उत्तराखंड मध्यमहेश्वर मंदिर की ट्रेकिंग का यात्रा वृत्तांत
मध्यमहेश्वर उत्तराखंड की एक लोकप्रिय ट्रैकिंग डेस्टिनेशन है (Madhyamaheshwar temple trek) जो धार्मिक रूप से भी महत्वपूर्ण है. यात्राकार के लिए हमें अपनी मध्यमहेश्वर यात्रा का यह वृत्तांत 
मध्यमहेश्वर यात्रा की योजना (Madhyamaheshwar temple trek planning)
चौमास अपनी प्रारंभिक सीढ़ी चढ़ रहा था। मेरी शोध–रूपरेखा जमा करने की तारीख नजदीक आ रही थी। तभी मुझे कुछ निजी कारणों से अपनी शोध–रूपरेखा को बदलना पड़ा। तारीख नजदीक होने के कारण मेरा चिंतित होना स्वाभाविक था। यहीं से शुरू होती है मेरे इस ट्रेक की योजना, जो उस समय मेरे लिए महज़ एक ट्रेक था।
कौतूहलवश मैंने अपने एक मित्र पंकज को फोन किया। कुशल–क्षेम जानने और थोड़ी इधर–उधर की बातें करने के बाद उससे संचालित होने वाले आगामी ट्रेक की जानकारी लेने लगा, तो उसने मुझे एक तय तारीख का सुझाव दिया जो मेरे लिए संभव नहीं थी। इसलिए उसने जल्द ही एक नई तारीख तय करके फोन करने का वादा किया, और मैं अपनी शोध–रूपरेखा तैयार करते हुए अपनी दुनिया में खो गया।
पंकज आर. एस. ग्रुप उत्तराखंड का संचालक है, जिसे पंकज सिंह बिष्ट, सागर देवराड़ी एवं ऋषभ जोशी ने स्थापित किया था। इस ग्रुप के माध्यम से वर्तमान में इसी प्रकार के अनेकों ट्रेक संचालित किए जाते हैं। इन्हीं में से एक ट्रेक यह भी था, जो पंकज द्वारा मुझे सुझाया गया था।
लगभग दो सप्ताह बाद पंकज ने मुझे फोन किया और मुझे 7 जुलाई 2026 की नई तिथि का सुझाव दिया, जो मेरे लिए अनुकूल थी। इसलिए मैंने अपने कुछ अन्य दोस्तों को फोन किया तो लगभग सभी का एक ही जवाब था – नहीं। अब मैं इस ट्रेक के लिए और भी अधिक उत्साहित था, क्योंकि यह मेरे लिए एक सोलो ट्रेक होने वाला था।
हालांकि यह ट्रेक आर. एस. ग्रुप उत्तराखंड के ही संचालक पंकज और सागर के नेतृत्व में होना था, फिर भी मैं मानसिक रूप से इस ट्रेक को सोलो करने के लिए तैयार हो गया था, जिसका एक मुख्य कारण यह भी था कि उन्हें अन्य यात्रियों का भी ध्यान देना होता था।
समय धीरे–धीरे निकल रहा था और इसी बीच मैंने अपनी शोध–रूपरेखा भी जमा कर दी थी, और वह तय तारीख आ गई जब हमें नैनीताल से ट्रेक के लिए निकलना था। 7 जुलाई को सुबह से ही मेरी तबीयत में थोड़ी गिरावट थी, तो मैंने अपना बैग पैक नहीं किया था। दिन में 12 बजे मैं उठा और सामान समेट कर अपना बैग भरना शुरू कर दिया। लगभग 3 बजे खाना खाकर मैं अपने डॉक्टर के पास गया और कुछ आवश्यक दवाइयाँ लेकर तल्लीताल की ओर चल दिया।
शाम 6 बजे हम नैनीताल से हल्द्वानी की ओर चल पड़े, जहाँ से हमारी ऋषिकेश की बस थी। इस ट्रेक में पंकज और सागर नेतृत्वकर्ता के रूप में हमारे साथ थे और उनकी एक बहन समृद्धि / सैम एवं कुछ अन्य यात्री भी हमारे साथ थे। सैम बातूनी थी, इसलिए मैं उससे जल्दी घुल–मिल गया। शायद मेरी छोटी बहन होती तो वह भी उसी की तरह होती। दूसरे दिन प्रातः हम लोग ऋषिकेश पहुँच चुके थे, जहाँ पंकज ने पहले से ही हमारे रुकने की व्यवस्था की थी।
