हिमालयी चित्रों की घर वापसी – 170 साल बाद भारत लौटे श्लागिन्टवाइट बंधुओं के चित्रों की प्रदर्शनी
हिमालय (Himalayan paintings) सिर्फ एक पर्वतमाला भर नहीं है. वह मानवीय सभ्यता, यात्राओं, खोजों और स्मृतियों का एक जीवित दस्तावेज़ है. सदियों से यह पर्वतमाला यात्रियों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और कलाकारों को अपनी ओर आकर्षित करती रही है.
आज, जब धरती को समझने के लिए हमारे पास सैटेलाइट, डिजिटल मैप्स और अनगिनत तकनीकें हैं, तब यह कल्पना करना रोमांचक है कि लगभग 170 वर्ष पहले हिमालय को समझने और दर्ज करने के लिए लोगों ने किन साधनों का सहारा लिया होगा.
इसी रोमांचक इतिहास की एक अनूठी कहानी है जर्मनी के श्लागिन्टवाइट बंधुओं की, जिनके दुर्लभ हिमालयी चित्र आज पहली बार भारत लौटे हैं. इन अनमोल चित्रों को दिल्ली के इंडिया इंटरनैशनल सेंटर एनेक्स की इमारत के भूतल (बेसमेंट) पर मौजूद प्रदर्शनी हॉल में प्रदर्शित किया गया है.
इस ब्लॉग में पढ़ें
श्लागिन्टवाइट बंधु कौन थे? (Who were Schlagintweit Brothers who made Himalayan paintings)

जर्मनी के बर्लिन में फ्री यूनिवर्सिटी में भूगोल के प्रोफ़ेसर रह चुके हर्मन ख़ास इस प्रदर्शनी के लिए भारत आए हैं. यह प्रदर्शनी दरअसल उनके और भारतीय प्रोफ़ेसर और इतिहासकार शेखर पाठक के दिमाग़ की उपज है जिसका विचार आज से दस साल पहले दोनों के दिमाग़ में आया.
प्रोफ़ेसर हर्मन बताते हैं, “सन 1854 में जर्मनी से तीन भाई, हर्मन, एडॉल्फ और रॉबर्ट श्लागिन्टवाइट, भारत आए. प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फॉन हम्बोल्ट की प्रेरणा और प्रशिया के राजा फ्रेडरिक विल्हेम चतुर्थ के संरक्षण में शुरू हुआ यह वैज्ञानिक अभियान ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा प्रायोजित था. उनका आधिकारिक उद्देश्य भारत में terrestrial magnetism का अध्ययन करना था.”

लेकिन इन भाइयों का सपना इससे कहीं बड़ा था. वे हिमालय को देखना, समझना और उसे अपने समय के लिए दर्ज करना चाहते थे.
1857 के उथल-पुथल भरे दौर में एक असाधारण यात्रा

इन भाइयों की चुनौतियों पर बात करते हुए प्रोफ़ेसर शेखर पाठक कहते हैं, “यह दुर्भाग्य ही है कि जब श्लागिन्टवाइट बंधु भारत पहुँचे, तब देश 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की दहलीज़ पर खड़ा था. राजनीतिक अस्थिरता, लंबी यात्राएँ और कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, हर कदम पर चुनौती थीं.”
फिर भी उन्होंने हिमालय के उन दुर्गम इलाकों की यात्रा की, जहाँ आज भी पहुँचना आसान नहीं. असम के गुवाहाटी से मेघालय के खासी हिल्स तक, उत्तराखंड के बुग्यालों से लद्दाख के निर्जन पर्वतों तक, और बाल्टिस्तान, तिब्बत से लेकर भूटान तक, उन्होंने लगभग 8,000 मील की यात्रा की और अपनी यात्राओं में देखे गए को इन तस्वीरों में क़ैद किया.
हिमालय का पहला दृश्य दस्तावेज़

यह वह दौर था जब फोटोग्राफी अपने शुरुआती चरण में थी. तस्वीरों को विकसित होने में महीनों लगते थे. इसलिए श्लागिन्टवाइट बंधुओं ने हिमालय को दर्ज करने के लिए कई माध्यम अपनाए, जिनमें पेंसिल स्केच, ऑयल पेंटिंग, वॉटरकलर प्रमुख थे.
इस प्रदर्शनी के क्यूरेटर विनीत अग्रवाल बताते हैं, “कई तस्वीरों को बाद में हाथों से रंगा गया और फिर उन्हें विस्तृत चित्रों में बदला गया. ये चित्र विज्ञान और कला का एक अनूठा संगम हैं.”
यूरोप लौटते समय श्लागिन्टवाइट बंधु अपने साथ सैकड़ों चित्र लेकर गए. इन चित्रों ने पहली बार यूरोप को भारत और हिमालय के विशाल भूगोल, बस्तियों, कृषि पद्धतियों और जीवनशैली की झलक दिखाई.
आज ये चित्र केवल कलाकृतियाँ नहीं हैं. वे उन्नीसवीं सदी के हिमालय का एक दृश्य अभिलेख हैं.
इस विषय पर मैंने एक विस्तृत डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भी बनाई है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं.
अभियान में मारा गया एक भाई
इस कठिन अभियान की एक त्रासदी भी है. तीनों भाइयों में से एडॉल्फ श्लागिन्टवाइट मध्य एशिया की यात्रा के दौरान मारे गए. प्रोफ़ेसर हर्मन बताते हैं, “उस समय के क्रूर शासक नहीं चाहते थे कि इन जगहों को कोई यूरोपीय इस तरह से दर्ज करे इसलिए एक भाई की हत्या कर दी गई.”
उनकी मृत्यु ने इस महान अभियान को एक भावनात्मक आयाम दिया. दो भाई अपने साथ केवल चित्र ही नहीं, बल्कि अपने भाई की स्मृतियाँ भी लेकर लौटे.
170 साल बाद भारत वापसी

