बाइक यात्रा सबसे रोमांचकारी और मजेदार होती है, खासकर जब आप पहाड़ों की यात्रा कर रहे हों, क्योंकि कभी आप बादलों के बीच तैरते हुए चलते हैं तो कभी सूरज के साथ रेस लगाते हैं और आपके साथ चलते हैं पहाड़, नदियां, शहर, गांव, बाजार, तारे, चांद और पूरा आसमान। हालांकि मुझे बाइक चलानी नहीं आती, लेकिन सीखना जरूर है, ताकि मैं अपने यात्रा पार्टनर की मदद कर सकूं। बाइक से जौनसार-बावर घूमने के बाद बदरीनाथ हाईवे नापने का प्लान बना, जो सुनकर ही रोमांचकारी लग रहा था। बदरीनाथ, देश के आखिरी गांव माणा और विश्व धरोहर फूलों की घाटी की ट्रिप के लिए कई दिन तक हम प्लान बनाते रहे। क्योंकि बेहद कठिन ट्रैक वाले वैली ऑफ फ्लावर जाने का सपना जो साकार होने वाला था। इस बारे में सोच-सोचकर मैं कल्पनाओं के सागर में गोते लगा रही थी। हमने ढेर सारी रणनीतियां बनाईं कि माणा तक का सफर कितने दिन में तय करेंगे, कहां नाइट स्टे करेंगे और किस जगह किस होटल में रुकेंगे आदि, आदि…।
इस बार सफर के साथी छह लोग थे। तीन बाइक चलाने वाले और तीन पीछे बैठने वाले और छह दिन में ट्रिप पूरी करने का प्लान बना, हालांकि हमारे पास सात से आठ दिन का समय भी था। बदरीनाथ हाईवे का दामन हमने ऋषिकेश में थामा, जो देश के आखिरी गांव माणा तक जारी रहा। देहरादून से निकले तो टिहरी, पौड़ी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग जिले को कवर करते हुए चमोली जिले में पहुंच गए। वाकई इन रास्तों से होकर गुजरना एक जादुई एहसास की तरह था।
आइये अब आपको अपने दल से मिलाती हूं… मैं यानि नेहा, जिसे घूमने का जुनून है… चंद्रप्रकाश, मेरे सबसे अच्छे दोस्त और मेरे पति, जो मेरे घूमने के सपने को मेरे साथ पूरा कर रहे हैं। अंकित, कॉलेज का दोस्त, जो हर छोटी बात को बढ़ा चढ़ाकर पेश करता है। जैसे उसका मानना था कि 3658 मीटर की ऊंचाई पर स्थित वैली ऑफ फ्लावर की ट्रेकिंग के दौरान हमें सांस लेने में तकलीफ हो सकती है तो छह लोगों के बीच हमें तीन ऑक्सीजन सिलेंडर भी ले लेने चाहिए, जो वहां से लौटने के बाद मेरे शोकेस की शोभा बढ़ा रहा है। खैर अभिषेक अवस्थी, कालेज का दोस्त और हमारा प्यारा फोटोग्राफर। मस्तमौला विजेंद्र सर और सबका ख्याल रखने वाली उनकी पत्नी कमलेश मैम…
फ़ोटो : अभिषेक अवस्थी
पहला दिनः पहला पड़ाव – रुद्रप्रयाग
महीनों इंतजार के बाद आखिरकार वह दिन आ गया, जब हम इस बाइक यात्रा के लिए घर से निकल पड़े। हां, वो दिन 12 सितंबर था, दो बाइक और विजेंद्र सर की लाल स्कूटी, जिसे वह अक्सर ट्रिप के दौरान जगुआर कहते थे (क्योंकि लोगों का मानना था कि स्कूटी लेकर इतना दूर पहाड़ पर जाना ठीक नहीं), से चल दिए। कम सामान करते-करते भी सबके दो-दो बैग हो गए, गरम कपड़े भी तो रखने थे। ऊपर से कैमरा वाले बैग भी। 11.30 बजे हम घर से निकले और थानो होते हुए सफर शुरू हो गया। उस दिन काफी धूप थी, लेकिन हम उत्साह से लबरेज थे। मैं मुनिकीरेती तक पहले भी जा चुकी थी। ऐसे में उसके बाद हमारा असली सफर शुरू हुआ, अनदेखे नजारे खुलने लगे। एक तरफ साथ-साथ चलती कल-कल बहती गंगा तो दूसरी ओर ऊंचे पहाड़। आसमान में चमकता सूरज और उसके साथ चलते हम। सबकुछ शांत था, सब इस पल को महसूस कर रहे थे, बस कभी-कभार सामने से आती गाड़ियों को देखकर बजने वाला हार्न ध्यान भंग कर देता था। बाइक सड़क पर सरपट दौड़ रही थी, हमें दून से रुद्रप्रयाग तक करीब 180 किमी का सफर तय करना था।