दिन भर आराम करने के बाद हम शाम को सभी लोग तपोवन के साईं घाट पर आरती के लिए गए, जो हमेशा से मेरे लिए एक पसंदीदा घाट रहा है क्योंकि यहाँ सुकून और धार्मिक ऊर्जा का वास है। इस घाट के पसंदीदा होने का एक कारण यहाँ मिलने वाली चाय और पनीर मोमो भी हैं। तत्पश्चात हम लोगों ने शाम का भोजन किया और अगले दिन की तैयारी करके सो गए, क्योंकि यहाँ से आरंभ होने वाली थी हमारी पंचकेदारों में से द्वितीय केदार श्री मध्यमहेश्वर जी की यात्रा।
मध्यमहेश्वर का महत्व (Importance of Madhyamaheshwar temple trek)
मध्यमहेश्वर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद में स्थित पंचकेदारों में द्वितीय केदार के रूप में प्रसिद्ध एक महत्वपूर्ण हिमालयी तीर्थस्थल है। समुद्र तल से लगभग 3,289 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर चौखम्बा पर्वत श्रृंखला, घने वनों, हिमालयी बुग्यालों तथा समृद्ध जैव–विविधता से घिरा हुआ है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध के उपरान्त भगवान शिव के वृषभ–रूप के मध्य भाग अथवा नाभि की पूजा यहाँ की जाती है। मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर ऊपर स्थित वृद्ध मध्यमहेश्वर (बूढ़ा मध्यमहेश्वर) धार्मिक एवं प्राकृतिक दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ से चौखम्बा पर्वत, मंदाकिनी घाटी तथा हिमालयी परिदृश्य का अत्यन्त मनोरम दृश्य दिखाई देता है।
हिमालयी तीर्थ परम्परा में ये दोनों स्थल धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक साधना तथा प्रकृति के मध्य गहरे अन्तर्संबन्ध को प्रदर्शित करते हैं (सती, 2023)।
मध्यमहेश्वर यात्रा की शुरुआत
9 जुलाई को प्रातः हम लोग कुछ अन्य यात्रियों के साथ तपोवन, ऋषिकेश से गंगा नदी के किनारे–किनारे निकल चुके थे। हल्की रिमझिम बारिश के साथ कहीं–कहीं पर ऊपर से सड़क पर पत्थर भी गिर रहे थे, जो कि डर का थोड़ा–बहुत कारण था। थोड़ी देर बाद हम लोग कौड़ियाला पहुँचे, जहाँ सभी ने नाश्ता किया। इसके बाद हम वहाँ से आगे की ओर चल दिए तथा देवप्रयाग (भागीरथी एवं अलकनंदा का संगम स्थल) पर एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ उतरे।
देवप्रयाग में उत्तर भारत का एकमात्र द्रविड़ शैली का रघुनाथ मंदिर स्थित है। देवप्रयाग से आगे हम अलकनंदा नदी के किनारे चलते रहे तथा उत्तराखंड का एक ऐतिहासिक शहर श्रीनगर को पीछे छोड़ आए थे। श्रीनगर के बाद धारीदेवी से पहले हमें लगभग 2 घंटे का जाम मिला, जो आगे सड़क टूट जाने की वजह से लगा हुआ था।
लगभग दो–तीन घंटे कछुए की चाल में चलते रहने पर हम लोगों ने अपना यातायात अवरोध सकुशल पार कर लिया तथा रुद्रप्रयाग (अलकनंदा एवं मंदाकिनी का संगम) को पीछे छोड़ते हुए अगस्त्यमुनि पहुँचे, जहाँ सभी ने खाना खाया और आगे की ओर बढ़ चले। यहाँ से आगे बढ़ते हुए बीच में कुछ छोटे–बड़े कस्बे फिर ऊखीमठ को पीछे छोड़ते हुए शाम को लगभग 7:00 बजे के बाद हम लोग रांसी गाँव पहुँचे थे, जहाँ से हमें अपनी गाड़ी को छोड़कर 6 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी थी। इस यात्रा में समतल, उतार–चढ़ाव लगभग समान था।
