रवीश कुमार की अमरीका यात्रा : भाग -1

रवीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और एनडीटीवी से जुड़े हैं. हाल ही में उन्होंने अमरीका की यात्रा की. अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने वहां के येल यूनीवर्सिटी जैसे अकादमिक संस्थानों का गहराई से अध्ययन किया. साथ ही अमरीका में रह रहे ‘माइग्रेंट’ और वहां के रवासियों की जीवनशैली को भी कुछ नज़दीक से देखा. एक मझा हुआ पत्रकार यात्रा के दौरान एक देश और उसके लोगों को कैसे देखता है, उसकी एक बानगी उनकी यात्रा के दौरान लिखी गई इस डायरी से मिलती है. आप भी पढ़िए और देखिए अमरीका को रवीश के चश्मे से. पेश है उनकी यात्रा का पहला भाग.

येल यूनिवर्सिटी का मद्रास कनेक्शन है

 2017 में News Minute वेबसाइट पर विस्तार से इस पर रिपोर्ट मिलेगी. एलिहू येल ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकारी था और मद्रास में गवर्नर के तौर पर काम कर रहा था. येल ने कंपनी और भारत की जनता से छल कर काफ़ी पैसे कमाए. इसने भारत से ब्रिटेन रवाना होने वाले हर जहाज़ पर दस लोगों को ग़ुलाम बनाकर भेजा. येल ने ही सबसे पहले किताबें और टेक्सटाइल दान दिए. उसके बाद किंग जार्ज प्रथम का पोट्रेट दान में दिया जिसकी नीलामी से आठ सौ पाउन्ड मिले. इसी से येल कालेज की इमारत बनी थी और येल यूनिवर्सिटी का नाम पड़ा. येल का दान अगले सौ साल में दिया गया सबसे बड़ा दान था. एक और दानकर्ता का मद्रास से कनेक्शन है. जेरमियाह डम्मर. मद्रास में ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रतिनिधि था.

 

यहाँ स्कूली बच्चे, स्थानीय लोगों, पर्यटक और छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी दौरा होता है. गाइड ने भी यह सब बताया और इमारतों के बारे में कहा कि ज़्यादातर इमारतें बहुत पुरानी नहीं है मगर ऑक्सफ़ोर्ड की छाप इतनी गहरी है कि हर इमारत को ऐसे बनाया गया जो देखने और महसूस करने में सदियों पुरानी लगें. येल 1701 में बनी थी. अमरीका की तीन बड़ी यूनिवर्सिटी में एक है. यहाँ का लॉ स्कूल काफ़ी प्रसिद्ध है. अमरीका के बहुत सारे जज येल लॉ स्कूल के ही हैं जिस इमारत में वेबस्टर ने डिक्शनरी बनाई, गाइड ने उसे भी ख़ासतौर से बताया. यह काफ़ी अमीर यूनिवर्सिटी है. महँगी भी मगर हर तरह के छात्रों के लिए छात्रवृत्तियाँ हैं.

भारत के प्रतिभाशाली छात्र इसकी वेबसाइट से जानकारी ले सकते हैं. अलग अलग मुल्कों के विद्यार्थियों के बीच पढ़ने और दोस्त बनाने का अनुभव अलग ही होता होगा. कुछ लोगों को जीकर देखना चाहिए. भाषा से बिल्कुल न डरें. प्रोफेसर और छात्र काफ़ी समावेशी लगे. हमारी कमजोर अंग्रेज़ी को भी उदारता से सुनते रहे. उनका ज़ोर जानने पर रहता है. अलग अलग मुल्कों पर रिसर्च करने वाले प्रोफ़ेसर मिले. एक ही कमरे में भारतीय, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी आराम से मिल-जुलकर काम करते हैं और इधर आपके तीन नंबरी नेता आपको इन मुल्कों के नाम पर लड़ने के लिए भेड़-बकरी बनाने में लगे हैं. ऐसी मूर्खताओं से ख़ुद को आज़ाद कीजिए और एक ही जीवन है उसे तरह तरह से समृद्ध कीजिए.

 

यहाँ कई भारतीय छात्रों से मिला. यूनिवर्सिटी ने उनको कितना बदला है और बेहतर बनाया है यह आप तुरंत महसूस कर लेते हैं. आप किसी भी देश से आकर यहाँ लेक्चरर और प्रोफ़ेसर बन सकते है और संसाधनों का अधिकार से इस्तेमाल कर सकते हैं. यूनिवर्सिटी के प्रशासन में कई भारतीय अधिकारियों से भी मिला. एक बात और. मैं येल या हार्वर्ड का अनावश्यक महिमामंडन नहीं करता मगर एक सिस्टम के रूप में यूनिवर्सिटी काम कर रही है. इसका लाभ उठाइये. यहाँ एडमिशन के लिए प्रयास ज़रूर कीजिए.

