‘नैनीताला नैनीताला’: बदलते समय और बिखरती स्मृतियों का राग
पुष्पेश पंत के संस्मरण नैनीताला नैनीताला (Pushpesh Pant Book Nainitala Nainitala) का यह अंश उत्तराखंड के हिल स्टेशन नैनीताल के छात्र जीवन, हॉस्टल संस्कृति और धीरे–धीरे बदलते शहर की भावुक यात्रा को दर्ज करता है। 1963 में लंघम हाउस हॉस्टल में रहने से शुरू हुई यह कहानी युवावस्था की दहलीज़, बदलते रिश्तों और पहाड़ के रूपांतरण की साक्षी बनती है। अंततः जब शहर बदल जाता है, तब भी मन में एक अदृश्य धुन गूँजती रहती है—‘नैनीताला नैनीताला’।
अपनी अलग वर्ण–व्यवस्था वाले हॉस्टल
वह धुन जाने कहाँ मचलती है
1963 में नैनीताल लौटा। इस बार अयारपाटा के बँगले में नहीं बल्कि तल्लीताल की छोर पर लंघम हाउस हॉस्टल में रहना शुरू हुआ।
हॉस्टलों में वे छात्र छात्राएँ रहा करते थे जो नैनीताल के निवासी नहीं—घर परिवार वाले नहीं—बाहरी समझे जाते थे। हॉस्टल वालों की अपनी अलग बिरादरी थी। बाज़ार में बसने वालों से अलग। बाहर से आए उन छात्रों से भी फर्क जो किफायत के दबाव में ‘डेरों’ में रहा करते थे, अपनी जैसी माली हालत वाले हमउम्र सहपाठी पार्टनर के साथ।
हॉस्टलों की अपनी वर्ण–व्यवस्था थी—सबसे ऊपर लंघम हॉस्टल विराजता था जहाँ सिर्फ़ पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों को दाखिला मिलता था। सबसे अच्छे अंक पाने वाले सिंगल कमरों से पुरस्कृत होते थे। हर कमरे के साथ अटेच्ड बाथरूम था। कमरों मे कालीन बिछे थे।
ख़िदमत के लिए एक चौकीदारनुमा रामसिंह नामक सेवक सुलभ था। यह सब अय्याशी इसलिए सम्भव थी क्योंकि लंघम हाउस मूलतः एमएलए हॉस्टल था। गर्मियों के बाद विधायकों के लखनऊ का रुख़ करने के बाद सफ़ाई, रंग–रोगन के बाद इसे डिग्री कॉलेज के सुपुर्द कर दिया जाता था।
कुछ मैं बदल रहा था, कुछ नैनीताल
हॉस्टलर बनने के साथ मेरी ज़िन्दगी अचानक बदल गई। कहने को वार्डन संरक्षक की भूमिका निबाहने को हॉस्टल में नियुक्त थे पर अनुशासन का शिकंजा नहीं था, जैसा ‘प्रायरी लॉज’ में!
सबसे बड़ी बात यह थी कि मूँछों की रेख भले ही अभी भी ओठों के ऊपर नहीं प्रकट हुई थी, उम्र तेरह साल नहीं, बल्कि सोलह पार कर रही थी। शरीर में भी बदलाव आ रहा था। चंचल मन भी इधर–उधर भटकता रहता था।
हॉस्टल में कई नौजवान छात्र थे जो कमरों में छुपकर शराब भी पीते थे और बाहर के अहाते मे खुलकर सिगरेट भी। शुरू में अश्लील लगने वाली बातें, लड़के–लड़कियों के शारीरिक सम्बन्धों वाली जल्दी ही सामान्य लगने लगीं।
बाहर आने–जाने की आज़ादी निराली थी। पाँच का भौंपू सुनते ही घर की तरफ़ दौड़ने की मजबूरी नहीं थी। कुछ मैं बदल रहा था, कुछ नैनीताल।
भोले बचपन का अंत और जवानी की दस्तक

इस हॉस्टल वाले अन्तराल में अकसर सामने वाले पहाड़ पर चढना हुआ। कभी लाल टंकी के आस पास तो कभी रामजे अस्पताल के ऊपर तक बिड़ला की तरफ़। कभी इस धूपवाली जगह बसने वाले अध्यापकों के घर जाने का मौका भी मिला।
नये होटल बन रहे थे, माल रोड पर और भुवाली वाली सड़क पर। कई हिन्दी फिल्मों की शूटिंग उन्हीं दिनों हुई। भोला बचपन ख़त्म हो चुका था। जवानी दस्तक दे चुकी थी। पुराने संगी साथी बिछुड़ चुके थे। नये नाते जुड़ रहे थे। पढ़ाई बदस्तूर जारी थी।
1965 में एम.ए. पूरा हो गया; नैनीताल छूट गया।
वह धुन जाने कहाँ मचलती है—नैनीताला नैनीताला
उसके बाद नैनीताल अपना शहर नहीं रहा। कई बार वापस लौटना हुआ और संयोगवश हर बार सामने वाले घामठौर में ही बासा बना। कभी मौसी के घर पर रामजे अस्पताल के ऊपर जहाँ मौसा सिविल सर्जन थे या देवसिंह के यहाँ पढालनी निवास के दो कमरे वाले नये फ्लैट में जो लाल टंकी की तरह जाने वाले रास्ते के आरम्भ में नया–नया बना था। बाद में शेखर के साथ लोअर डांडा में ‘परिक्रमा’ में।
1968 में रिटायर होने के बाद पिता भुवाली में बस गए, सो नैनीताल में दिन बिताने के बाद मजे में चुंगी पार वाले नैनीताल को पीछे छोड़ते नये घर का रुख करने का रिवाज शुरू हो गया, आख़िरी बस पकड़ने का।
पता नहीं कब फ्लैट्स के बैंड–स्टैंड पर कैप्टेन रामसिंह का आना बन्द हो गया। नैनीताल गर्मियों वाली राजधानी नहीं रहा। पर आज भी कानों से न सुनी जा सकने वाली, मन को बेचैन कर देने वाली वह धुन जाने कहाँ मचलती है—नैनीताला नैनीताला!
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