उस रात मुंबई में

मुंबई डायरी : 7 (दिसम्बर 2011)

अजीब से रतजगे हैं इन दिनों। आज फिर रात भर का जागा हूं। पिछले कुछ दिनों से सुबह 7-8 बजे से पहले नीद नहीं आ रही। पता नहीं क्यूं……. कल रात को ढ़ाई बजे, एक दोस्त का फोन आया। तुम्हारे पास मेरी एक पेन ड्राईव है… सुबह तुमसे लेनी ही है… मेरे पास इन्टरनेट भी नहीं है… सुबह सुबह एक स्क्रिप्ट भेजनी है… क्या तुम आ सकते हो? पता नहीं क्यों लोगों को मना नहीं कर पाता। कुछ देर एक बेचैनी रही। इतनी रात…जाउं या नहीं…थोड़ा अटपटा सा लगा कि कोई इतनी रात को कैसे बुला सकता है। पता नहीं क्यों कई बार लोग अचानक इतने अपने लगने लगते हैं…..जींस पहनी… लैपटौप बैग उठाया और निकल गया। किसी का कोई सवाल नहीं था कि इतनी रात को कहां जा रहे हो? क्यों जा रहे हो? हांलाकि साथ रहने वाले दोस्त को अटपटा लग रहा था। कि मैं क्यूं जा रहा हूं? बाहर सड़क पर कुछ कुत्ते भौंके तो पर पता नहीं क्यों डर नहीं लगा। औटो लिया। औटो यारी रोड की ओर भाग रहा था। सड़कें खाली थी। जाते हुए कुछ मौन्टाज़ सरीखे विजुअल्स आंखों से टकरा रहे थे।

एक 35 साल की औरत उसी दिशा में पैदल चल रही थी जिस दिशा में हम जा रहे थे। थोड़ी सी बेचैन सी। एक 28-29 साल की लड़की उससे कुछ बड़ी उम्र के आदमी के साथ अपने कुत्ते को घुमा रही थी। एक आदमी था जो एक कुत्ते के बगल में बैंच पर चुपचाप बैठा न जाने क्या सोच रहा था। एक खाली सड़क थी जिसने मुझे गुमराह कर दिया था। औटो वाले ने इन्क्वायरी सी की… कहां से आ रहे हो? कहां जाना है? उसे मेरे हाव भाव और मेरी बातों में शायद कोई बेचैनी नज़र आई हो… रास्ता भटक जाने की वजह से उसका शक शायद कुछ पुख्ता हो गया हो… या फिर शायद अचानक उसमें मुझे अपना कोई पोटेन्शियल कस्टमर नज़र आ गया हो। दोस्त के घर से कुछ मीटर की दूरी पर पहुंच ही गया था कि फोन आया… भाई अभी अभी सिगरेट का एक पूरा पैकेट खरीदा था। वापसी में औटो में छूट गया… प्लीज़ रास्ते से ले आओ… औटो वाले से औटो मोड़ने को कहा… उसी रास्ते पर लौट आया जिससे अभी अभी गुजरा था। वापसी में वही अकेली औरत अब भी हमारी ही दिशा में उसी बेचैनी से तेज़ तेज़ चल रही थी …..हमारी दिशा बदली थी तो उसकी बदली हुई दिशा भी बदली नज़र नहीं आ रही थी। ऐसा अक्सर होता है। औटो वाले ने उसके पास जाकर हौर्न बजाने की कोशिश की…मैने ऐसा करने से मना किया…. अन्ना अपनी जगह पर नहीं थे। सिगरेट नहीं मिली… लगभग आधी दूरी वापस तय करना बेकार चला गया। अन्ना ने दोस्त की उम्मीद तोड़ दी थी। अन्ना की उम्मीद शायद किसी पुलिस वाले ने तोड़ दी हो… उम्मीदें तोड़ना भी तो किसी चेन रिएक्शन सा ही होता है। फिर वापस दोस्त के घर की ओर लौटा। वापसी में औटो वाले ने बताया कि रात को उसे हर तरह के लोग मिलते हैं और उनके लिये हर तरह के इन्तजाम उसके पास हैं। शराब, अफीम, गांजा, हैरोईन से लेके देशी,विदेशी लड़की तक। बोला हमारा काम है जो कस्टमर कहे उसे दे देना। आप अभी इस वक्त जो चाहें मैं यहीं पर आपको दे सकता हूं। पर ये जो चाहे वाला कंसेप्ट कितना लिमिटेड होता है ना। मैं जो चाहूं मुझे मिल जाता तो मेरी चाहतें खत्म ही नहीं हो जाती।

पिछला कुछ वक्त बम्बई से गुजरता हुआ दिल्ली और फिर उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों से सरकता वापस बम्बई में बीता है। इस बीच कितनी तरह की हवाओं को महसूस किया, कितने सारे लोगों से बात की, कितनी तरह का खाना खाया, कितनी सड़कों पे सफर किया, कितने अनुभव बटोरे…. कितनी खुशी होती है जब जिन्दगी में कितनापन घुल रहा होता है।

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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