पिंडारी ग्लेशियर जाना है? ये रहा तरीक़ा (भाग-2)

केशव भट्ट :

पिंडारी से छाँगूच, नंदा खाट, बल्जुरी के साथ ही नंदाकोट के भव्य दर्शन होते हैं। अंग्रेज शासक ट्रेल के नाम पर प्रसिद्ध ‘ट्रेल पास’, जो पिंडारी ग्लेशियर को जोहार के मिलम घाटी के ल्वाँ गाँव से जोड़ता है, एक साथ ही अद्भुत और भयानक है। इस दर्रे को पार करने के लिए पर्वतारोही पिंडारी के जीरो प्वाॅइंट को अपना बेस कैम्प बनाते हैं और यहाँ से आगे बेस कैम्प लगा कर, आगे तख्ता कैम्प के बाद एडवांस कैम्प लगाते हैं। ट्रेल पास के बाद तीखा ढलान है, जिसमें लगभग दो सौ मीटर की रोप से उतर कर नंदा देवी ईस्ट ग्लेशियर में यह कैम्प लगता है। आगे फिर ल्वाँ ग्लेशियर में हिम दरार (कैरावास) को पार कर ल्वाँ गाँव, नसपुन पट्टी, मर्तोली, बोगड्यार होते हुए मुनस्यारी पहुँचा जाता है।

‘ट्रेल पास’ के साथ कुमाऊँ के पहले कमिश्नर जार्ज विलियम ट्रेल और सूपी निवासी मलक सिंह ‘बूढ़ा’ की जज्बाती कहानी जुड़ी हुई है। पिंडारी ग्लेशियर के शीर्ष पर स्थित इस दर्रे के रास्ते पहले दानपुर और जोहार दारमा के बीच व्यापार होता था। कहा जाता है कि 18वीं सदी के अंत तक पिंडारी ग्लेशियर पिघलने से जगह-जगह दरारें पड़ गईं और आवागमन बंद हो गया। अप्रैल 1830 में ट्रेल इस दर्रे को खोलकर आवागमन बहाल करने के मकसद से पैदल ही बागेश्वर होते हुए दानपुर पहुँचे। स्थानीय लोगों के साथ उन्होंने दरारों के ऊपर लकड़ी के तख्ते डालकर दर्रे को पार करने का प्रयास किया। लेकिन बर्फ की चैंध से उनकी आँखों की रोशनी जाती रही और वे आगे नहीं बढ़ सके। उनकी इच्छा पूरी करने के लिये 45 वर्षीय मलक सिंह टाकुली अकेले ही दर्रे को पार करके मुनस्यारी गये और वापस लौट आए। बाद में ट्रेल की आँखें ठीक हो गईं। उन्होंने मलक सिंह को बुलाकर बूढ़ा (वरिष्ठ) की उपाधि दी। उन्हें पटवारी, प्रधान और मालगुजार नियुक्त करने के साथ ही पिंडारी के बुग्यालों में चुगान कर वसूलने का भी हक उन्हें दिया। बाद में इस दर्रे का नाम ‘ट्रेल पास’ पड़ गया।

मलक सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र दरबान सिंह बूढ़ा को चुगान कर वसूलने के अधिकार मिले। हालाँकि आजादी के साथ यह व्यवस्था खत्म हो गई। दर्रे से गुजरने वाले सामान्य लोगों में मलक सिंह आखिरी व्यक्ति थे। उनके बाद अब सिर्फ प्रशिक्षित पर्वतारोही ही दर्रे को पार करते हैं। अब तक के 86 अभियानों में से 14 दल ही इसे पार कर सके हैं। अब पिंडारी ग्लेशियर से वापसी शुरू होती है। स्वामी धर्मानंद उर्फ बाबाजी के वहाँ नंदा देवी मंदिर के दर्शन के बाद कदम खुद-ब-खुद ढलान में उतरने लगते हैं। यदि आप में ऊर्जा बची है तो देर शाम तक द्वाली पहुँचने की कोशिश करें। यदि थकान महसूस हो रही है तो फुर्किया में पड़ाव करना ही बेहतर रहेगा। जहाँ भी रुकें, अगली सुबह कफनी ग्लेशियर को प्रस्थान के लिए तैयार रहिए।

यदि आप फुर्किया में रुके हांे तो सुबह मुँह अंधेरे ही निकल लें। कफनी ग्लेशियर जा कर वापस उसी दिन द्वाली लौटना होता है। 11 किमी जाना 11 आना, मतलब जाना-आना बाईस किमी.। दिन में भोजन के लिए पराठे व अचार पैक कर लें और पानी की बोतल भी भर लें। इस सावधानी का महत्व तब पता चलता है, जब कोसों दूर तक पानी नहीं मिलता और हर कोई प्यास से बेहाल हो रहा होता है।

