रात में जादुई नगरी लगने लगता है बुडापेस्ट

तृप्ति शुक्ला मीडिया से जुड़ी हैं. अक्सर मुस्कुराती हुई नज़र आती हैं. फ़ेसबुक पर अपने ‘क्वर्की वन लाइनर्स’ के लिए जानी जाती हैं. छिपी हुई पोएट भी हैं. हाल ही में वो देश से बाहर पहली बार उड़ी और उस उड़ान को उन्होंने बाकायदा पहली बार दर्ज़ भी किया. उनकी इस यूरोप यात्रा को हम यहां सिलसिलेवार पेश कर रहे हैं. यात्राकार पर पेश है उनकी यूरोप यात्रा का दूसरा भाग. पहला भाग आप यहां पढ़ सकते हैं.

तो हम वरसावा से बुडापेस्ट की ओवरनाइट ट्रेन न छूटने का शुक्र मना ही रहे थे कि तभी टीटी आया और हमारा टिकट लेकर चला गया। बोला- सुबह मिलेगा। अगले स्टेशन पर एक कपल हमारे डब्बे में चढ़ा। जब उसका टिकट भी टीटी आकर ले गया तो वह लड़का घबरा गया। मैंने उसे बताया कि घबराओ नहीं, यहां ऐसा ही होता है। तुम्हारे स्टेशन से आधे घंटे पहले टीटी तुमको उठाने आएगा और टिकट देकर जाएगा।

इसके बाद हम चादर तानकर सो गए और सुबह नींद खुली बुडापेस्ट में। स्टेशन पर उतरे तो वह कुछ खास नहीं लगा। बहुत पुरानी सी इमारत थी और आस-पास खाने-पीने की जो दुकानें थीं उन पर पोर्क (या बीफ़ या जो कुछ भी हो) पक रहा था, इसलिए मन और अजीब सा हो गया। स्टेशन बहुत ज्यादा साफ़ भी नहीं था तो लगा कि हंगरी की राजधानी आकर गलती तो नहीं हो गई कहीं। ट्रेन स्टेशन पर ही पहले अगले दिन की यात्रा के लिए बुडापेस्ट से प्राग तक का टिकट खरीदा और फिर वहां से निकलकर मेट्रो स्टेशन पहुंचे और वहां से पकड़ी अपने हॉस्टल तक की मेट्रो।

सुबह के करीब साढ़े 9 बज रहे थे। मेट्रो से बाहर जब बुडापेस्ट के खुले आसमान में पहली सांस ली तो लगा कि नहीं गलती तो बिलकुल नहीं की। सामने ही बर्गर किंग दिख गया तो सोचा कि पहले नाश्ता कर लिया जाए। एक तो पूरे टूर के दौरान लोगों को वेज बर्गर की परिभाषा समझाने में बड़ी दिक्कत आती थी।

वहां से निकलकर हॉस्टल पहुंचे और इस बात की तफ़्तीश कर ही रहे थे कि यही हमारा हॉस्टल है कि तभी सामने से एक बंदा मुस्कुराते हुए हिंदी में कहता हुआ निकला, ‘हां यही वह हॉस्टल है। आपने ढूंढ ही लिया।’ पराए देश में हिंदी सुनकर हमारी तो बांछें खिल गईं। हॉस्टल में चेकइन का वक्त बाद का था तो हम सामान रखकर वैसे ही बाहर निकल गए।

पैदल-पैदल चलते गए तो थोड़ी दूर पर उठते-गिरते फव्वारे नज़र आए तो सोचा विडियो बना लूं। वीडियो बनाने के लिए फव्वारों के पास बैठ गई मगर कंबख्त फव्वारा था कि उठने का नाम ही नहीं ले रहा था। तभी ध्यान गया कि ये सेंसर वाले फव्वारे हैं, जब तक पास बैठी रहूंगी तब तक ये नहीं उठेंगे, बल्कि ये मुझे रास्ता देने के लिए बंद ही रहेंगे। हाल ही में मिले इस ज्ञान पर और अपनी बेवकूफ़ी, दोनों पर मुस्कुराते हुए मैं उठ गई।

