घुमक्कड़ी, घुमक्कड़ों की नज़र से

दुनिया के मशहूर घुमक्कड़, घुमक्कड़ी की अहमियत बताते हुए बहुत कुछ कह गए हैं. पेश हैं उन्हीं में से कुछ ख़ास बातें जिनसे तमाम घुमक्कड़ इत्तफ़ाक़ रखेंगे.

“यात्रा करना पूर्वाग्रह, कट्टरता और बंद दिमागी के लिए जानलेवा है, और इसिलिये हमारे कई लोगों को इसकी सख्त ज़रुरत है. लोगों और चीज़ों के बारे में खुले और  उदार विचार पूरी ज़िन्दगी दुनिया के एक कोने में पड़े रहने से नहीं आ सकते.”

मार्क ट्वेन

“यात्रा की असल अहमियत दरअसल उससे जुड़े डर की वजह से है. ये उस ढांचे को तोड़ती हैं जो एक तरह से हमारे अंदर बना होता है. दफ़्तर में बिताये उन कुछ घंटों की आड़ में हम न खुद धोखा दे सकते हैं, न ही खुद को उसके पीछे छिपा सकते हैं. यात्राएं हमसे ऐसे सारे बहानों को छीन लेती हैं. अपनों से दूर, अपनी भाषा से दूर, अपने सारे नकाबों से दूर, जहां हम पूरी तरह से अपने अस्तित्व की सतह पर होते हैं. लेकिन साथ ही एक ख़ास किस्म का अधूरापन महसूसते हुए हम हर इंसान और हर एक चीज़ की कीमत को एक बार फिर समझने लगते हैं.”

अलबर्ट कामू

“दुनिया एक किताब है और जो यात्रा नहीं करते वो उसका बस एक पन्ना ही पढ़ पाते हैं”

संत ऑगस्टीन

घुमक्कड़ के लिए जंजाल तोड़कर बाहर आना पहली आवश्‍यकता है। कौन सा तरुण है, जिसे आँख खुलने के समय से दुनिया घूमने की इच्‍छा न हुई हो। मैं समझता हूँ, जिसकी नसों में गरम खून है, उनमें कम ही ऐसे होंगे, जिन्‍होंने किसी समय घर की चाहार-दीवारी तोड़कर बाहर निकलने की इच्‍छा नहीं की हो। उनके रास्‍ते में बाधाएँ जरूर हैं। बाहरी दुनिया से अधिक बाधाएँ आदमी के दिल में होता है। तरुण अपने गाँव या मुहल्‍ले की याद करके रोने लगते हैं, वह अपने परिचित घरों और दीवारों, गलियों और सड़कों, नदियों और तालाबों को नजर से दूर करने में बड़ी उदासी अनुभव करने लगते हैं। घुमक्कड़ होने का यह अर्थ नहीं कि अपनी जन्‍म भूमि उसका प्रेम न हो। ”जन्‍मभूमि मम पुरी सुहावनि” बिल्‍कुल ठीक बात है। बल्कि जन्‍मभूमि का प्रेम ओर सम्‍मान पूरी तरह से तभी किया जा सकता है, जब आदमी उससे दूर हो।

राहुल सांकृत्यायन

मैं कहीं पहुँचने के लिए नहीं घूमता, बस निकल जाता हूं।

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उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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