अमेरिका नाम तो सुना होगा ! (पार्ट-2)

अमेरिका में मेरी पहली सुबह बारिश की फुहारें लेकर आयी सुबह होते ही जिन्दगी का सबसे कठिन सवाल मेरे सामने था जी हाँ पापी पेट का चूँकि सुबह का नाश्ता, मैंने अपने एक साथी के साथ होटल के रेस्तरां का चक्कर लगाया वहां काफी कुछ था लेकिन भारतीय अंदाज़ से काफी जुदा हाँ एक और मजेदार बात बांटता चलूँ वहां के रेस्तरां का नियम है की आपको उसमे प्रवेश की अनुमति तभी मिलेगी जब आपका नाम बुलाया जायेगा उससे पहले आपको लॉबी में बैठकर इन्तिज़ार करना होगा ये नियम क्यों था इसका पता तो मुझे नहीं पड़ पाया क्योंकि वहां मेज खाली थीं शायद वो इस बात की पक्की व्यवस्था करना चाहते हों की जब वेटर खाली हो तभी मेहमानों को अन्दर बुलाया जाए जिससे उन्हें ज्यादा इन्तिज़ार न करना पड़े .हमारे साथी ठहरे शुद्ध शाकाहारी इसलिए हमने बहार से कुछ खरीदने की सोची आस पास कई माल्स थे वहां जाने पर लगा कि क्यों अमेरिका को क्यों उपभोगवाद का गढ़ कहा जाता है सब कुछ बड़ा बड़ा जैसे छोटे का कोई कांसेप्ट ही न हो जो भी चाहिए थोक में ले जाइए मैंने भी ४ लीटर का एक जूस जार खरीद लिया जो अगले ७ दिन मुझे मेरे घर की याद दिलाता रहा मैं अपने दिन की शुरुवात जूस पी कर ही करता हूँ .

माल्स घूमने पर लग रहा था कि अमेरिका एक सस्ता मुल्क है अगर आप डॉलर को भारतीय मुद्रा में बदल कर न सोचें तो कम से कम खाने पीने की चीजें सस्ती हैं . मैं अभी भी कन्वर्टर की समस्या से जूझ रहा था आखिरकार मैंने उसे खरीदने का फैसला किया एक छोटा सा प्लग और कीमत ११ डॉलर भारतीय मुद्रा में लगभग ५०० रुपये के आस पास मरता क्या न करता लेकिन अमेरिकी सरकार की नीतियों और उपभोक्ता अधिकारों के संरक्षण के कारण ये मुझे नहीं खला क्योंकि अगर आप खरीदे सामान की रसीद रखते हैं तो आप एक माह के अन्दर उसको पुरी कीमत पर वापस कर सकते हैं वो भी बगैर किसी कारण के जब मैंने अपने कन्वर्टर को वापस किया तो मुझे सधन्यवाद मेरे पैसे वापस मिल गए हिन्दुस्तान में ये असंभव है .पहले हमें हमारे मेजबान सुबह बहार घुमाने ले जाने वाले थे लेकिन बाद में यह वक्त दिन के १२.३० हो गया समय का पालन कितनी खूबसूरती से अमेरिका में होता है इसका एहसास मुझे इसी दिन से हुआ और जब तक मैं वहां रहा हम लोग भले ही देर से आये हों लेकिन हमारे मेजबान कभी नहीं लेट हुए वो हमेशा अपने दिए हुए समय पर होटल की लॉबी में हमारा इन्तिज़ार करते मुझे याद आया हमारे यहाँ अगर आप किसी को लेने होटल गए हैं तो बगैर उसके कमरे में गए घनिष्ट होने का एहसास नहीं होता यह कहना जरा मुश्किल है कौन सही है और कौन गलत हम चले लोंग्बीच का जग प्रसिद्ध एक्येरियम देखने क्या जगह थी अमेरिकी चाहे कुछ जानते हों या न जानते हों लेकिन उन्हें चीज़ों को रोचक बनाना आता है चारों तरफ पानी के बड़े बड़े कांच के टैंक जिसमे शार्क से लेकर डोल्फिन तक दुनिया के सारे जलीय प्रजाति के जंतु (मुझे जीव विज्ञानं का ज्ञान कम है ) .