द्वाली से कफनी ग्लेशियर का हरे-भरे घास के लंबे मैदान से भरा रास्ता इतना खूबसूरत है कि शाम को वापस ठिकाने पर पहुँंचने के बाद थकान भी मीठी लगती है। 2013 में आई आपदा से यह रास्ता द्वाली के बाद टूट गया है। इसे खोलने के प्रयास चल रहे हैं। द्वाली में पीडब्ल्युडी के डाक बंगले के पीछे निगम के डाक बंगले के बगल से कफनी ग्लेशियर को हल्की चढ़ाई के बाद फिर कफनी नदी के किनारे-किनारे रास्ता है, जो ग्लेशियर तक पहुँचने तक धीरे-धीरे आपको ऊँचाई की ओर ले जाता है। चार किमी के बाद बुग्याल की हरी-भरी घास शुरू हो जाती है। आगे एक किमी बाद एक खूबसूरत जगह ‘खटिया’ है। अब यहाँ पर जिला पंचायत ने दो कमरों का रेस्ट हाऊस बना दिया है। खटिया से आगे बुग्याल की हरी घास में चलने का आनंद अनिर्वचनीय है। जाते हुए बाँईं ओर तीखी, आकर्षक चट्टानें हैं। यदि आप शांति से चल रहे हैं तो मोनाल के साथ घुरड़, काकड़ नाचते हुए नजर आ सकते हैं।

खटिया से मखमली बुग्यालों के बीच से होते हुए लगभग छः किमी की दूरी पर 3,860 मीटर की ऊँचाई पर कफनी ग्लेशियर के भव्य दर्शन होते हैं। ग्लेशियर के मुहाने, जिसे स्नो आउट कहा जाता है, से शोर करती हुई कफनी नदी बलखाती हुई निकलती दिखती है। पिंडारी ग्लेशियर की अपेक्षा इस ग्लेशियर को छू कर ग्लेशियर होने के एहसास को महसूस किया जा सकता है। पत्थर सी दिखने वाली सख्त ठंडी चट्टान को छूने पर पता लगता है कि ये बर्फ की ठोस परत है। मगर ग्लेशियर के ज्यादा नजदीक न जाएँ। इसके टूटने का खतरा रहता है।

अप्रेल-मई में कफनी ग्लेशियर से एक किमी पहले तक बर्फ जमी रहती है। इस सख्त बर्फ में चलने का अपना एक रोमांच है। मौसम खुशगवार हो तो यहाँ से नंदा कोट के भव्य दर्शन होते हैं। 6,861 मीटर ऊँंचा नंदा कोट दिखने में जितना सुंदर लगता है, पर्वतारोहण के लिये उतना ही चुनौतीपूर्ण है। इसको साउथ फेस, मतलब पिंडारी ग्लेशियर की ओर से अभी तक सिर्फ एक बार, 1995 में ब्रिटिश पर्वतारोही मार्टेन मोरेन ने ही क्लाइंब किया है। विश्व भर के पर्वतारोहियों के लिए साउथ फेस से नंदा कोट अभी तक चुनौती बना है। पिंडारी ग्लेशियर घाटी से इस चोटी में जाने के लिए 3,800 मीटर की ऊँचाई पर कुपियाधौड़ में बेस कैम्प लगाया जाता है। उसके बाद एडवांस कैम्प छांगुज ग्लेशियर में, पहला कैम्प शाॅल छांगुज में, द्वितीय कैम्प लास्पाधूरा के बेस कैम्प में तथा कैम्प तीन 6,000 मीटर पर नंदा भनार के नीचे लगाया जाता है। यहाँ तक पहुँचने में खतरनाक आइस फाॅल का भी सामना करना पड़ता है। इसके बाद समिट कैम्प से 400 मीटर की एक खड़ी बर्फीली दीवार को पार कर उसी दिन वापस उतरना कड़ी चुनौती रहता है। नंदाकोट के लंबे ढलान में फैले शिखर के पूर्वी हिस्से को भारतीय पर्वतारोहण संस्थान ने समिट (शिखर) माना है।

बहरहाल, नंदाकोट में सूर्योदय और सूर्यास्त के खूबसूरत दृश्यों को अपनी यादों में कैद करना आपके लिये बड़ी उपलब्धि है। कफनी ग्लेशियर से वापसी में हरे बुग्याल में सुस्ताते हुए अचार के साथ पराठों का लुफ्त उठाएँ। द्वाली पहुँचना देर सायं ही हो पाता है। (जारी है)

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केशव भट्ट

केशव भट्ट उत्तराखंड से हैं और पहाड़ों पर ख़ूब घूमते हैं। अपनी घुम्मकड़ी को केवल ज़हन तक नहीं रहने देते, लफ़्ज़ों में भी उतार देते हैं वो भी बख़ूबी। पहाड़ों के भूगोल की अच्छी जानकारी रखते हैं।

One thought on “पिंडारी ग्लेशियर जाना है? ये रहा तरीक़ा (भाग-2)

  • March 15, 2018 at 6:35 pm
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    वाह केशव दा, आपको जब जब भी पढने को मिलता है वही रोमांच महसूस होता है मने हम भी यात्रा में हों……….

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