khajuraho temple sculptures

खजुराहो – कामसूत्र की मूर्तियों के लिए मशहूर है ये मंदिर

खजुराहो का भव्य मंदिर (Khajuraho temple) किसी पहचान का मोहताज नहीं है. मध्य प्रदेश में मौजूद खजुराहो अपनी मिथुन मूर्तियों के लिए दुनियाभर में मशहूर है। खजुराहो की मूर्तियों का रहस्य जानने निकलेंगे तो आप भी एक अलग दुनिया की यात्रा पर निकल जाएँगे।

खजुराहो मंदिर यात्रा की शुरुआत ऐसे हुई (Khajuraho temple journey)

खजुराहो का बस स्टॉप (फ़ोटो : उमेश पंत) Khajuraho travelogue

तब मैं किसी रिपोर्टिंग असाइनमेंट के लिए बुंदेलखंड में था। पता चला कि खजुराहो मंदिर यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं है तो खजुराहो यात्रा का मन बन गया। बाँदा से रात की ट्रेन पकड़ी और थोड़ी देर में ट्रेन चीख़ती हुई रात के वीरान सन्नाटे से गुज़र रही थी.

क़रीब दो घंटे का सफ़र था ये. ट्रेन लगभग ख़ाली थी. हम किसी बियाबान से गुज़र रहे थे. रात को ऐसे ख़ाली ट्रेन में यात्रा करना किसी रहस्यलोक में जाने सा अहसास देता है. 

एक बजे के क़रीब हम छतरपुर ज़िले में खजुराहो के स्टेशन पर थे. अब हमें अपने रहने का ठिकाना तलाशना था. हम उत्तर-प्रदेश की सीमा पार कर अब मध्य प्रदेश में आ चुके थे. स्ट्रीट लाइट का अच्छा खासा उजाला था. अच्छे से बनी हुई सुडौल सड़क एकदम शांत थी.

इस बीच हमें एक शख़्स मिला जिसने होटल दिलाने की पेशकश की. कुछ देर में उसी शख़्स ने हमें एक होटल का कमरा दिला दिया.


खजुराहो मंदिर है यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट (Khajuraho Temple world heritage site) 

फ़ोटो : उमेश पंत Khajuraho travelogue

खजुराहो पहली नज़र में एक सुंदर शहर लग रहा था. लग रहा था इस शहर को को सैलानियों की आमद की आदत है. इसलिए यह देश के दूसरे छोटे शहरों की तुलना में कुछ ज़्यादा व्यवस्थित है. अगले दिन हमें खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों को देखने जाना था इसलिए इस वक़्त सोकर सुबह जल्दी उठना ही बेहतर था.

उठते-उठते हमें नौ बज गया. नहा-धोकर हम नाश्ता करने निकल पड़े. प्यारी सी धूप खिली हुई थी. इस शांत से, छोटे से क़स्बे में जैसे एक सकारात्मक सी ऊर्जा भरी हुई लग रही थी.

क़रीब पंद्रह मिनट पैदल चलकर जैसे ही हम एक गेट से अंदर आए ऐसा लगा जैसे इतिहास में कई साल पीछे लौट आए हों. हम यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में थे. खजुराहो के मंदिर समूह के बीचों-बीच.


खजुराहो मंदिर का इतिहास (History of Khajuraho Temples)

फ़ोटो : उमेश पंत

10वीं शती में चंदेल वंश के शासनकाल में इन मंदिरों को बनाया गया. उनके शासन के 100 सालों इन मंदिरों का निर्माण किया गया. माना जाता है कि यहां 85 मंदिर हुआ करते थे जिनमें से अब 25 मंदिर ही बचे हैं. शैव, वैष्णव और जैन सम्प्रदाय से जुड़े इन मंदिरों में से ज़्यादातर लाल बलुवा पत्थरों से बनाए गए हैं. लक्ष्मण, विश्वनाथ, दूल्हादेव, कंदरिया महादेव, पार्वनाथ, वामन, जवारी, चित्रगुप्त वगैरह यहां के कुछ प्रमुख मंदिरों में शुमार हैं. 

