20 हज़ार फ़ीट से भी ज़्यादा ऊंचे ओम पर्वत की यात्रा

यह उमेश पंत के यात्रावृत्तांत ‘इनरलाइन पास’ का एक अंश है. पूरा यात्रा वृत्तांत पढ़ने के लिए किताब यहां से मंगा सकते हैं.

हम इस वक़्त गुंजी में थे और ओम पर्वत की यात्रा के लिए तैयार थे. उत्तराखंड के धारचूला में मौजूद गुंजी कैलास मानसरोवर यात्रा का एक अहम पड़ाव है. यहां से यात्री नाभीडाँग होते हुए चीन की सीमा से लगे लिपुलेख दर्रे को पार कर कैलास मानसरोवर की ओर बढ़ते हैं. गुंजी से दूसरा रास्ता खूबसूरत ‘कुटी यांक्ती’ घाटी से होते हुए ज्योलिंगकोंग की तरफ़ जाता है. यहां आदि कैलास पर्वत और पार्वती झील के दर्शन करने यात्री पहुंचते हैं. धारचूला से शुरू होने वाली 200 किलोमीटर (आना-जाना मिलाकर) की इस पूरी पैदल यात्रा में क़रीब 14-15 दिन का समय लगता है.


गुंजी से कालापानी

सुबह के साड़े छह बजे हम धारचूला के गुंजी में सेना के कैम्प के बाहर खड़े थे. पिछली रात हमें बताया गया था कि सुबह-सुबह सड़क बनाने वाले मजदूरों को लेकर एक ट्रक कालापानी तक जाता है. कालापानी गुंजी से नौ किलोमीटर दूर था और वहां से नाभीडांग का रास्ता आधा ही बच जाता है. 

करीब आधा घंटा इंतज़ार करने के बाद हमें एक ट्रक दिखाई दिया. ट्रक में सबसे पहली सीमेंट के कई कट्टे चढ़ाए गए. आसपास की हवा में सीमेंट का एक गुबार सा फ़ैल गया. हमारे अलावा कुछ महिलाएं भी थी जो ट्रक में चढ़ने की फिराक में थी. उनमें से कुछ तो बस ये नज़ारा देखकर ही चली गई. जो कुछ बची रह गई उन्हें ट्रक में ड्राइवर के बगल वाली सीट पर अडजस्ट कर लिया गया. 

सीमेंट के कट्टों के बाद करीब बीच पच्चीस मजदूर उन कट्टों के ऊपर चढ़ गए. उन्होंने कहीं न कहीं खुद को फिट कर लिया. अब बारी हमारी थी. मोहन भाई, रोहित और मैं. हमें बाकी बची ज़रा सी जगह में कहीं खुद को समायोजित कर लेना था. 

 कोई और जगह होती तो शायद इस गुबार भरे, ओवरलोडेड ट्रक में बैठकर हम अपना सफ़र कभी तय न करते पर यहां ऐसा करना एक नया अनुभव लेने की तरह था. नदी घाटी के इस विस्तार में, जहां दूर से बर्फ के कपड़े पहने हुए पहाड़ हमारी ओर मुस्कुराते से तांक रहे थे, कुछ छोटे ग्लेशियर हरे पहाड़ों की चोटियों  से फुदकते खरगोश की तरह पहाड़ के नीचे उतरने की कोशिश कर रहे थे, हम कच्ची सड़क पर धक्के खाते ट्रक में बैठे आज के सफ़र को शुरू कर चुके थे. इस दृश्य को फिल्माया जाता तो ये टेरेंस मलिक की डेज़ ऑफ़ हेवन जैसी फिल्म का दृश्य ही लगता. हमारे पास कैमरा तो था ही, रोहित ने इस दृश्य को फिल्माना शुरू कर दिया था. 