रांसी गाँव से आगे बढ़ते हुए हल्का–सा अँधेरा हो गया था और रिमझिम बारिश हो रही थी। इसी बारिश में हम लोगों ने सामान उठाया और मंजिल की ओर बढ़ चले। यहाँ से आगे बढ़ते हुए हम देखते हैं कि यहाँ सड़क निर्माण का कार्य चल रहा था, जिसके कारण ऊपर से भूस्खलन का खतरा लगातार बना हुआ था। थोड़ा आगे चलकर हमें एक संकरी पगडंडी से लगभग 500 मीटर नीचे उतरना था, जो कि थोड़ा चुनौतीपूर्ण था।
इस चुनौती को पार करते हुए हमने मधुगंगा नदी पार की और गौंडार गाँव पहुँचे, तब तक लगभग रात के 9:00 बज चुके थे। इसके पश्चात हम कुछ और चलकर बन्तोली गाँव पहुँचे, जहाँ हमारे रात्रि विश्राम की व्यवस्था पंकज और सागर द्वारा पहले ही की गई थी।
यहाँ हम लोग एक होमस्टे में रुके, जिसे एक पति–पत्नी द्वारा संचालित किया जाता था। हमने अपना सामान अपने कमरों में रखकर थोड़ा व्यायाम कर शरीर को आराम देने की कोशिश की। फिर हम लोग खाना खाने बैठे तो बातों–बातों में पता चला कि जितनी भी सब्जियाँ एवं दालें यहाँ बनी हुई हैं, वो सब सब्जियाँ और दालें इन्हीं के द्वारा अपने खेतों में उगाई जाती हैं।
इन लोगों के आतिथ्य सत्कार और खाना खाकर मानो सारी थकान एक पल में उतर गई। वो हल्के मसालों में तले आलू के गुटके, भात, राजमा की दाल, रोटी एवं थोड़ा–सा अनुरोध करने पर मिला घर में बना हुआ शुद्ध घी, जिसके साथ उन्होंने परोसा अपना आतिथ्य सत्कार, मेरी कल्पना से परे था।
रांसी गाँव से आगे का सफ़र
दूसरे दिन प्रातः बारिश अधिक होने के कारण हमें अपना पूर्व निर्धारित ट्रेक के समय को थोड़ी देर के लिए स्थगित करना पड़ा, और जब बारिश थोड़ी कम हुई तो थोड़ा व्यायाम करके हम लोग निकल पड़े एक ऐसे ट्रेक पर जो भरा था रोमांच से और आध्यात्मिक ऊर्जा से। लगभग 2 किलोमीटर चलने के बाद हम लोग नाश्ता करने के लिए रुके, जहाँ वही आतिथ्य सत्कार और स्वाद से लबालब आलू के पराठे व चाय मिली।
फिर हम लोग निकल पड़े अपने आगे के ट्रेक में जो कि लगभग 8 किलोमीटर का था, जिसमें कुछ समतल और अत्यधिक भाग चढ़ाई का था। जैसे कि इस ट्रेक को मैं अकेले पार कर रहा था तो मैं अपने फोन में अपने पसंदीदा संगीत का आनंद लेते हुए आगे बढ़ने लगा, और यहीं से शुरू हुई मेरी मध्यमहेश्वर जी की यात्रा, जिसने मुझे इस कोलाहल भरी दुनिया से दूर प्रकृति के आँचल में खुद से खुद का परिचय कराया।
वैसे तो मैं दुनिया की नज़रों में अकेले आगे बढ़ रहा था परन्तु मेरे साथ एक ऐसी ऊर्जा चल रही थी जिससे मैं पिछली शाम का सारा भय, जो भूस्खलन से मेरे मन में था, कब पीछे छोड़ आया था इस बात से मैं अभी भी अनभिज्ञ था। और अचानक से मेरे मन में एक प्रश्न उठा – क्या मैं पुनः यहाँ वापस आ पाऊँगा?