पहले दिन की यात्रा में पहला पड़ाव व्यासी से कुछ दूर पहले था, जहां चाय की एक छोटी की दुकान थी। गंगा नदी पर एक प्यारा सा झूला पुल और पुल पार बेहद खूबसूरत पहाड़ी गांव, चंद सीढ़ीनुमा खेत। भूख लग आई थी सबको, तो चाय और मैगी का आर्डर दिया गया और निकल पड़े उस झूला पुल पर। नीचे गंगा वेग से बह रही थी, किनारे पड़े पत्थरों और चट्टानों को कभी सहलाकर तो कभी तेजी से छूकर निकल जाती थी। कुछ स्कूली लड़कियां घर लौट रही थीं, हंसती-गाती, वहां सुकून था, लेकिन पलभर ठहर कर सफर फिर शुरू हो गया। हमने मैगी खाई, तीखी मिर्च वाली, चाय वाले चाचा की तारीफ की, फिर निकल पड़े।
फ़ोटो : अभिषेक अवस्थी (व्यासी से कुछ पहले एक प्यारे से गांव को सड़क से जोड़ने वाला झूला पुल)
अगला पड़ाव था देवप्रयाग, प्रयाग का अर्थ संगम है, यहीं अलकनंदा और भागीरथी का संगम होता है और गंगा नदी अस्तित्व में आती है। देवप्रयाग शहर दो नदियों के संगम पर बसा है और इसकी खूबसूरती देखते बनती है। पल भर रुककर हमने वहां की खूबसूरती निहारी, मानो सारे नजारों को आंखों में भरकर साथ ले जाएंगे। तस्वीरों में इस शहर को कैद कर हम फिर से सफर पर निकल पड़े। अगला पड़ाव श्रीनगर था। हमने रात से पहले रुद्रप्रयाग पहुंचने का तय किया था और अब शाम ढलने लगी थी।
रास्ते में एक जगह भूस्खलन का ट्रीटमेंट चल रहा था, जहां ट्रैफिक को रोका गया था। वहां कई मजदूर काम पर लगे थे, वहां हमें इंतजार करना पड़ा, फिर से हम निकल पड़े सफर पर।
फ़ोटो : अभिषेक अवस्थी
श्रीनगर पहुंचते-पहुंचते अंधेरा घिरने लगा था, हम थक कर चूर हो गए थे, नदी किनारे झिलमिलाती घरों की रशनी जगमगाते सितारों सी लग रही थी और बंगाली रेस्टोरेंट के डोसे भी शानदार थे। भूख जोरों की लगी थी और सुबह से हमने सिवाय मैगी के कुछ नहीं खाया था। कमलेश मैम भी जो तहरी हमारे लिए बना कर लाई थीं, वो रास्ते में कहीं गिर चुकी था। ऐसे में खाना दिखते हम टूट पड़े।
रात घिर आई थी और हम रात्रि पड़ाव से अब भी करीब 30 किमी दूर थे। चूंकि पहले से तय था कि रात में हम यात्रा से परहेज करेंगे, इसलिए जल्द से जल्द रुद्रप्रयाग में अपने होटल ज्वालपा पहुंचना था। पहाड़ों में शहरों के जैसे स्ट्रीट लाइट तो होते नहीं हैं तो गाड़ी की हेडलाइट ही एकमात्र सहारा होती है। ऐसे में बेहद सावधानी से गाड़ी चलाने की जरूरत होती है। अब बस किसी तरह रुद्रप्रयाग पहुंचने की देरी थी, हम थक कर चूर हो चुके थे, आंखें बोझिल होने लगी थीं, शरीर बैठे-बैठे जवाब देने लगा था। रास्ते में लोगों से पूछते-पूछते हम करीब सवा आठ बजे अपने होटल पहुंचे, जो हाईवे से कुछ नीचे उतरकर अलकनंदा के किनारे स्थित है। अगले दिन एक नया सफर, एक नई उम्मीद, नया सपना लेकर हमें निकलना था और अगला पड़ाव था बदरीनाथ।
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शानदार वर्णन….
बहुत सुंदर वर्णन???