 

किसी मजदूर के मोबाइल पर एक नेपाली गाना बज रहा था और ट्रक उस ऊबड़ खाबड़ सड़क से गुजरता ऐसा एहसास दे रहा था जैसे हम किसी फिल्म के बीच से गुजर रहे हों. अक्सर हम बैठे होते हैं और परदे पर फिल्म हमारी आंखों से गुजर रही होती है लेकिन यहां हम गुजर रहे थे, फिल्म अपनी जगह ठहरी हुई थी. 

  आगे बढे तो हल्की-हल्की बारिश होने लगी. हमें अपने बैग और कैमरे को भीगने से बचाना था. आस-पास बैठे मजदूरों को छाते के सीकों से बचाते हुए हमने छाता खोल लिया. 

 

 

ये सड़क एक रोमांच से भरी सड़क थी. कहीं एकदम संकरी, कहीं विस्तार लिए, कहीं इतनी चढाई कि ग्रिप का यह शक्तिशाली इंजन वाला ट्रक मात खाने लगे, कहीं रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर थे तो कहीं लबालब भरा पानी. एक जगह ट्रक को इसलिए करीब आधा किलोमीटर पीछे लौटकर आना पड़ा क्यूंकि सैकड़ों भेड़ों का एक झुण्ड सामने से आ रहा था.  जैसे कोई मशीन प्रकृति के एकदम मौलिक स्वरूप में चाहकर भी व्यवधान न डाल पा रही हो. यहां प्रकृति मशीन पर हावी थी और रोमांच ज़हन पर.


कालापानी का रहस्य

नौ किलोमीटर की इस यात्रा का रोमांच काला पानी में जाकर पूरा हो गया. ट्रक इससे आगे नहीं जा सकता था. यही प्रकृति के सामने एक मशीन की सीमा थी.

 कालापानी में एक मंदिर है जिसके पास टाइल्स की मदद से एक छोटा सा तालाब नुमा टैंक बनाया गया है. कहा जा रहा था कि ये महाकाली नदी का उद्गम है. हांलाकि इस बात को मान लेना इतना आसान नहीं था. उफनती हुई महाकाली नदी का उद्गम एक ऐसी जगह कैसे हो सकती थी जहां लगता था कि पानी लाकर डाल दिया गया हो.  इसके पीछे की कहानी ज़रूर कुछ और थी. 

 

खंगालने पर पता चला कि दरअसल कालापानी को लेकर भारत और नेपाल के बीच एक सीमा विवाद की स्थिति लम्बे समय से चली आ रही है. ये बात 1816 की थी जब ब्रिटिश राज और नेपाल के बीच सागौली की एक संधि हुई जिसमें तय किया गया कि भारत और नेपाल के बीच पश्चिमी सीमाओं को काली नदी के द्वारा निर्धारित किया जाएगा. कालापानी काली नदी के पूर्वी किनारे पर है जबकि भारत और तिब्बत के बीच व्यापार का रास्ता और धार्मिक पर्यटन का रास्ता काली नदी के पश्चिमी किनारे पर है. कालापानी का ये छोटा सा इलाका जिसे भारत अपनी सीमा में बताता है नेपाल उस पर अपनी दावेदारी पेश करता है. नेपाल का कहना है कि महाकाली का उद्गम लिपुलेख पास की उत्तरी सीमा से होता हैं जहां से होकर ये नदी कालापानी में मिलती है. नेपाल इस बात की शिकायत करता रहा है की 1962 के भारत चीन युद्ध के समय नेपाल ने भारतीय सेना को अपनी सीमा के कुछ इलाकों में अधिपत्य जमाने की हिदायत दे दी थी.  जिनमें से सभी को भारत ने अब वापस कर दिया है. लेकिन कालापानी की पोस्ट पर अपने कब्जे को भारत ने अभी तक नहीं छोड़ा है. 

 नेपाल के इस तर्क के हिसाब से इस वक्त हम जिस जगह पर खड़े थे उसे नेपाल की सीमा में होना चाहिए था लेकिन भारत अभी इस हिस्से को भारत अपना ही हिस्सा बताता है. कालापानी के इस सियासी रहस्य को वहीं पीछे छोड़ हमें आगे बढ़ जाना था. यहां से फिर एक पैदल यात्रा हमें तय करनी थी. बहुत धीरे-धीरे हमें ऊपर की तरफ बढ़ना था. 

