यूरोप की सबसे ऊंची चोटी युगफ़्राओ की यात्रा

यह 2018 में की गई मेरी यूरोप यात्रा के वृत्तांत हैं जो दैनिक भास्कर में सिलसिलेवार प्रकाशित हो रहे हैं. पूरी यूरोप यात्रा सीरीज़ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

सुबह-सुबह ज्यूरिख़ के अपने होटल से निकलते हुए दिल ज़ोरों से धड़क रहा था. हम यूरोप की सबसे ऊंची चोटी यानी युंगफ़्राओ के लिए निकल रहे थे.

बस से इंटरलेकन होते हुए हम ग्रिंडलवाल्ड ग्राउंड स्टेशन की ओर बढ़ गए. हरी-भरी स्विस पहाड़ियां जिन्हें अब तक फ़िल्मों में देखा था, आज हम उनके बीच से गुज़र रहे थे. बीच-बीच में लकड़ी के बने सुंदर नक्काशी वाले घर ऐसा अहसास दे रहे थे जैसे हम किसी पेंटिंग का हिस्सा हो गए हों.

ग्रिंडलवाल्ड के रेलवे स्टेशन से नज़र आते खूबसूरत ‘शैले’ ( फ़ोटो : उमेश पंत)

घुमावदार पहाड़ों से गुज़रती शानदार सड़क पर हरियाली का मज़ा लेते हुए क़रीब दो घंटे में हम ग्रिंडलवाल्ड आ गए. इस स्टेशन से आगे केवल ट्रेन से ही यात्रा की जा सकती है. हम ट्रेन में चढ़े और कुछ देर में ट्रेन हमें क्लैनशैडे स्टेशन पर ले आई.

यहां से हमने दूसरी ट्रेन ली जो हमें यूरोप के सबसे ऊंचाई पर बने रेलवे स्टेशन की तरफ़ ले जा रही थी. युंगफ़्राओ रेलवे के नाम से मशहूर यह एक कॉग व्हील ट्रेन थी. यानी एक ऐसी ट्रेन जो पटरी बने नुकीले खांचों की मदद से आगे बढ़ती है.

जैसे जैसे ट्रेन आगे बढ़ती है हरी-भरी चोटियों के पीछे से बर्फ़ीले पहाड़ झाँकने लगते हैं. (फ़ोटो : उमेश पंत)

पटरी पर धीरे-धीरे सरकती इस सुंदर ट्रेन से हरे-भरे ग्रिंडलवाल्ड की सुकून से सराबोर हरियाली दिखाई दे रही थी और उसके बीच एक बार फिर नज़र आ रहे थे लकड़ी के खूबसूरत स्विस अंदाज़ में बने घर. खास बनावट वाले इन घरों को ‘शैले’ कहा जाता है.

ट्रेन की खुली खिड़कियों से खिली-खिली सी धूप अंदर आ रही थी. ट्रेन हमें पहाड़ी पर लगातार ऊंचाई की तरफ़ ले जा रही थी. धीरे-धीरे बढ़ती ठंड में ये धूप शरीर को सहला रही थी जिसने सफ़र को और ख़ुशनुमा बना दिया.

फ़ोटो : उमेश पंत

थोड़ी देर में ट्रेन एक सुरंग के बीच से गुज़रने लगी. हैरानी की बात है कि 100 साल से भी ज़्यादा पुरानी इस रेलवे का ज़्यादातर हिस्सा दुरूह ऊंचाई पर बनी इन पहाड़ी सुरंगों से गुज़रता है. ये सुरंगें क़रीब 7 किलोमीटर लम्बी हैं.

इन अंधेरी सुरंगों से गुज़रती हुई ट्रेन बीच में दो जगहों पर रुकी. इनमें से एक जगह थी हाइगरबॉन्ड जहां से स्विस आल्प्स का नॉर्थ फ़ेस दिखता है. दूसरी थी हाईस्मियर जहां से आल्प्स का साउथ फ़ेस नज़र आता है. दोनों ही जगहों पर ‘पिक्चर विंडो’ बनी हुई थी. सुरंग के बीच पटरियों के किनारे प्लैटफ़ॉर्म बनाए गए थे. यहां मौजूद शीशे की इन खिड़कियों से बर्फ़ीली स्विस पहाड़ियों के खूबसूरत नज़ारे दिखाई दे रहे थे.

युंगफ़्राओ रेलवे के एक स्टॉप से स्विस आल्प्स के नज़ारे (फ़ोटो: उमेश पंत)

हवा में ठंडक अब काफ़ी बढ़ गई थी. यहां से इन नज़ारों का मज़ा लेने के लिए हमारे पास बस चार-पांच मिनट ही थे. इस बीच हमने कुछ तस्वीरें भी खींच लीं. कुछ देर में सीटी बजी और हम नियम के मुताबिक ट्रेन में लौट आए.

सुरंग के बीच हमें कुछ दिखाई तो नहीं दे रहा था लेकिन ट्रेन में लगी स्क्रीन पर यह जानकारी लगातार दिख रही थी कि हमने कितनी दूरी अभी और तय करनी है. कुल मिलाकर इस ट्रेन में घंटेभर के सफ़र के बाद हम युंगफ़्राओयाक स्टेशन पर थे. 

सुरंग से गुज़रती युंगफ़्राओ रेलवे (फ़ोटो : उमेश पंत)

यूरोप के इस सबसे ऊंचाई पर बने रेलवे स्टेशन पर स्विस आल्प्स के सबसे ख़ूबसूरत नज़ारे हमारा इंतज़ार कर रहे थे. ट्रेन से उतरने के बाद टिकिट लेकर हम पहाड़ों के अंदर बनी सुरंगों से एक बार फिर गुज़रे. लेकिन आगे हमें पैदल सफ़र करना था.