Khajuraho temple sculpture
फ़ोटो : उमेश पंत Khajuraho travelogue

पन्द्रहवीं शती के बाद इन मंदिरों का महत्व कम हो गया और ये इतिहास की गर्त में कहीं खो गए. लेकिन 18वीं शताब्दी में इन मंदिरों को तब दुबारा खोजा गया जब एक ख़बर फैली की बुंदेलखंड के इन घने जंगलों में कामुक मूर्तियां छिपी हुई हैं. इस ख़बर का पीछा करते हुए एक ब्रिटिश सर्वेकर्ता ने इन मंदिरों को दुबारा खोज निकाला. यह मंदिर तीन समूहों में बाँटे गए हैं. पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी मंदिर समूह.

पश्चिमी मंदिर समूह में कंडरिया महादेव प्रमुख है जो भगवान शिव का मंदिर है और इसे कैलाश पर्वत के आकार में बनाया गया है. दूसरा मंदिर देवी जगदंबिनी मंदिर है जो भगवान विष्णु का मंदिर माना जाता है. यहां मौजूद सैकड़ों कामुक मूर्तियों की वजह से इसे कामसूत्र मंदिर भी कहा जाने लगा है.


कामसूत्र (Kamsutra) की कलाओं को दिखाती मूर्तियां 

 

फ़ोटो : उमेश पंत khajuraho temple sculptures

हम एक-एक करके इस विशाल आहाते में बने मंदिरों में जा रहे थे. क़रीने से सजे हुए बगीचों के इर्द-गिर्द फैले इन मंदिरों का स्थापत्य इतना सुंदर था कि इनसे नज़र हट ही नहीं पा रही थी. जितनी गहराई से देखेंगे आप इनकी शिल्पकला के उतने ज़्यादा क़ायल होते चले जाएंगे.

Khajuraho temple
फ़ोटो : उमेश पंत Khajuraho travelogue

खजुराहो के मंदिरों को मुख्यतौर से इनकी दीवारों पर उकेरी गई मैथुन (sexual intercourse) प्रतिमाओं के लिए जाना जाता है. इन कामुक मूर्तियों में भारतीय कामसूत्र (Kamsutra) की सैकड़ों भंगिमाएं देखने को मिल जाती हैं.

इन्हें देखकर लगता है कि इतिहास के उस हिस्से में समाज में सेक्स को लेकर कितना खुलापन रहा होगा. आज की तारीख में यह कल्पना कर पाना भी मुश्किल है कि इतने खुले तौर पर यौन क्रियाओं (sexual activity) को सार्वजनिक जगहों पर ऐसे प्रदर्शित किया जा सके और उसपर कोई होहल्ला ना हो.

फ़ोटो : उमेश पंत khajuraho temple sculptures

यहां मौजूद मंदिरों में सहवास (sex) की इन अलग-अलग मुद्राओं को तांत्रिक सेक्स से जोड़कर भी देखा जाता है. मशहूर यात्री इब्नेबतूता ने अपनी यात्राओं के विवरण में खजुराहो के बारे में लिखा है कि ‘यहां मौजूद कन्दराओं में योगी रहा करते थे जिनके बाल उनके शरीर के बराबर लम्बे थे. ये लोग योगसाधना में इतने तल्लीन रहते थे कि इनके शरीर पीले पड़ चुके थे.’


काम कलाओं (Art of sex) के अलावा भारतीय दर्शन के दूसरे पहलू 

फ़ोटो : उमेश पंत

 

हालांकि ये मंदिर मुख्यतौर पर अपनी कामुक मूर्तियों के लिए जाने जाते हैं लेकिन सच यह है कि यहां मौजूद हज़ारों मूर्तियों की केवल 10 प्रतिशत ही कामकला (Sex positions) की अभिव्यक्ति से जुड़ी हैं.

