ट्रैवलॉगपश्चिम बंगाल

दार्जिलिंग मेरे बचपन का स्विट्ज़रलैंड है : भाग-2

(Last Updated On: November 19, 2018)

प्रतीक्षा रम्या कोलकाता में रहती हैं. पत्रकारिता की छात्रा रही हैं. उन्होंने कोलकाता से दार्जिलिंग की अपनी यात्रा की कहानी विस्तार से हमें लिख भेजी है. आज पेश है इस यात्रा वृत्तांत का दूसरा भाग. पहला भाग ये रहा.

अगले दिन सुबह 9 बजे निकलने का प्लान था क्यूंकि हमें 10.10 की टॉय ट्रेन पकड़नी थी। टॉय ट्रेन की एडवांस टिकट बुक करानी होती है, जो आप आईआरसीटीसी के साईट से करा सकते हैं। बचपन से टॉय ट्रेन ही मेरे लिए दार्जिलिंग का पर्याय रहा है। जब किताबों में चाय के बागानों के बीच से गुज़रते खिलौने की तरह दिखने वाले ट्रेन को देखती थी तो बस यही सोच पाती थी कि ये परियों का देश है जिसे मैं सिर्फ क़िताब के पन्नों में देख सकती हूं। पर जब थोड़ी सी बड़ी हुई तो समझ आया कि ये परियों के देश जैसी जगह हमारे देश में ही है।

पर स्टेशन के लिए निकलने से पहले जो पहाड़ों की सुबह मैंने देखी अगर उसके बारे में नहीं लिखूंगी तो ये यात्रा संस्मरण अधूरा रह जाएगा। जब आँखें खुलीं तो कमरे से लगे छोटी सी बालकनी के बाहर का नज़ारा स्वर्ग के सूर्योदय जैसा था। बादल ख़ुद पहाड़ों को नींद से जगाने आये थे।

 काश वो वक़्त वहीँ थम जाता। बालकनी की जिस कुर्सी पर बैठकर मैं ये दृश्य देख रही थी – काश ज़िन्दगी का वो लम्हा फ्रीज़ हो जाता और मै तमाम उम्र बस इसी सुबह को देखती रह जाती। पर ख़ैर टॉय ट्रेन पकड़नी थी इसलिए मैंने फटाफट अपना कैमरा निकाला और इस सुबह को क़ैद कर लिया। ताकि जब इस शहर से दूर मेरी नींद खुले तो सबसे पहले अपने मोबाइल के स्क्रीनसेवर पर मैं इस सुबह को देख सकूँ ।और फ़िर हर दिन बस इसी प्रयास और इंतज़ार में गुज़रे कि एक बार फ़िर से अपनी आत्मा का एक हिस्सा मुझे किसी पहाड़ को सौंपने जाना है।

स्टेशन होटल से नज़दीक था इसलिए हमने पैदल ही घूमते टहलते वहां चले गए। अगस्त के महीने में जब पसीने और गर्मी से हालत ख़राब होती है ,उस वक़्त मैं देश के एक ऐसे कोने में थी जहाँ ठंड की गुलाबी सुबह खिली हुई थी। दार्जीलिंग रेलवे को यूनेस्को द्वारा भारत के पर्वतीय रेल के रूप में विश्व धरोहर स्थल  में सूचीबद्ध किया गया है। 

सड़क के किनारे बसे छोटे से दार्जीलिंग स्टेशन को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे आँखों के सामने ब्रिटश भारत का समय आकर खड़ा हो गया हो। वहां की हवाओं में इतिहास वर्तमान की तरह घुला हुआ था। जितनी ऊंचाई और घुमावदार जगह पर ट्रेन की पटरियां बिछाई गयी हैं वो ब्रिटिश काल के इंजीनियरिंग की उत्कृष्ट कला और कौशल का परिचय देती हैं।

पहाड़ों के बीच बसे दार्जीलिंग शहर को टॉय ट्रेन से देखते हुए मैं वापस अपने बचपन में चली गयी थी। मुझे मेरे बचपन की क़िताब में टॉय ट्रेन की खिड़की से झांकती मुस्कुराती और चहकती लड़की मिल गयी थी। वो मैं ही तो थी। मेरा सपना यथार्थ में तब्दील हो चुका था।दार्जीलिंग स्टेशन से घूम स्टेशन तक़ का टॉय ट्रेन का सफ़र दो घंटे का होता है। बीच में ट्रेन दो जगह रूकती है – पहले बतासिया लूप और दूसरा घूम स्टेशन।

थोड़ी देर बाद ट्रेन बतासिया लूप पर आकर रुकी।ये एक बेहद खूबसूरत जगह है- चारों तरफ़ से पेड़ पौधे और चाय के बागानों से घिरा 50,000 स्क्वायर फ़ीट का बागीचा और बागीचे के बीचो बिच गोरखा सैनिकों के सम्मान में बनाया गया एक वॉर मेमोरियल।

ये जगह काफी ऊंचाई पर है और यहाँ बैठने के लिए जगह जगह शेड बनाये गए हैं। उन शेड में खड़े होकर जहाँ तक मेरी नज़र जा रही थी,दूर-दूर तक सिर्फ हरियाली दिख रही थी। हर तरफ वादियां। शायद मज़रूह सुल्तानपुरी जी ने-‘वादियां मेरा दामन,रास्ते मेरी बाहें, जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे’ गीत किसी ऐसे ही दृश्य को देखकर लिखा होगा। प्रकृति अपना संगीत पूरे मन से गा रही थी। उस वक़्त ये गीत सिर्फ़ मेरे लिए ही था।मैं उन वादियों की मेहबूबा ही तो थी जो सब कुछ छोड़ कर उनकी बाँहों में हमेशा के लिए समा जाना चाहती थी।

