उत्तराखंड बाइक यात्रा -4

चौथा दिन : बेरीनाग-चौकौड़ी-राईआगर-गंगोलीहाट 

सुबह-सुबह हम बेरीनाग से चौकोड़ी के रवाना हो गए. मौसम एकदम खुला हुआ था. आकाश एकदम साफ़ और हवा मंद मंद बह रही थी. बाइक-यात्रा के लिए ये एकदम मुफीद मौसम था.

 

 

चौकोड़ी पहुंचकर हम काफी देर तक खुद के वजूद को जंगल के हवाले किये बैठे रहे. एकदम शांत माहौल और सामने हिमालय की श्रृंखलाओं का मनोरम दृश्य. बिना कुछ बोले केवल प्रकृति को निहारते हुए ही यहां कई घंटे बिठाये जा सकते थे.

करीब तीन घंटे इस एकांत में बिताकर हम वहां से लौट आये. अब हमें खाना खाकर गंगोलीहाट के लिए निकलता था.

रास्ते में घास के ‘लूटे’ मकानों के आस-पास दिखाई दिए. ये ‘लुटे’ दरअसल जानवरों के चारे के संग्रहण के लिए किया जाने वाले पहाड़ी इंतज़ाम का तरीका हैं.

राईआगर से जो सड़क गंगोलीहाट की तरफ जाती है उसे देखकर लगता है कि अब हम किसी उपेक्षित छोड़ दी गई जगह की तरफ जा रहे हैं. बावजूद इसके कि गंगोलीहाट का आध्यात्मिक और पर्यटन दोनों दृष्टिकोण से काफी महत्त्व है, यहाँ की ये सड़क सालों से नहीं बनी. जगह जगह पर बुरी तरह बेहाल इस सड़क से गुजरना अब तक का सबसे खराब अनुभव रहा.

उस रात गंगोलीहाट में हम लोग मेरे घर पर रहे. अगले दिन सुबह सुबह हम पाताल भुवनेश्वर की तरफ चल पड़े. पाताल भुवनेश्वर एक अनूठी गुफा है जिसका आध्यात्मिक महत्त्व काफी माना जाता है. माना ये भी जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी. गुफा स्थापत्य के रूप में भी अपना अलग महत्त्व रखती है. पथ्थरों पर जिस तरह की नक्काशियां हैं वो देखने लायक हैं. मैं इससे पहले भी कई बार इस गुफा के भीतर गया था पर दानिश गुफा के द्वार पर पहुँचते ही असहज महसूस करने लगा इसलिए हमने बाहर के नजारों का लुत्फ़ लेना ही बेहतर समझा. भुवनेश्वर एक सुन्दर पहाड़ी गाँव है और यहाँ से भी हिमालय की लम्बी पर्वत श्रृंखला सामने दिखाई देती है. 

पाताल भुवनेश्वर से लौटने के बाद हम मेरे गाँव चिटगल की तरफ रवाना हो गए. चिटगल वहां से करीब दस किलोमीटर दूर है.  

ये सुन्दर पहाड़ी गाँव है. चिटगल में ताईजी और भाभी ने पहाड़ी खाना खिलाया. पालक की सब्जी, भटिया, चावल, दाल एक थाली में हमें परोसा गया. खाना खाकर कुछ देर हम वहां सुस्ताए और फिर शाम को वापस गंगोलीहाट लौट आये .

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