म हुआ
एक सौ दर्द जले जब दिल में
एक नज़्म का जन्म हुआ ” 

मृणाल आगे कहती हैं कि शब्दों के साथ एक कवि का रिश्ता फिजि़कल होता है। जैसे एक बच्चे का मां से रिश्ता होता है, वैसा ही रिश्ता एक लेखक का भाषा से होता है।

गुलज़ार आगे कहते हैं कि मासूमियत की कोई उम्र नहीं होती। वो हर उम्र में आपके साथ रहती है।

गुलज़ार भाषा में बचपन को तलाशते हुए टैगोर से मिल आते हैं। वो एक दृश्य गढ़ते हैं कि एक बच्चा टैगोर को हर वक्त लिखता हुआ देखकर क्या महसूस करता है ? वो अपनी मां से शिकायत करता हुआ कहता है कि वो सारा समय बस लिखना-लिखना खेलते रहते हैं। या फिर ये कि पापा स्याही से रोज इतने कागज़ खराब करते हैं उनसे तो आप कुछ नहीं कहती लेकिन मैं नाव बनाने के लिये एक कागज़ मांगता हूं तो आप कहती हैं बरबाद मत करो। इस बिम्ब को गुलज़ार जब कविता का लिबास पहनाते हैं तो उनकी कविता में वही मासूमियत झलकने लगती है जिसकी सचमुच कोई उम्र नहीं होती।

उस महबूब स्टूडियो में जहां गुलज़ार ने विमल राय और पंचम दा जैसे लोगों के साथ बैठकर ओ रे माझी जैसे गाने बनाये, बंदिनी जैसी फिल्मों के गानों को लफ्ज़ दिये गुलज़ार उस पुराने दौर को याद करते हैं। गुलजार ने कविता के ज़रिये पोटेªट बनाने की एक नई विधा को भी जन्म दिया है। इसी विधा में जब वो पंचम दा का पोर्ट्रेट  बनाते हैं तो एक खूबसूरत बिम्ब गढ़ते हैं कि एयूं ही एक बारिश के दिन ट्रेन की खाली पटरी पर पंचम दा और वो बैठे हुए हैं और बैठे बैठे पंचम दा उन्हें अकेले छोड़कर खुद कहीं कोहरे में गुम हो जाते हैं। लफ्ज़ों से खास रिश्ता बनाने वाले गुलज़ार, खास रिश्तों के लिये लफ्ज़ तलाशते हुए भावुक से नज़र आने लगते हैं।

सवा घंटे का वक्फा तालियां बजाते-बजाते और बीच-बीच में कुछ नोट्स लेते यूं ही कट जाता है, गुलज़ार के ही शब्दों में वक्त की पतंग का माझा खत्म हो जाता है और आंखिर में गुलजार की कही वो कुछ और पंक्तियां उनकी कही कई खूबसूरत बातों के साथ उस हाॅल में बैठे और खड़े होकर उन्हें सुनते सैकड़ों लोगों के ज़हन में रह जाती हैं

“उसने जाने क्यों दांये कंधे पर
नीलगाय का एक टैटू गुदवाया है
मर जाता कल दंगों में
अच्छे लोग थे, गाय देखकर छोड़ दिया।”

 मुम्बई के महबूब स्टूडियो में गुलज़ार को उनके सामने बैठकर सुनने का ये मौका एक बेहद यादगार लमहे में जुड़ गया। अब जब भी बान्द्रा के महबूब स्टूडियो से गुजरना होगा गुलज़ार के साथ बीता ये मासूम सा दिन ताज़ा हो जायेगा। उतना ही ताज़ा जितनी गुलज़ार की कविताएं।

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