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मैगी बनाने में १० मिनट पर सेक्स ‘टू मिनट नूडल्स’की तरह क्यूं ?

Lucknow Diary

सेक्स सोसाईटी एन्ड शी…. लखनऊ में इस नाम से कोई थियेटर शो है, पहले तो ये जानकर ही जरा आश्चर्य हुआ। साथी गौरव मस्तो स्रीवास्तव निमंत्रण पत्र देके गये थे। लखनऊ में थियेटर देखने का पहला अवसर था ये इसलिये उत्साह भी बहुत था। संगीत नाटक अकादमी पहुंचे तो वहां पहले से भोजपुरी महोत्सव के रंग बिखरे हुए थे। सुनने में आया कि भोजपुरी के चहेते गायक मनोज तिवारी कुछ घंटों में इस महोत्सव में शिरकत करने आ रहे हैं।

खैर आॅडिटोरियम में पहुंचे तो देखा कि पहले से काफी लोग वहां आ पहुंचे थे। कुछ ही देर में आॅडिटोरियम की तकरीबन सारी कुर्सियां भर चुकी थी। उत्सुकता थी कि सेक्स जैसे विषय पर हो रही ये रंगमंचीय अभिव्यक्ति यौनिक मसलों को लेकर कट्टर मानेे जाने वाले इस देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी में किस सीमा तक अपनी बात कह पाएगी। और वो भी जब बात महिलाओं के यौनिक व्यवहार और उनकी यौनिक कुंठाओं पर हो रही हो।

परदा खुलता है तो एक युगल (माया और जय) हां-ना की सीमा को लांघते अंतरंग क्षणों की ओर बढ़ते दिखाई देता है पर बात चुम्बन पर आकर ठहर जाती है। यहां दर्शक के तौर पर आप पहली बार असहज महसूस करते हैं।

फिर बात एक मेडिटेशन सेन्टर के मीडिएटर (आलाप) और एक महिला (मीरा) के बीच जा पहुंचती है। मीरा परेशान है, वजह नहीं जान पा रही। आलाप उसे समझाता है कि मानसिक अशान्ति की दो ही वजहें हैं- पहला हमारे भीतर की मरी इच्छाएं और दूसरा हमारे भीतर की अधूरी इच्छाएं। और इस अशान्ति से निजात के दो समाधान हैं। मरी हुई इच्छाओं को मन से बाहर कर देना और अधूरी इच्छाओं को पूरा कर लेना। चर्चा के कुछ देर बाद मीरा ये मानती है कि उसकी इस अशान्ति की वजह उसकी पूरी न हो पा रही यौन इच्छाएं हैं।
तीसरी सेटिंग एक आॅफिस की है जहां जय जो कि सेक्स के मामले में लिबरल है, अपनी कलीग जेस से चर्चा कर रहा है।

धीरे धीरे कहानी आगे बढ़ती है। और हर उस मसले पर खुलकर चर्चा होती है जो एक आम भारतीय महिला की यौन इच्छा के अधिकार से जुड़ा है। माया जो जय के साथ शारीरिक सम्बंध बनाने से इसलिये मना कर देती है क्योंकि उसे चुम्बन तक ठीक से करना नहीं आता। नाटक इस बात पर सवाल उठाता है कि बात जब सेक्स की होती है तो वहां महिला की संतुष्टि और इच्छाएं दरकिनार कर दी जाती हैं, कोई महिला अगर इस पर बात भी करे तो उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है जबकि पुरुष अपने हिसाब से कभी धर्म के नाम पर तो कभी रस्म रिवाज के नाम पर तो कभी बस अपनी संतुष्टि के लिये उसे प्रयोग करता रहा है।

जय फैसला लेता है कि वो औरतों की यौन इच्छाओं पर एक लेख लिखेगा और औरतों से बात करेगा कि उनका क्या मानना है। औरतों से हुई उसकी बातों को हम कविताओं के माध्यम से सुनते हैं।