शेष 90 प्रतिशत मूर्तियां भारतीय दार्शनिक चिंतन के दूसरे आयामों मसलन धर्म, अर्थ और मोक्ष से जुड़ी मानी जाती हैं. साज-सज्जा करती हुई औरतें, वाद्ययंत्र बजाते हुए संगीतज्ञ, दैनिक काम में लगे कुम्हारों और किसानों का जीवन भी इस मूर्तिकला का हिस्सा है.

यह भी कहा जाता है कि प्राचीन समय के महाकाव्यों जैसे कर्पूरमंजरी और काव्यमीमांसा में मौजूद दृश्यों को भी मंदिरों में बनी इन आकृतियों में उकेरा गया है. यहां मौजूद मंदिर भारतीय स्थापत्य कला के मंडल डिज़ाइन में बने हुए हैं.

ज़्यादातर मंदिरों में एक चबूतरा और एक गर्भग्रह है. मंदिरों के चारों और प्रदक्षिणा (घड़ी की सुइयों की दिशा में चक्कर लगाना) के लिए जगह भी बनी है.

फ़ोटो : उमेश पंत

इन मूर्तियों में इंसानों के अलावा जानवरों की भी प्रमुखता दिखाई दे रही थी. इनमें हाथी, भेड़िए, शेर वगैरह स्पष्ट दिखाई दे रहे थे. यह रहस्यमय आध्यात्मिक शक्तियों के प्रतीक हैं. गजव्याल (हाथी और शेर) और वृकव्याल (भेड़िए और शेर) जैसी संकर (हाईब्रिड) प्रजातियों को खजुराहो के अलावा भारत के और भी मंदिरों में देखा जा सकता है.

फ़ोटो : उमेश पंत khajuraho temple sculptures

कहा जाता है कि इन मंदिरों के आस-पास एक वक़्त में 64 पानी के स्रोत (नदी, तालाब वगैरह) हुआ करते थे. इनमें से खजूर सागर, सिब सागर और खुदर नदी यहां अब भी मौजूद हैं.

खजुराहो की यात्रा दरअसल काम-वासना जैसे दैहिक सुखों के साथ-साथ भारतीय आध्यात्मिक दर्शन की यात्रा भी है. भारतीय दर्शन के आगम परंपरा के व्यक्त, व्यकताव्यक्त और अव्यक्त जैसे गूढ़ सिद्धांतों को पत्थर पर उकेरकर उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज लिया गया है.

 

फ़ोटो : उमेश पंत

क़रीब ढाई-तीन घंटे हम भारतीय स्थापत्य को दिखाते इस अद्भुत अहाते में घूमते रहे. और सोचते रहे वो कैसे कलाप्रेमी लोग रहे होंगे जिन्होंने कल्पनाओं को इतने बेहतरीन तरीके से आकृतियों में ढाल दिया. ये भी कि हम अपनी विरासत की इस ज़बरदस्त रचनात्मक प्रतिभा को क्या कभी दुबारा हासिल कर पाएंगे?

Khajuraho travelogue

हम काफ़ी देर से चल रहे थे और अब थकान भी लग गई थी. कुछ देर सुस्ताकर हम इस ऐतिहासिक मंदिर समूह से बाहर निकल आए. कुछ देर होटल में आकर आराम किया. और फिर चैकआउट करके टैक्सी स्टैंड की तरफ़ बढ़ गए. बाहर एक मेला लगा हुआ था. जिसमें तरह-तरह की चीज़ें मिल रही थी. छोटे शहर का मेला वहां की सरल-साधारण आकांक्षाओं का प्रतिनिधि होता है. यहां आज भी ‘हर माल पांच रुपए’ में बिक रहा था. 

फ़ोटो : उमेश पंत

मसालों की एक ऐसी दुकान के रंगों पर मेरी नज़र गयी. एक ख़्याल आया कि ‘कामकला’ हो या ‘पाककला’ हमारा यह देश हर लिहाज़ से कितना रंग-बिरंगा है. इस देश का ज़ायक़ा ही यही है कि यह न जाने कितने रंगों की महक से सराबोर रहा है. क्या हम इस मिश्रित परंपरा का ज़ायक़ा यूं ही बरक़रार रख पाएंगे?

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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