हल्की बारिश हो रही थी और मैं आगे बढ़ता जा रहा था। एक छोटी–सी पगडंडी और दोनों तरफ हरी घास का ढलान, सामने की तरफ देखो तो घने जंगल, जिसमें कहीं–कहीं पर छोटे–छोटे बादल ऐसे लग रहे हो जैसे किसी ने रुई रखी हो, घने जंगलों के बीच में छोटे–छोटे झरने और नीचे एक गधेरा जिसमें मानो दूध बह रहा हो एकदम श्वेत प्रवाह।
यह सब मनोरम दृश्य आँखों में शीतलता और मन में शांति प्रदान कर रहे थे, जिनको मैं धीरे–धीरे पीछे छोड़ते जा रहा था और पीछे छोड़ रहा था उन यात्रियों को जो अपनी यात्रा को पूरी करके हर–हर महादेव व जय शिव शंभू की जयकार करते हुए एक धार्मिक ऊर्जा के साथ वापस जा रहे थे।
इसी के साथ हम लोग भी अब घने जंगल में प्रवेश कर चुके थे और मेरे साथ पंकज भी था। हम लोग अपनी दोस्ताना बातचीत के साथ–साथ आगे बढ़ रहे थे और आसपास के पेड़ों में लंगूर अपनी मस्ती में झूम रहे थे। सहसा मुझे एक आवाज सुनाई दी जो मुझे पहले भी सुनी हुई लगी, उस आवाज को मैं शीघ्र ही पहचान गया कि वह आवाज एक तेंदुए की थी। यद्यपि मैं बचपन में मम्मी के साथ लकड़ी लेने जंगल जाया करता था तो मुझे इसकी जानकारी थी।
जब मैंने यही बात पंकज को बोली तो उसने इससे इनकार कर दिया परन्तु पुनः वही आवाज आई तो वह भी मान गया। इसी वार्तालाप के साथ हम लोग आगे बढ़ते रहे और एक आबादी वाले क्षेत्र में पहुँचे जहाँ बीच में एक मंदिर था, जो श्री मध्यमहेश्वर मंदिर था जो हमें मानो अपनी तरफ बुला रहा हो।
यह सम्पूर्ण मार्ग गंगा नदी तंत्र, पर्वतीय ग्राम्य संस्कृति, सीढ़ीनुमा कृषि तथा हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है तथा ऐतिहासिक रूप से धार्मिक यात्राओं एवं सांस्कृतिक आदान–प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है (गिरि और दत्त, 2022)।
मध्यमहेश्वर से चौखम्बा पर्वत के दर्शन
मंदिर के एकदम सामने हमारे रुकने की व्यवस्था की गई थी जो हमारे लिए बहुत ही सौभाग्यपूर्ण था। वहाँ हम लोगों ने थोड़ा आराम किया, जिसके बाद हमें दिन के खाने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ भी एक शादीशुदा जोड़ा इस होमस्टे को संचालित करता था, ये मूल रूप से गौंडार गाँव के निवासी थे तथा जब तक मध्यमहेश्वर जी के कपाट खुले (मई से नवंबर) रहते हैं तब तक यहाँ यात्रियों की सेवा करते थे। एक बार पुनः वह खाना (राजमा की दाल, भात, आलू के गुटके) मेरी कल्पना से परे था।
शाम में हम लोग मंदिर में आरती के लिए पंक्तियों में खड़े हो गए। मन में प्रार्थना करते हुए, भजन गाते हुए हम लोग आगे बढ़ते जा रहे थे। मैं जितना आगे बढ़ रहा था उतना अधिक भाव विभोर हो रहा था। अंततः मैं हाथ जोड़े हुए मंदिर के अंदर था और इतना भाव विभोर हो चुका था कि अंदर गर्भगृह तक मेरी नज़र ही नहीं गई और मैं उसी मुद्रा में बाहर आ गया।