हज़ारों फ़ीट की ऊंचाई पर बर्फ़ की चट्टानों को काटकर बनाई गई इन सुरंगों में रंग-बिरंगे लाइट शो और स्लाइड शो थे. दीवारों पर युंगफ़्राओ रेलवे का इतिहास बताती पेंटिंग्स और तस्वीरें भी थी. यहां आने वाले सैलानियों की सुविधा के लिए मूविंग साइड वॉक भी यहां मौजूद थी. मतलब आप खड़े रहिए और दीवार पर बनी पेंटिंग देखते हुए आगे अपने-आप आगे बढ़ते रहिए.

युंगफ़्राओ याक स्टेशन के बाद सुरंगों में नज़र आते खूबसूरत लाइट शो (फ़ोटो : उमेश पंत)

चलते हुए अब हम आ गए थे मज़ेदार आइस पैलेस केव में. बर्फ़ की बनी इस गुफा के अंदर फ़िलसलन भरे रास्ते पर चलने में जितना डर लग रहा था उतना ही मज़ा भी आ रहा था. यहां बर्फ़ से बनी कई तरह की आकृतियों की नुमाइश भी थी. इस सर्द बर्फ़ीली सुरंग से हम जैसे ही बाहर निकले आंखें पहले चौधिया सी गई और फिर ठिठक कर सामने मौजूद अकल्पनीय से नज़ारे को निहारती रही. आख़िरकार अब हम उस जगह पर थे जिसे देखने के लिए हम आल्प्स की इन ऊंचाइयों पर आ गए थे. 

ग्लेशियर के नीचे बर्फ़ की सुरंग आइस पैलेस (फ़ोटो : उमेश पंत)

हम थे यूरोप की सबसे ऊंची चोटी पर और हमारे सामने था स्विस आल्प्स का सबसे ख़ूबसूरत नज़ारा. बर्फ़ से लकदक ऊंची चोटियां, दूर तक फैला बर्फ़ीला विस्तार और एकदम खुला नीला आसमान. ठंड अच्छी ख़ासी थी. यहां का औसत तापमान रहता है -7 डिग्री. यह लाज़मी भी था क्योंकि हम थे समुद्र तल से क़रीब चार हज़ार मीटर यानी लगभग 13600 फ़ीट की ऊंचाई पर. बर्फ़ीले मैदान के ऊपर स्विट्ज़रलैंड का झंडा लहरा रहा था जिसके साथ फ़ोटो खिंचाने के लिए दुनिया के हर कोने से आए लोगों की लाइन लगी हुई थी. यह वाकई एक ऐसी जगह थी जिसे आप अपनी यादों में हमेशा संजोये रखना चाहेंगे. 

यूरोप के टॉप पर स्विस झंडे के सामने फ़ोटो खिंचाने के लिए लाइन लगाए हुए पर्यटक (फ़ोटो : उमेश पंत)

यह जानकारी भी रोचक थी कि यहां इस ऊंचाई पर एक रिसर्च स्टेशन है, एक स्की स्कूल है और तीन रेस्टोरेंट हैं जिनमें से एक का नाम है बॉलीवुड रेस्टोरेंट. यहां के पर्यटन के विकास में हिंदी सिनेमा के योगदान को याद करने का शायद यह एक तरीक़ा हो. साथ ही, यूरोप का सबसे ऊंचा पोस्ट ऑफ़िस भी यहीं है.

यूरोप के टॉप से ग्लेशियर का नज़ारा (फ़ोटो : उमेश पंत)

ख़ैर इस शानदार नज़ारे को देखने बाद अब हम आ गए एक चोकलेटी सी जगह पर. ये था मशहूर स्विस चौकलेट कम्पनी लिंट का बड़ा सा स्टोर. तो मुँह मीठा करना तो बनता था. यहां से चौकलेट की खरीदारी करने के बाद अब वक़्त हो गया था लौटने का. 

ट्रेन और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ ये दोनों मेरी तमाम यात्राओं के साथी पहले भी रहे हैं. लेकिन किसी महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी पर ट्रेन से यात्रा का यह पहला अनुभव था. यूरोप की सबसे ऊंची जगह से मैं लौट तो आया था लेकिन मन का एक हिस्सा शायद वहीं छोड़ आया था.


कैसे पहुंचे 

स्विट्ज़रलैंड के प्रमुख शहरों जैसे ज्यूरिख़, इंटरलेकन वगैरह से युंगफ़्राओ रेलवे लाइन से जुड़ा है. इंटरलेकन से ग्रिंडलवाल्ड या लौटरब्रूनन के रास्ते क्लैनशैडे तक रेल लाइन के ज़रिये पहुंचा जा सकता है. इसके आगे केवल युंगफ़्राओ रेलवे के ज़रिये ही युंगफ़्राओ तक की यात्रा की जा सकती है.

भारत के प्रमुख शहरों दिल्ली और मुंबई से आप बेसल के लिए फ़्लाइट ले सकते हैं.  यह फ़्लाइट 12 से 14 घंटे का समय लेती है. बेसल से ट्रेन के ज़रिए इंटरलेकन होते हुए आप युंगफ़्राओ पहुंच सकते हैं.

युंगफ़्राओ के लिए रेल पास और एंट्री टिकिट मिलाकर क़रीब 150 स्विस फ़्रेंक यानी लगभग 11 हज़ार रुपए का ख़र्च आता है.


इस यात्रा पर मेरा व्लॉग यहां देखें

 

Written by 

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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