 

कालापानी की चौकी के पास केएमवीएन के गेस्ट हाउस में नाश्ता ख़त्म हो चुका था लेकिन कोर्नफ्लेक्स और दूध हमें उपलब्ध करा दिया गया. वहां हमारी मुलाक़ात गढ़वाल मंडल के कमिश्नर सी एस नपलच्याल से हुई. वो अपनी पत्नी और लड़की के साथ यात्रा कर रहे थे. बातों-बातों में पता चला कि वो भी हमारी ही तरह घुमक्कड़ी के शौक़ीन हैं. कभी अकेले तो कभी परिवार के साथ घूमने निकल जाया करते हैं. जिस अधिकारी के अन्दर कई डीएम काम करते हों आमतौर पर वो अपनी धमक दिखाने से नहीं चूकता पर नपलच्याल जी में एक सादगी थी जो आकर्षित करती थी. उन्हें भी नाभिडांग जाना था. फिर मिलने का वादा कर उन्होंने विदा ली.   

 

कुछ देर में सड़क-सड़क हम भी आगे बढ़ गए. खच्चरों और भेड़ों के झुण्ड लगातार हमारे आगे-पीछे चलते चले जाते. यहां पहली बार हमें झुपू नाम के उस पशु से भी मिलने का मौका मिला जो दरअसल याक और गाय का क्रोस होता है. एक ओर से झुपु एक झुण्ड में आ रहे थे और दूसरी तरफ से सैकड़ों भेड़ों का एक झुंड उनके विपरीत जा रहा था.

 हवा में एकदम चीरती हुई सी ठण्ड थी अब.  कच्ची सड़क पर कहीं कोई झरना चला आता तो कहीं ग्लेशियर. नाभिडांग से करीब तीन किलोमीटर पहले ओम पर्वत के आस पास की श्रृंखलाएं दिखाई देनी शुरू हो गई थी. इस वक्त हम एक खूबसूरत बुग्याल के पास थे. इस बुग्यालों के इर्द-गिर्द घोड़ों पर यात्रियों को लाते, ले जाते लोगों की आवाजाही बनी हुई थी. चाय और कुछ खाने की दरकार अब महसूस हो रही थी. हम किसी ढाबे के इंतज़ार में थे. 


नाभीडाँग में पहले कदम 

नाभीडांग पहुंचने से ठीक पहले अच्छी-खासी चढ़ाई थी. सांस लेने में हल्की सी परेशानी भी होने लगी थी. हम करीब तीन हज़ार मीटर की ऊंचाई पर थे. यहां ऑक्सीजन की कमी होना स्वाभाविक था. नाभीडांग में केएमवीएनके गेस्ट हाउस के करीब आधा किलोमीटर पहले हमें चाय की एक दुकान मिली तो हमने मौका नहीं छोड़ा. हालाकि इस वक्त हमें ये नहीं पता था कि हमारा आज का पड़ाव बस आधा किलोमीटर आगे ही है. हमारे यहां पहुचते ही बारिश होने लगी. ये कुछ तेज़ बारिश थी. तेज़ ठण्ड थी, बाहर बारिश थी, और हमारे हाथों में चाय. आस पास बर्फ से घिरे पहाड़ थे. 

  चाय पीकर बारिश जब कम हो गई तो हम गेस्ट हाउस की तरफ बढ़ गए. आईटीबीपी की एक चेकपोस्ट पर अपना इनरलाइन पास दिखाकर हम आगे बढे. केएमवीएन के गेस्ट हाउस में एक सुन्दर कमरा हमें दे दिया गया. यहां भी उसी तरह के बंकर थे जैसे रास्ते भर में बने थे. बंकर के भीतर और बाहर के तापमान में ख़ासा अंतर था. 