बाहर आकर मुझे इस बात का खेद था, मैंने फैसला किया कि मैं फिर से गर्भगृह के दर्शन करने जाऊँगा। जैसे ही मैं आगे बढ़ा तो मंदिर के एक कर्मचारी ने मुझे घुड़कते हुए बाद में आने को बोलकर वापस अपने स्थान पर भेज दिया। इसके बाद हमें सौभाग्य प्राप्त हुआ कि हम लोग प्रसाद पाने अंदर गए और प्रसाद के साथ गर्भगृह के दर्शन कर हम वापस आ गए।
हालांकि हमें दूसरे दिन वृद्ध मध्यमहेश्वर एवं चौखम्बा पर्वत के दर्शन के लिए प्रातः 3:30 बजे उठना था, तो हम लोग शाम को जल्दी खाना खाकर सो गए। प्रातः 3:30 बजे उठकर सभी लोग तैयार हुए और हम लोगों ने अपनी वृद्ध मध्यमहेश्वर की यात्रा प्रारंभ की और 2 किलोमीटर की हल्की चढ़ाई को पार कर पर्वत की चोटी पर पहुँचे, जहाँ गाय–बैल घास चर रहे थे।
कुछ समय तक वहाँ के नज़ारों का आनंद लेते हुए और सामने चौखम्बा पर्वत व अन्य पर्वत मालाएँ जो स्वयं के ऊपर बर्फ की चादर लपेटे खड़ी थीं, को निहारते हुए सभी यात्रियों के फोटोशूट के बाद हम नीचे उतर आए।
मध्यमहेश्वर से वापसी की राह
नीचे अपने होमस्टे में वापस आने के बाद पुनः एक बार मंदिर जाने का सौभाग्य मिला। इसके बाद हमने आलू के पराठे, अचार एवं चाय का नाश्ता किया और होमस्टे संचालक अंकल से बातें करने लगे तो उन्होंने बताया कि यहाँ घोड़ों द्वारा सामान ढोया जाता है जो एक बारी सामान लाने का 2500 से 3000 तक किराया लेते हैं। यह हम सभी के लिए हैरानी की बात थी। बातों–बातों में ही हम सभी का नाश्ता हो गया था और अब हमारे सामने हमारी वापसी की यात्रा थी।
एक स्थानीय व्यक्ति से बातचीत में उन्होंने बताया कि विगत दशकों में मध्यमहेश्वर क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन के विस्तार ने मध्यमहेश्वर क्षेत्र की स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा प्रदान की है। तीर्थस्थलों की बढ़ती लोकप्रियता ने परिवहन, आवास तथा अन्य पर्यटन सेवाओं के विकास को प्रोत्साहित किया है, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों का विस्तार हुआ है।
दिन में लगभग 12 बजे मंदिर व वहाँ के निवासियों को अलविदा बोलकर और मन में एक अजीब–सी कशमकश लेकर एवं नये यात्रियों का उत्साहवर्धन करते हुए नीचे उतरने लगे। दिन में लगभग 4 बजे से पहले होमस्टे पर पहुँच कर खाना खाया और फिर अपना बैग पैक कर आराम करने लगे। फिर हम लोगों ने अपना रात का खाना खाया और एक साथ बैठकर सभी लोग अपनी यात्रा का अनुभव साझा करने लगे।
