सुबह की सैर जैसे सपना हो गई हो

बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का सपना हो गई थी..

ज़मीन अभी भी नम थी.. जैसे कभी कभी उसकी आंखें हो जाया करती हैं उसकी याद में.. उतनी ही पाक-साफ़, उतनी ही मासूम..


ज़मीन पर बिखरे हुए फूलों को देखकर उसे लगा कि उसकी यादों का रंग शायद हल्का पीला होता होगा.. उसने गीली हो गई उस हरी बेंच पर बिखरी उन मासूम पंखुडि़यों को गौर से देखा.. उनके बिखरने में खूबसूरती तो थी पर उस खूबसूरती के पीछे एक टूटना रहा होगा, इस खयाल की उदासी ने उसके मन के मौसम की सीरत को बदल दिया हो जैसे…. टहनियों से बिछड़कर कैसा लगता होगा कभी हवा से लहलहाने वाली इन बेचारी सिकुड़ी हुई पंखुडि़यों को… ? ये सोचते ही उसे ये पंखुडियां उन खूबसूरत आंखों की तरह लगने लगी थी जो रात भर रोती रही हों.. एकदम उदास और कुम्हलाई हुई सी..

उसने सामने देखा. एक नन्हीं चिडि़यां ने अभी अभी पास ही के पेड़ पर खिले हुए फूलों से भरी एक टहनी से परवाज़ भरी और फिर वो आकर उसी बेंच पर आ बैठी। फिर इन पंखुडि़यों को ऐसे देखने लगी जैसे एक वही हो जो इनकी  देह भाषा और उसमें छिपे दुखों को जानती हो..कुछ देर उन पंखुडि़यों को निहारने के बाद वो आकाश में कहीं दूर उड़ गई. उदासी एक हद से ज़्यादा सही भी तो नहीं जाती।

सामने से गुजरती पगडंडी पर अभी अभी एक छोटी बच्ची साईकिल चलाती हुई गुजर गई थी.. उसे लगा जैसे साइकिल के पहियों के नीचे किसी ने उसकी यादें कुचल दी हों.. वही यादें जिनका रंग पीला था.. पीला रंग उसे इससे पहले इतना फ़ीका कभी नहीं लगा.

उसने एक कुचली हुई फीकी याद को ज़मीन से उठाकर मुठ्ठी में थाम लिया.. पर यादें कभी किसी की मुठ्ठी में रही हैं भला.. ?

बाद बारिश के सुबह की सैर जैसे रात का दुहस्वप्न हो गई हो.. वह इस दुहस्वप्न से लौटने को मचल उठा.. ये कोशिश वो इससे पहले भी कई बार कर चुका था..

कई दफा चलते-चलते हम ऐसी जगह पहंच जाते हैं जहां से लौटना फिर चाहकर भी मुनासिब नहीं होता..

उफ़ वह हर बार जब भी लौटता है तो वहीं पहुंचता है जहां से वो लौट गई थी.. कभी न लौटने के लिए.
(जून 2015)

 

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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