 

 हमें चारपाई वाला बंकर मिला था. शीशे के बाहर से अच्छी-खासी रोशनी इस साफ़ सुथरे बिस्तर पर पड़ रही थी. हमने अपने-अपने बैग उतारे और जूते खोलकर रजाइयों में दुबक गए. थके हुए शरीर को राहत मिल ही रही थी कि चाय भी आ गई. सोने पे सुहागा. चाय पीकर कुछ देर हमने आराम किया. 

 मोहन भाई और रोहित सो रहे थे. मुझे दिन में नींद कम आती. मैं करीब घंटे भर बाद बंकर के बाहर गया. वहां कमिश्नर साहब खड़े थे. पर्वत अभी कोहरे से ढंका था. हम उसके खुलने का इंतज़ार कर रहे थे. उनके साथ कुछ देर बातें होती रही. बातों-बातों में नपलच्याल जी की पत्नी ने ओम पर्वत से लगे उस पहाड़ की ओर इशारा किया. 

“देखो तो वो एक सिपाही की तरह नी लग रा ?”

वो बहुत उत्साहित लग रही थी. नपलच्याल जी ने उनकी उंगली के इशारे की तरफ नज़र दौड़ाई. 

“अरे हां ये तो एकदम सिपाही लगता है.. देखो तो जरा”

उन्होंने मुझे भी इशारे से दिखाने की कोशिश की. 

 

सचमुच. पहाड़ पर बर्फ और पथरीली काली चट्टान की जुगलबंदी ने एक सिपाही की संरचना बना दी थी. मुझे उस सिपाही में हिटलर के भेष में चार्ली चेपलिन नज़र आने लगा. मैंने उत्साहित होकर प्रकृति के बनाए इस बेहद खूबसूरत स्केच को  अपने कैमरे में उतार लिया. 

 इतने में  एक पतला सा आदमी हाथ में ट्रे लिए हमारे पास आया 

“साहब सूप ले लीजिए” 

ठण्ड इतनी थी कि कुछ भी गर्म पीना इस वक्त तोहफे की तरह लग रहा था. हमने सूप पिया.खूब सारी काली मिर्च ने शरीर में अन्दर तक गर्मी पंहुचा दी. 

“अन्दर भी दे देना.. दो लोग हैं” 

मैंने उस आदमी से आग्रह किया. 

“बस अभी लाया साब”

ये कहकर वो आदमी मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया. 

कुछ देर में मैं अन्दर गया. मैंने रोहित और मोहन भाई को जगाया और वो तस्वीर दिखाई जो बस अभी अभी खींची थी. 

“ये तो स्टॅलिन है” 

दोनों लगभग एक साथ चहके. 

वाकइ ये शक्ल स्टालिन से ज़्यादा मिलती थी. ओम पर्वत से पहले हमें स्टालिन के दर्शन हो गए थे. वो भागकर बाहर आये और अपने सामने प्रकृति के रचे इस स्केच को देखकर खुश हो गए. रोहित एक स्केच आर्टिस्ट भी है इसलिए वो ज्यादा उत्साहित था. 

कुछ देर में फिर वही आदमी दिखाई दिया जिसने हमें सूप पिलाया था और जो रोहित और मोहन भाई को सूप देना भूल गया था. हमने छेड़ने के लिहाज से पूछा

“भाई सूप नहीं दिया तुमने अन्दर ?”

वो पतला सा आदमी लहराते हुए और चहकर बोला 

“अरे साब.. सूप का क्या है.. सूप दो दिल में होना चाहिए”

सूप तो दिल में होना चाहिए ? ये सुनकर हम सब खिलखिलाकर हंस दिए. उस हंसमुख से आदमी को एक बार फिर देखा. खुशमिजाजी उसके चेहरे से टपक रही थी. वो उन लोगों में था जिनकी गलतियों का आपको उतना बुरा नहीं लगता. उनमें कुछ तो होता है जिसके लिए आप बहुत कुछ नज़रंदाज़ कर देते हैं. 