इस नाटक की नकारात्मक चर्चाएं लोगों में ज्यादा हो रही हैं। कि नाटक वल्गर है, अश्लील है। लेकिन उस आॅडिटोरियम में मेरे ठीक आगे एक वाकया हुआ। एक बुजुर्ग दम्पत्ति प्ले के बीच में आये और मुझसे ठीक आगे खाली पड़ी सीट में बैठ गये। पत्नी ने पति से कहा अच्छा किया कि यहां आ गये। लेकिन मंच पर बात हो रही थी कि किस तरह से रुटीन की तरह सेक्स करना रिश्तों को बासी करता है, अगर आॅफिस के काम में, खाना बनाने में, हर जगह हम नये तरीके अपनाते हैं तो सेक्स में क्यूं नहीं। अब तो लोग मैगी बनाने में भी 10 मिनट लेते हैं फिर सेक्स टू मिनट नूडल्स की तरह क्यूं? ये सब देख के तकरीबन 55 साल की उस महिला ने तकरीबन 65 साल के अपने पति से झिझकते हुए कहा कि चलो चलते हैं यहां से। पति ने बिना मंच से नज़र हटाये अपने बूढ़े हाथों से इशारा किया कि रुको। और फिर दोनों प्ले खत्म होने तक बैठे रहे और चुपचाप मंच में हो रही बातें सुनते रहे। हो सकता है कि कल्चरल शाॅक हो उनके लिये। कि कहीं वक्त बदल तो नहीं गया। इतना कि शिवलिंग के नीचे बनी रहने वाली पार्वती की योनि को नज़रअंदाज़ करने पर लखनऊ के एक मंच में युवा तल्ख होते नज़र आ रहे हैं। क्या इस बात पर कोई इतने खुले तौर पर चर्चा कर भी सकता है। उन बूढ़ी निगाहों में ये सवाल भले ही उठा हो पर शायद उन्हें भी इसमें कुछ नाज़ायज़ नज़र नहीं आया।

इस वाकये सेे ये तो समझा जा सकता है कि लोग इन विषयों पर असहज होकर ही सही बात करना चाहते हैं क्योंकि ये मसले केवल सेक्स से नही बल्कि हमारे रिश्तों से जुड़े हैं और इनके सामाजिक सरोकारों को आप नकार नहीं सकते। सेक्स का नाम जुड़ते ही आप इन विषयों को अश्लील कहकर शिरे से खारिज नहीं कर सकते। इन पर बात होना भी ज़रुरी है। हो भी रही है। होनी भी चाहिये।

अर्शना अज़मत निर्देशित ये नाटक एक सर्वे पर आधारित है जो ये बताता है कि देश की 70 फीसदी महिलाएं यौन असंतुष्टि की शिकार हैं। 47 फीसदी महिलाएं चाहती हैं कि सेक्स के दौरान उनकी इच्छाओं का भी खयाल रखा जाये।

नाटक की अच्छी बात ये है कि इसमें हिचकिचाहट नहीं है। दूसरा ये कि आदमियों को विलेन बनाकर नहीं परोसा गया है। बताया गया है कि जानबूझकर ही नहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अनजाने ही महिलाओं की इन दबी हुई इच्छाओं को दरकिनार कर देता है। वो इच्छाएं जिनका पूरा होना उनका हक है। जिनपर बिना शर्म के खुलकर बात करना गुनाह नहीं है।

नाटक के बीच में एक आध खिल्लियों के अलावा पूरे नाटक के बीच कोई कुछ नहीं बोला। बीच में कुछ तालियां बजी। अच्छा लगा कि लखनऊ वैचारिक दृश्टि से इतना आगे तो बढ़ा है कि वहां पर एक मंच में ऐसे मसलों पर बात भी हो रही है और लोग उसे गम्भीरता से ले भी रहे हैं, ज्यादा नही ंतो उस डेढ़ घंटे तक ही सही, पर किसी ने शुरुआत तो की। अर्शना अज़मत के इस प्रयास को एक बहादुर प्रयास माना जाना चाहिये और इसके लिये उनका विरोध नहीं बल्कि उनकी सराहना की जानी चाहिये। साथ ही नाटक में भाग लेने वाले कलाकारों स्वेता सक्सेना, सिमरन गुप्ता, रिशि राज मौर्या, प्रफुल्ल त्रिपाठी, शिष्टा और रिज़वान हैदर की भी जिन्होंने उस नाटक में भाग लिया जिसमें एडल्ट और वल्गर कहकर रंगमंच के पुराने कलाकारों ने भाग लेने से मना कर दिया।

नाटक के के बाद मनोज तिवारी बाहर खुले मंच में आ पहुंचे थे। भोजपुरी को समर्पित कहा जा रहा ये मंच मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी को समर्पित ज्यादा दिखा। कार्यक्रम के संचालक मंच पर मौजूद प्रतीक यादव की पत्नी और मुलायम सिंह की पुत्रवधू की तारीफें करते नहीं थक रहे थे। और मनोज तिवारी की तारीफों के तो उन्होंने मुफ्त के कई पुल बांध ही लिये थे। मनोज तिवारी आये तो उन्होंने भी भोजपुरी के नाम पर संयोजक प्रभुनाथ यादव की तारीफों की झडि़यां लगाई। लोकगीतों को समर्पित एक मंच को राजनैतिक मंच में बदलते देखने का ये अनुभव कुछ खास नहीं जंचा। मनोज तिवारी गा रहे थे और पाश्र्व में उनकी और औकेस्ट्र्रा पार्टी की आवाज़ को छोड़कर मैं लौट आया।

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