इंसान के भेजे की लाइब्रेरी देखी, 1927 का भेजा देखा

भेजा मतलब ब्रेन. कशिंग सेंटर में जाते ही आप एक ऐसे जुनूनी डॉक्टर की आभा से घिर जाते हैं जो 1939 में इस दुनिया से जा चुका था. हार्वी कशिंग की तमन्ना थी कि मेडिकल के छात्रों के लिए कालेज से अलग इमारत में लाइब्रेरी बने. येल मेडिकल लाइब्रेरी को बनते हुए तो नहीं देख सके मगर दुनिया छोड़ने से पहले ख़बर मिल गई थी कि मेडिकल लाइब्रेरी बनेगी. हम उसी लाइब्रेरी के तहख़ाने में कई सीढ़ियों से उतरते हुए इस ब्रेन लाइब्रेरी में आए जो डॉ हार्वी कशिंग की याद में बनी है.

 

कशिंग ने 1891 में येल यूनिवर्सिटी से ही स्नातक की पढ़ाई की और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से चिकित्सा की पढ़ाई की. जान हापकिन्स हॉस्पीटल में काम किया जहाँ एक वक़्त में न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में कई अनुसंधान हुए. कशिंग हार्वर्ड में सर्जन इन चीफ़ भी बने. एक साल में सैकड़ों आपरेशन किया. रिटायर होने के बाद कशिंग येल यूनिवर्सिटी आ गए.

अली और वफ़ा के साथ इस लाइब्रेरी तक पहुँच कर लगा कि 1920-30 के साल में आ गया हूँ. यहाँ अचार के मर्तबान में तरह तरह के ब्रेन ट्यूमर से मरे लोगों का भेजा रखा है. मरने वाले का नाम और मरने का कारण भी लिखा है. किताब की तरह मर्तबान रखा है. अली ने ब्रेन के बारे में काफ़ी कुछ बताया. मुझसे लिखने में ग़लती न हो जाए इसलिए यहाँ नहीं लिख रहा हूँ. अली डॉक्टर नहीं हैं मगर उनका काम मेडिकल के लिए है. मैंने बताया कि वे मधुमेह के सपाट पाँव वाले मरीज़ों के लिए शोध कर रहे हैं.

यहाँ मेडिकल के छात्र इंसान के ब्रेन का अध्ययन कर सकते है. देख सकते हैं. पढ़ सकते हैं. आज तो हर चीज़ का एक्स रे और फ़ोटो है मगर उस वक़्त मेडिकल इलस्ट्रेटर की पढ़ाई होती थी जो शरीर के अंगों का स्केच बनाते थे जिसका इस्तेमाल पढ़ाई में होता था. एक तस्वीर में आप अली को दराज़ खोलते देखेंगे. अली दिखा रहे हैं कि फीटस यानी भ्रूण जब थोड़ा विकसित हो जाता है तो कैसा दिखता है. पहली बार भ्रूण देखने का अवसर मिला. यहाँ पर न्यूटन के हाथ की लिखावट भी है मगर मुझे देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका. फ़िलहाल उसे हटा दिया गया था. अली मुझे वही दिखाने ले गए थे.

 

मेडिकल साइंस में येल यूनिवर्सिटी के कई योगदान हैं. मैंने ब्रेन लाइब्रेरी इसलिए दिखाई ताकि मेडिकल के छात्र इस तरह के सपने देखें. अगर अभी तक ऐसी सुविधा नहीं है तो ख़ुद बनाने की सोचें. कुछ बड़ा करें जिससे सौ साल बाद कोई उन्हें याद करे. यहाँ भी आइये और दवा कंपनियों की नौकरी छोड़ विज्ञान के क्षेत्र को समृद्ध करें. एक छात्र ने बताया कि भारत में साइंस का अनुदान मिलने के पहले ही उपकरण बनाने वाली कंपनियों के दलाल वैज्ञैनिकों को फ़ोन करने लगते हैं कि आपको ग्रांट मिलेगा तो क्या वे फ़लाँ का उपकरण ख़रीदेंगे, ख़रीदेंगे तो कितना कमीशन लेंगे. तो अलग अलग चीज़ों को जानिये और दंगाई होने के लिए बेचैन हो रहे अपने नेताओं से मेडिकल शिक्षा के बेहतर संसाधन और माहौल की माँग करें.

अमरीका में मुझे प्यार मिला है, संसार मिला है

हम बेहद ख़ुशनसीब पेशे में हैं. लोगों की ज़िंदगी तक चल कर जाने का मौक़ा मिलता है. कई बार ज़िंदगियाँ हम तक चल कर आ जाती हैं. कभी किसी साल किसी रात अजीत ठाकुर से बात हुई थी. कभी मिलने का वादा रहा होगा. अचानक मेसेज आया कि दिसंबर में भारत आ रहे हैं, मिलना है. मैंने जवाब लिख दिया कि हम न्यूयार्क में हैं. अजीत साहब अस्सी किमी गाड़ी चलाकर मिलने आ गए. अस्सी किलोमीटर गाड़ी चला कर अपने घर ले गए. हम इस मोहब्बत के लिए उन सबका शुक्रिया अदा करते रहे जिनकी दुआओं ने मुझे इस क़ाबिल बनाया.