ओम पर्वत का नज़ारा 

   करीब तीन बज रहा था. ओम पर्वत से अब बादल छंटने लगे थे. क़रीब 20312 फ़ीट की ऊंचाई वाली ओम पर्वत की चोटी ठीक हमारे सामने थी. पहाड़ पर स्पष्ट तरीके से ओम शब्द नुमाया हो रहा था. हांलाकि ओम का ऊपरी हिस्सा अभी भी कोहरे की ओट में था लेकिन इतनी दूर से ओम पर्वत के दर्शन करने आये भक्त लोग अति उत्साहित थे. धीरे-धीरे अपने बंकरों के बाहर उनका जमावड़ा लगने लगा. कुछ लोग हाथ जोड़कर खड़े हो गए. कुछ भोलेनाथ के भजन गाने लगे. और हम अपना कैमरा ताने खड़े हो गये. 

 

हमारा भरोसा पूजने में नहीं था. हमारा आकर्षण उस खूबसूरती के लिए था जो प्रकृति हमारे जीवन के इर्द-गिर्द बिखेर देती है हमारी नज़रों के समेटने के लिए. हमें उस ओम में भगवान की लीला नहीं लेकिन प्रकृति का रहस्य दिखाई दे रहा था. वो रहस्य जिसके पीछे की वजह प्रकृति की भौगोलिक गतिविधियां थी. 

 हालाकि एक यहां पहुचने वाले लोगों का बड़ा हिस्सा भगवान के उपासकों का ही था.  इन कुछ दिनों में हमारी ज़िंदगी से हाई-हेलो कहीं गायब हो गया था. रास्ते में मिला हर अजनबी हमें देखकर मुस्कुराता और पूरे भक्तिभाव से बोलता “जय भोले” या फिर सिर्फ  “भोले”.

 तो यहां सबकी बातचीत का सिरा “भोले” से शुरू होता और उनकी मंजिल भोले के उन अजूबों पे पूरी होती जिसे वो आदि कैलास और ओम पर्वत कहते.  वो अपनी आस्था के सहारे यहां चले आये थे. उनके लिए हर कोई आस्तिक था. आस्तिक हम भी थे पर हमारी आस्था प्रकृति के उस सोंदर्य पर थी जो अद्भुत था. 

  इस अद्भुत प्राकृतिक नज़ारे को कैमरे में उतारने और कुछ देर निहारने के बाद हमने सोचा कि अब आस-पास का इलाका भी देख लिया जाय. बंकर के सामने से एक पगडंडी गुज़र रही थी. कुछ देर पहले मिले कमिश्नर साहब ने बताया था कि पास ही कोई हेलिकॉप्टर क्रेश हुआ था. यही कोई दस साल पहले. वो टूटा-फूटा हेलिकॉप्टर अब भी वहीं पड़ा है. हम उसकी तलाश में निकल पड़े. पगडंडी पर कुछ देर चलने के बाद हमें वो हेलीकॉप्टर नज़र आ गया. हम एकदम पास तक गए. चारों ओर चट्टानों के टूटे हुए पत्थर थे और उनके बीच में एक हेलिकॉप्टर के परखच्चे जो धीरे-धीरे अपने रंग खो रहा था. 

 

बताया जाता है कि आईटीबीपी के कोई अधिकारी इस हेलिकॉप्टर से पूरे दल बल के साथ यहां आ रहे थे. कोई तकनीकी खराबी आयी और हेलिकॉप्टर संतुलन खोने लगा. पायलट ने बचाने की तमाम कोशिशें की और वो उसे इस घाटी में ले आया. हेलिकॉप्टर ज़मीन से टकराया ज़रूर पर इस हादसे में किसी की भी मौत नहीं हुई. तबसे ये यहां एक दर्शनीय स्थल बन गया. और इसे यहां से आज तक नहीं हटाया गया. उस के इर्द-गिर्द कुछ तस्वीरें खींचकर हम वापस बंकर में लौट आये. 

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उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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