 

जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था उसके लिए मेरे कैमरे का वाइड एंगल लेंस भी कम पड़ चुका था। उस नज़ारे को सिर्फ आत्मा के विस्तृत लेंस में कैद किया जा सकता था। ठण्ड की गुलाबी सुबह में ये शहर ताज़े गुलाब सा खिलखिला रहा था। पेड़ों की ओट से सामने के दृश्य को कैमरे में क़ैद करते समय मुझे ऐसा अहसास हुआ जैसे मैं राधा और ये शहर मेरा कृष्ण।

ट्रेन वहां कुछ 10 से 15 मिनट के लिए रुकी और फ़िर आगे घूम स्टेशन के लिए निकल पड़ी। घूम रेलवे स्टेशन भारत का सबसे ऊँचा रेलवे स्टेशन है और विश्व रैंकिंग में ऊंचाई के मापदंड के अनुसार चौदहवें नंबर पर आता है। रेलवे स्टेशन के पास ही घूम संग्रहालय है, जहाँ दार्जीलिंग के रेलवे इतिहास के विषय में चित्रों के साथ विस्तार से विवरण दिया गया है। घूम में संग्रहालय के अलावा आप  घूम मोनेस्ट्री भी घूमने जा सकते हैं, पर तब जब आप वहां टॉय ट्रेन से न गए हों,या वहां से वापस आने के लिए टॉय ट्रेन न लें। क्यूंकि घूम स्टेशन पर टॉय ट्रेन कुछ ही समय के लिए रूकती है और वापस दार्जीलिंग स्टेशन आ जाती है।

टॉय ट्रेन का हमारा दो घंटे का सफ़र पूरा हो चुका था और हमने दार्जीलिंग स्टेशन के बाहर से पीस पगोडा और रॉक गार्डन जाने के लिए टूरिस्ट गाडी पकड़ी।

पीस पगोडा को विश्व शांति स्तूप के नाम से भी जाना जाता है। बाकि शांति स्तूपों की तरह इस पीस पगोडा की स्थापना भी जापानी बौद्ध के निपोप्जंन मयहोजी संप्रदाय ने करवाया है। ये स्तूप शांति का प्रतीक है।

 

ये कोई कहने की बात नहीं है कि जहाँ बुद्ध की उपस्थिति होती है,वहां के वातावरण और हवाओं में आत्मा को पवित्र करने वाली शुद्धता घुली होती है। मैं बुद्ध से जुड़े जिस भी स्थान पर जाती हूँ, चुपचाप खड़ी होकर एकटक उनके शांत चेहरे को निहारती रहती हूँ। आँखों के सामने होती तो बुद्ध की प्रतिमा है, पर ये उनका दैवीय तेज़ ही है जिसकी वजह से हर पल ये एहसास होता है जैसे भगवान ख़ुद मेरी आँखों के सामने बैठे हैं।

दार्जीलिंग के पीस पगोडा में बुद्ध के चार अवतारों की पूजा की जाती है। इन चार अवतारों में से एक अवतार मैत्रेय बुद्धा का है। बौद्ध धर्म की मान्यताओं के अनुसार बुद्ध के इस अवतार का अभी तक जन्म नहीं हुआ है। बौद्ध समुदाय का मानना है कि भविष्य में मैत्रेय बुद्ध का जन्म होगा और वो पूरे विश्व में शांति, प्रेम और सौहार्द का प्रचार प्रसार करेंगे।

पीस पगोडा के बाद हम रॉक गार्डन के लिए निकल गए। प्राकृतिक झरने ( chunnu summer fall) के चारों तरफ़ चट्टानों को काट कर इस जगह को एक बेहद ख़ूबसूरत पिकनिक स्पॉट में तब्दील किया गया है। रॉक गार्डन दार्जीलिंग शहर से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर है। काफ़ी ऊंचाई से इस जगह को देखना अपने आप में एक बेहद रोमांचकारी अनुभव था।

रॉक गार्डन से वापस शहर की तऱफ लौटते समय जो दृश्य मेरी आँखों के सामने था उसे देख कर मैं सिर्फ एक ही बात महसूस कर पायी थी कि ज़िन्दगी न मिलेगी दुबारा। शीशे सा चमकता नीला आसमान और उसके बीचों बीच गुलमोहर के फूल सा खिला सूरज, एक तरफ़ लहलहाते खेत और दूसरी ओर गहरी घाटी। उस खिली धूप में काफ़ी नीचे तक घाटी में बसे घर ऐसे दिख रहे थे जैसे साफ़ पानी के अंदर मछलियां दिखती हैं। गाड़ी अपनी पूरी रफ़्तार से शहर की ओर बढ़ रही थी। रास्ते में कहीं जब सर पर बड़ी बड़ी टोकड़ियाँ लटकाये चाय के बागान की तरफ़ जाती औरतें दिख जातीं तो मेरा बचपन फ़िर से खिलखिला  उठता था। बचपन से मैं इन्ही को तो अपनी आँखों के सामने ,बहुत क़रीब से देखना चाहती थी।

पहले दिन का ट्रिप इसी के साथ खत्म हुआ और हम थके हारे होटल के कमरे में पहुंचे। अगले दिन सुबह 9 बजे ही निकलना था। उस दिन रात को ठंड हल्की सी बढ़ गयी थी। हम नॉन वेज खाने वालों के साथ ये सबसे बड़ा टर्म एंड कंडीशन होता है कि कहीं खाओ या न पर ट्रिप पर तो नॉन वेज ही खाना है। तो बस हमने चिकन सूप और हल्का सा एक नॉन वेज स्नैक्स मंगाया और खा कर सो गए।

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