वहां से निकले तो मशहूर पेंटर (जिनके बारे में मुझे पहले नहीं पता था और बस मम्मी के सवाल का जवाब देने के लिए उनके बारे में सर्च किया था) रॉस्कोविक्स की मूर्ति दिखी। उनकी मूर्ति के पास थोड़ी-बहुत कलाकारी करके हम वहीं बैठ गए और चार्ल्स ब्रिज, दूना नदी (जिसे दूनो, डेन्यूब, दानेब, दुनाव और दुनेरिया भी कहते हैं) और आती-जाती ट्राम को देखते रहे। कुछ देर यूं ही बैठे रहने के बाद सोचा कि चलो चार्ल्स ब्रिज पर होकर आया जाए। ब्रिज के पास पहुंचे ही थे कि तभी एक आवाज़ आई, ‘नमस्ते जी, घूम लिए या घूमने जा रहे हैं?’ फिर हिंदी! सामने देखा तो एक लड़का टोपी लगाए खड़ा था। बोला- आप तो हमारे अपने हैं, आइए मैं आपको दिखाता हूं कि बिग बस में आपको क्या-क्या मिलेगा। उसके उर्दू अल्फ़ाजों और ज़रूरत से ज़्यादा अपनेपन से मुझे शक तो पहले से ही हो रहा था लेकिन आखिर में पूछ भी लिया, कहां से हो? जवाब में ‘पाकिस्तान से’ सुनकर मैंने फौरन कहा, मुझे पता था।

उसका नाम अब्दुल था। उसने बताया कि उसका एक दोस्त भी है मुंबई से लेकिन उसकी आज छुट्टी है और दोनों पार्ट टाइम यह काम करते हैं और एशिया के किसी भी कस्टमर को कहीं और नहीं जाने देते। उससे टिकट लेकर हमने पहले एक बस में शहर का एक चक्कर मारा। फिर वापस पहुंचे हॉस्टल। वहां से नहा-धोकर निकले तो लगी भूख। गूगल बाबा ने बताया और सरोज मैम ने अपने ‘विश्वस्त सूत्रों’ से भी पता लगाया कि वहां कुछ इंडियन रेस्टोरेंट हैं। गोविंदा पास था तो वहीं चले गए। तीन दिन बाद पूड़ी-सब्जी खाकर आत्मा तृप्त हो गई।

वहां से निकले और चार्ल्स ब्रिज के पार पहु्ंचकर दूसरी बस पकड़ी जिसने शहर के बाकी हिस्से के साथ-साथ नदी पार बसे पुराने बुडा के पहाड़ी हिस्से का भी चक्कर लगवाया। इसके बाद हमने पकड़ी शाम की बस जो शहर की जगमग नाइटलाइफ़ के बीच से होती हुई हमें फेरी तक ले गई। रात में यह शहर एक जादुई नगरी जैसा लगने लगा था। एक तरफ़ जगमगाती पार्ल्यामेंट बिल्डिंग जो कि दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संसद भवन है, दूसरी तरफ़ दूना पर एक के बाद एक बने कई पुल, जगमग करती लाइटों ने सब पर एक अलग ही रूप चढ़ा दिया था।

पानी के बीचों-बीच से जब पार्ल्यामेंट बिल्डिंग पर नज़र गई तो उसके पीछे से झांक रहा चांद पकड़ में आ गया और फिर उसे नज़रों से ओझल नहीं होने दिया। बोट ने हमें उतारा मार्गरेट आइलैंड पर, जहां पुल के नीचे बैठकर कोई भी पूरी रात गुज़ार सकता है। ऐसे ही हम पुल के पास बैठे थे कि हमें बीच नदी कोई नाव जैसी चीज़ नज़र आई। वह बिलकुल भी हिल-डुल नहीं रही थी। ऐसा लगा कि उस पर दो-तीन लोग भी बैठे हैं। हमने सोचा कि शायद ये लोग सीक्रिट पार्टी कर रहे होंगे। बाद में पता चला कि यह बस ऐंकर जैसी कोई चीज़ थी और यहां से आगे किसी बोट को जाने की मनाही थी।