करीब डेढ़ शताब्दी तक ये दुर्लभ चित्र जर्मनी में सुरक्षित रहे. कुछ श्लागिन्टवाइट बंधुओं के परिवारों के पास तो कुछ बर्लिन के संग्रहालयों में. फिर एक विचार जन्मा कि क्या इन्हें भारत वापस लाया जा सकता है. शेखर पाठक और पहाड़ संस्था के कुछ अन्य सदस्यों द्वारा देखे गए इस सपने को साकार होने में पूरे दस वर्ष लगे.
पहाड़ से जुड़े चंदन डांगी बताते हैं, “इन तस्वीरों को भारत लाना बहुत चुनौती पूर्ण रहा. इस तरह की तस्वीरों से जुड़े कस्टम के कठिन नियमों की वजह से चुनौतियाँ काफ़ी बढ़ गई. लेकिन उत्तराखंड सरकार, इंडिया इंटरनैशनल सेंटर, पहाड़ संस्था और बर्लिन की कई संस्थाओं की मदद से यह मुश्किल काम आख़िरकार पूरा हुआ और यह पेंटिंग्स भारत में पहली बार दिखाई जा रही हैं. यहाँ आकर कोई भी इन्हें देख सकता है. यह प्रदर्शनी आने वाली 29 तारीख़ तक यहाँ सबके लिए खुली रहेगी और इसके बाद देहरादून और नैनीताल जैसी जगहों पर भी जाएगी।”
अनेक संस्थानों, शोधकर्ताओं, क्यूरेटरों और भारत-जर्मनी के साझा प्रयासों ने इस नायाब प्रदर्शनी को संभव बनाया. आज ये चित्र भारत में प्रदर्शित हो रहे हैं. प्रोफ़ेसर हर्मन अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं, “यह हमारे लिए बहुत शुभ अवसर है कि आज लंबे इंतज़ार के बाद पहली बार भारत में ये दुर्लभ चित्र दिखाए जा रहे हैं.”
बदलता हुआ हिमालय
इन चित्रों को देखते हुए एक सवाल बार-बार मन में उठता है. क्या आज का हिमालय वैसा ही है? नई सड़कें, बदलती बसावटें, पर्यटन, कृषि और विकास ने हिमालय को तेजी से बदल दिया है. इन चित्रों में सुरक्षित हिमालय एक ऐसे समय की झलक देता है, जो अब इतिहास बन चुका है.
ये चित्र केवल हिमालय का दस्तावेज़ नहीं हैं. वे भारत और जर्मनी के बीच सांस्कृतिक सहयोग, साझा इतिहास और बौद्धिक संवाद का भी प्रतीक हैं. कला, भूगोल और इतिहास यहाँ एक-दूसरे से हाथ मिलाते दिखाई देते हैं.
जेएनयू के पूर्व प्रोफ़ेसर और लेखक प्रकाश उपाध्याय बताते हैं, “ये चित्र किसी औपनिवेशिक उद्देश्य को लेकर बनाए गए नहीं लगते. ये बेहद कलामय लगते हैं. इसलिए यह प्रदर्शनी काफ़ी रोमेंटिक लगती है जैसा आमतौर पर नहीं होता. जो नैनीताल इन चित्रों में दिखता है उसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती. इन्हें देखकर एक पूरी इमैजिनेशन खुलती है कि कभी हमारी प्रकृति ऐसी भी रही होगी.”
क्यों देखनी चाहिए यह प्रदर्शनी?
यदि आप हिमालय, इतिहास, यात्रा, कला या फोटोग्राफी में रुचि रखते हैं, तो यह प्रदर्शनी आपके लिए किसी खजाने से कम नहीं. यह सिर्फ चित्रों को देखने का अवसर नहीं, बल्कि उन्नीसवीं सदी की आँखों से हिमालय को देखने का दुर्लभ अनुभव है.
170 वर्ष पहले कुछ खोजी मनुष्यों ने हिमालय को देखा, समझा और अपने तरीके से उसे दर्ज किया. आज वे लोग हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दृष्टि इन चित्रों में जीवित है.
हिमालय लगातार बदल रहा है. इन चित्रों को देखते हुए हम न केवल उसके अतीत को देखते हैं, बल्कि अपने वर्तमान और भविष्य पर भी विचार करते हैं. कितनी दूर आ गए हैं हम. कितनी तेज़ी से चले हैं. और कहाँ जाकर हमें ठहरना होगा.
![]()