यहाँ मुझे ऐसे कई लोग मिले जो इस एक्वेरियम में स्वयमसेवा करते थे बिना किसी पैसे के विज्ञानं के प्रति जागरूकता चीज़ों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने में आती है न कि संगोष्ठियों में सरकार और मीडिया को गरियाने से हम लोगों ने एक शो देखा जिसमे पानी के टैंक के अन्दर एक गोताखोर दर्शकों को जलीय जन्तुवों के बारे में माइक्रोफोन से बताता है यही वक्त था जन्तुवों को भोजन देने का अद्भुत था वो नज़ारा अभी मुझे एक सदमा लगना था घूमते घूमते शाम हो गयी थी तभी हमारे मेजबानों ने आग्रह किया कि क्या हम रात का भोजन थोडा जल्दी कर लें उस वक्त शाम के ४ बजे थे मैंने सोचा जल्दी का मतलब रात के ७ बजे होगा क्योंकि आम हिन्दुस्तानी रात का खाना रात के ८-९ बजे तक करता है . लेकिन बाद में ये जानकार मुझे झटका लगा पूरा अमेरिका रात के ७ बजे तक अपना शाम का भोजन समाप्त कर लेता है जय हो पश्चिमी सभ्यता की मेरा बचपना और जवानी ये सुनते सुनते ख़तम हो गयी कि पश्चिमी सभ्यता का असर है .

हम रात को देर तक जागते हैं देर से खाते हैं और सुबह देर तक सोते हैं वरना हमारी सभ्यता तो न जाने क्या क्या है गोया अमेरिका तो देखा नहीं था इसलिए जो बताया गया वो मान लिया वैसे भी हम लोग तो वाचिक परंपरा के अनुयायी हैं आज भी हम से प्रवचन करवा लीजिये कर देंगे कि दुनिया को ऐसे खूबसूरत बनाया जा सकता है ये किया जाना चाहिए लेकिन काम करने को कहा जाए तो हम इन्तिज़ार करेंगे कि पड़ोसी के घर में भगत सिंह पैदा हो जाए और वो क्रांति करे फायदा हमें मिले . तो ६ बजे तक हम एक रेस्तराओं में थे मैंने एक मांसाहारी पिज्जा का लुत्फ़ उठाया अमेरिका और यूरोप में मसालों का प्रयोग कम होता है इसलिए एक भारतीय के लिए यहाँ का भोजन बेस्वाद लग सकता है खूब सारा सलाद शायद यही इनकी सेहत का राज़ है अमेरिकी खूब लम्बे होते हैं एक और मिथक टूटा जी हाँ हम ठण्ड में ठन्डे पानी और बरफ का सेवन बंद कर देते हैं ठण्ड लग जाने का डर रहता है या शायद डर दिखाया जाता है आम भारतीय की जिन्दगी हमेशा डरते डरते बीतती है कभी भगवान् का डर कभी समाज का और कभी परिवार का इसलिए हम ये जान ही नहीं पाते कि डर आगे जीत होती है इसलिए जैसे हमें डराया जाता है हम बगैर तर्क किये उस डर को आगे की पीढी में ट्रांसफर करते रहते हैं. है न मजेदार बात तो मैं बताने जा रहा था कि आम अमेरीकी पानी को ढेर सारी बरफ के साथ पीना पसंद करते हैं चाय भी कोल्ड पसंद की जाती है मतलब चाय का पानी और ढेर सारी बरफ.

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मुकुल श्रीवास्तव

मुकुल श्रीवास्तव लखनऊ यूनीवर्सिटी में पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। तमाम अख़बारों के लिए लेख लिखते हैं। देश-विदेश में घूमते हैं और घुमक्कड़ी के अपने अनुभवों को बख़ूबी लफ़्ज़ों में भी ढालते हैं।

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