कुछ देर में हमारी अगली बोट आ चुकी थी। नदी का चक्कर लगाकर हम पैदल ही वापस हॉस्टल की तरफ़ चल पड़े। भूख लग रही थी और बर्गर किंग भी खुला था और अच्छी बात यही थी कि हम उनको सुबह समझा भी चुके थे कि वेज बर्गर क्या होता है।

अगली सुबह हमने फिर बस पकड़ी और बुडापेस्ट के पहाड़ी हिस्से पर बने चर्च, कैसल, पैलेस, हीरोज़ स्टैचू और वहां के सबसे ऊंचे पॉइंट ‘लिबर्टी स्टैचू’ पर भी गए। वहां मैराथन या ऐसी ही किसी दौड़ की तैयारी हो रही थी। इसके बाद हम गए हीरोज़ स्क्वेयर जिसे दुनिया के सबसे बड़े आउटडोर स्केटिंग स्टेडियम के लिए भी जाना जाता है। वहां ऑलरे़डी भांति-भांति के पोज़ दे रहे लोगों के पोज़ कॉपी करके उन्हीं से फोटो खिंचवाई और चलते बने।

अब्दुल ने हमें बताया था कि यहां के न्यू यॉर्क कैफ़े ज़रूर जाना, भले ही कॉफी मत पीना क्योंकि वह महंगी होती है मगर जाना जरूर। तो इसके बाद हम चले पड़े न्यूयॉर्क कैफे। हम तो कॉफी पीने के मकसद से ही गए थे लेकिन वहां इतनी भीड़ थी और इतनी लंबी लाइन लगी थी कि वहां कॉफी पीने बैठते तो फिर से हमारी ट्रेन छूटनी तय थी। इसलिए बस वहां की दो-चार फोटो उताकर हम निकल लिए और बाहर आकर दूसरी दुकान से कॉफी पी क्योंकि कॉफी तो पीनी ही थी। न्यूयॉर्क कैफे के अंदर न सही, बाहर सही।

अब बारी थी इस शहर से रुखसती की। पिछले अनुभव से सबक लेकर बार-बार टिकट पर टाइम चेक करके हम वक्त से काफ़ी पहले स्टेशन पहुंच गए। शाम के वक्त यह स्टेशन भी प्यारा लगने लगा था। हमने डब्बे में सामान भी चढ़ा दिया था लेकिन दिक्कत यह थी कि हमारी चेयर कार थी जिसमें सोना मुश्किल था और रात भर का सफ़र था। सरोज मैम ने टीटी से बात की कि स्लीपर का टिकट मिल जाता तो। टीटी बोला कि 70 यूरो और लगेंगे। सरोज मैम ने आकर बताया और मैं भागती हुई टीटी के पास पहुंची और उससे पूछा कि एटीएम किधर है। वह इधर-उधर नज़र दौड़ा ही रहा था कि मैंने उछलकर कहा, उधर है! और भागकर एटीएम तक पहुंची और उसी स्पीड से वापस ट्रेन तक पहुंची। ट्रेन के चलने का टाइम हो चुका था और हमें सामान एक डब्बे से उतारकर दूसरे डब्बे तक लाना था। हमने फिर वही फुर्ती दिखाई और ट्रेन चलने से ठीक पहले हम एक बार फिर स्लीपर में चढ़ चुके थे।

छोटा सा कंपार्टमेंट था जिसमें बस दो ही बिस्तर थे और उसी कंपार्टमेंट में एक पतला सा दरवाज़ा और था, खोला तो पता चला कि अंदर तो नहाने-धोने का पूरा इंतजाम है। तभी टीटी आया और बोला कि सुबह नाश्ते में क्या लेंगी? अब तक हम समझ चुके थे कि नॉर्मल स्लीपर डब्बे की जगह हमें फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट मिला है। बस फिर क्या था, सुबह का सारा प्लान हमने रात में ही बना लिया कि सुबह यहीं से नहा-धोकर और नाश्ता करके निकला जाएगा। 70 यूरो दिए हैं कि कोई बात! हमारी ट्रेन प्राग के रास्ते पर निकल पड़ी थी और हम कंपार्टमेंट की एक-एक चीज़ का अवलोकन शुरू कर चुके थे।

अभी के लिए इतना ही (हां मुझे पता है कि यह वाला लंबा हो गया है), आगे की कहानी बाद में…

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