एक चाह थी कि बिहार के बाशिंदे जब बाहर के मुल्क जाते हैं तो अपनी ज़िंदगी को कैसे बदलते हैं. उनकी ज़िंदगी वहाँ की किस क़दर होकर रह जाती है. अजीत ठाकुर मधुबनी के रहने वाले हैं. भोपाल में बचपन बीता और वहीं से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की. तस्वीरों में सबसे पहले आप उनके घर को बाहर से देखेंगे. फिर घर के भीतर से बाहर का हाल देखेंगे. इस तरह से एक अमरीकी घर के भीतर एक बिहारी मन का संसार आपको दिखेगा.

 

अब यहाँ मयूराक्षी से मिल लीजिए. सिंदरी में पली बढ़ी एक लड़की जिसके पूर्वजों की डोर मधुबनी के एक गाँव से बंधी है. राँची से मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद अजीत से शादी हुई. वो कभी अपने बचपन के मोहल्ले में नहीं लौट सकी क्योंकि पूरा मोहल्ला नोएडा आ गया. मयूराक्षी मानव संसाधन के क्षेत्र में काम करती हैं. अजीत कई बैंकों में काम करते करते इस वक़्त जे पी मार्गन में काम करते हैं.

बारह साल अमरीका के शहरों में बिताने के बाद अजीत और मयूराक्षी ने न्यू जर्सी के इंग्लिश टाउन नाम के गाँव में एक घर ख़रीदा है. तीस साल पुराने इस घर का मालिक एक यहूदी परिवार था जिससे बिहारी परिवार ने ख़रीद लिया. इस घर के ज़रिये आप एक जीवन शैली को समझ सकते हैं. यह लेख अजीत की अमरीकी कामयाबी का महिमामंडन नहीं है बल्कि इसके ज़रिए एक पत्रकार एक माइग्रेंट के जीवन को दर्ज कर रहा है.

मकान का क्षेत्रफल 4200 वर्गफुट है. पाँच कमरे हैं. चार बाथरूम हैं. डाइनिंग हॉल है. सूरज की धूप खाने के लिए एक कमरा अलग से है. बाहर स्वीमिंग पुल है. गराज है. तीन गाड़ियाँ हैं. होंडा ओडिसा, बी एम डब्ल्यू और मर्सेडीज़. कमरे काफ़ी बड़े और साफ़ सुथरे हैं. आप तस्वीरों को क्लिक कीजिए और एक अमरीकी घर में झाँकने का सुख हासिल कीजिए.

बेसमेंट में एक थियेटर है. थियेटर जैसा. हमने यहाँ अपना शो देखा. जहाँ अजीत पूरे हफ़्ते का शो कई बार देख लेते हैं. फिर कुछ फ़िल्मी गाने देखे. ग़ुलामी ओर अगर तुम न होते का गाना मेरे लिए ईश्वर की स्तुति है. सुना और देखा.

 

अजीत ने बताया कि शुरू में लगता था कि अमरीका आए हैं. कुछ ख़ास कर लिया है मगर अब सब सामान्य लगता है. अजीत और मयूराक्षी दोनों अमरीकी नागरिक हैं. इसे नेचुरलाइज्ड कहते हैं. इनके दोनों बच्चे नेचुरल नागरिक हैं. एक ही छत के नीचे दो प्रकार की नागरिकता है. अजीत वोट दे सकते हैं, स्थानीय निकाय और सीनेट के चुनाव लड़ सकते हैं मगर राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकता. बेटा यहाँ पैदा हुआ है तो राष्ट्रपति का चुनाव लड़ सकता है.

अजीत की ज़्यादातर दोस्ती भारतीयों से है. अमरीकी से भी है. बिहार के लोगों से मिलना जुलना होता है. इनके इलाक़े में दो प्रकार के संगठन हैं. बाना और बजाना. बाना का मतलब होता है, बिहार एसोसिएशन आफ नार्थ अमेरिका बाना है. बजाना का मतलब है, बिहार झारखंड एसोसिएशन आफ नार्थ अमरीका . इसके लिए साल में बीस पचीस डॉलर की फ़ीस होती है. इसका काम पिकनिक करना और लिट्टी चौखा खाना है.

मयूराक्षी ने हमारे लिए शानदार खाना बनाया. काफ़ी मेहनत करनी पड़ी. हम मयूराक्षी के आदर और भोजन के प्रति आभार प्रकट करते हैं. हमारी ज़िंदगी का कारवाँ आज थोड़ा और बड़ा हुआ. किसी का प्यार मिला है, दुनियावालों देखो मुझे संसार मिला है. अजीत साहब ने इस प्यार के लिए 340 किमी से अधिक कार चलाई. मुझे अपनी कार में न्यू यार्क छोड़ने जा रहे हैं. दोनों के बच्चों को ख़ूब सारा प्यार और दुआएँ.

  जारी….

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