अगले दिन प्रातः उठकर हम लोग तैयार हुए और पोहा, चाय और मैगी का नाश्ता किया। चूँकि मुझे मैगी थोड़ा चटपटी पसंद है, तो इस बार मैगी ने थोड़ा निराश ज़रूर किया, किंतु पोहा और चाय का स्वाद अप्रतिम था। इसके बाद हम रांसी गाँव के लिए निकले जहाँ हमारे वाहन चालक संजीव जी हमारा इंतजार कर रहे थे। अब हम उसी ट्रेक पर चल रहे थे जिसे पहले दिन हम लोगों ने अंधेरे में पार किया था पर आज इस ट्रेक में अलग आभास हो रहा था क्योंकि सामने हरे–भरे जंगल, झरने और छोटे–छोटे गाँव थे। इन सभी को पार करके हम पहुँचे रांसी गाँव, जहाँ से आगे ऋषिकेश तक अब हमें गाड़ी से सफर करना था।
धीमी धूप एवं धीमी संगीत की धुन के साथ हम रांसी गाँव से निकल चुके थे। थोड़ी दूरी तय करने के बाद अगस्त्यमुनि में उसी रेस्टोरेंट में खाना खाया जहाँ जाते समय खाया था। खाना खाने के बाद गाड़ी में बैठते ही सभी यात्री ऊर्जावान हो गए और तीव्र ध्वनि में संगीत का आनंद लेते हुए झूमने लगे। ये सब देखकर हमारे गाड़ी के चालक संजीव जी हैरानी से मुझसे बोलते हैं कि इन लोगों को अचानक से क्या हो गया? और फिर हम दोनों हँस पड़े। लगभग 2 घंटे जाम में रहने के बाद हम लोग कौड़ियाला पहुँचे तथा चाय–पानी का भोग लगाया। इसके पश्चात हमारी गाड़ी सीधे ऋषिकेश में रुकी।
शाम को लगभग 9:00 बजे हम लोग ऋषिकेश पहुँचे तथा अपने होटल गए। वहाँ सभी लोग फ्रेश होकर खाना खाने के लिए राजस्थानी ढाबा गए और यह फैसला हमारी पूरी यात्रा का सबसे बड़ा गलत फैसला था, क्योंकि वहाँ के खाने ने हम सभी को बहुत ज़्यादा निराश किया। यहाँ से निराश होकर हम लोग आदतन तपोवन साईं घाट चल दिए और एक–दो घंटे वहाँ बैठे रहे। इसके बाद हम वहाँ से लक्ष्मण झूला होते हुए बाजार घूमने लगे और कॉफी शॉप पर नज़र पड़ते ही सभी लोग रात के 1:00 बजे वहाँ घुस गए। सभी ने अपना पसंदीदा पेय पदार्थ ग्रहण किया, अपने होटल आ गए और सो गए।
दूसरे दिन मेरा पूरा समय आराम करने में ही निकल गया और शाम को हम फिर से साईं घाट चले गए। वहाँ के पनीर मोमो और चाय पीकर ऊपर को आ गए और खाना खाकर हम लोग नेपाली फार्म आ गए। जहाँ से हमारी हल्द्वानी के लिए बस थी, जिसने अगले दिन सुबह 5:30 बजे हल्द्वानी छोड़ दिया। यहाँ से हम नैनीताल के लिए गाड़ी में बैठे और नैनीताल पहुँच गए। नैनीताल में सभी को अलविदा करने के बाद मैं अपने कमरे में आ गया। परन्तु मेरे ज़हन में अभी भी वह शांति, हरे–भरे घने जंगल, झरने और वहाँ के लोगों का प्यार था, और था एक सवाल – क्या मैं पुनः यहाँ वापस आ पाऊँगा?
संदर्भ
सती, वी. पी. (2023). हिमालय की तीर्थयात्रा: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य एवं वर्तमान परिदृश्य। जर्नल ऑन टूरिज्म एंड सस्टेनेबिलिटी, 6(2), 39-48.
गिरि, एस. के. के., एवं दत्ता, डी. (2022). उत्तराखण्ड हिमालय के केदारनाथ क्षेत्र में तीर्थ पर्यटन: मार्ग, चुनौतियाँ एवं सतत विकास की संभावनाएँ। टूरिज़्म रिक्रिएशन रिसर्च
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