ये जो वतन है इसे और हसीन होना था

ये जो वतन है इसे और हसीन होना था

ये जो वतन है इसे और  हसीन  होना था  

मगर  यहां  वो  हुआ जो  यहीं न होना था

 

हम  जो एक दूसरे से लड़ रहे हैं बेमतलब

हमको  एक  दूसरे  से  मुतमईन होना था

 

हमें  उकसाया गया  और लड़ पड़े  हम  भी 

हमको खुद पर भी तो थोड़ा यकीन होना था

 

एक छोटी सी थी कोशिश ये जिससे टूट गया

अपने  रिश्ते  को क्यों  इतना महीन होना था

 

वो  जितना कहते  गए उतना गिर गए हम भी

कम  से कम हमको तो थोड़ा ज़हीन होना था

 

मजहबी रंजिशों से किस तरह मुरझा सा गया

मेरे  जिस  देश  को   ताज़ातरीन  होना  था

 

हम हैं भोले, हमें आएगा कब समझ  आखिर 

किसको  पैरों  पे, किसे  महज़बीन  होना था

 

वो  जो अब बन रहा है आसमा,  पछताएगा

वो भी मिट्टी का था, उसको ज़मीन होना था

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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