क़ातिल की आंख में ज़रा सा डर नहीं मिला

क़ातिल की आंख में ज़रा सा डर नहीं मिला 

क़ातिल  की आंख  में ज़रा  सा डर नहीं मिला 

हां फिर से एक क़तल हुआ, ख़ंजर नहीं मिला 

 

मरने की एक ख़बर भी अब एक आम ख़बर है

सबने  सुना, किसी पे  फिर, असर नहीं मिला

 

होना था हर इक शख़्स उसका आसरा मगर

इंसानियत  सा  दूसरा  बेघर  नहीं   मिला

 

ये  बाँटने  वाला  बड़ा  शातिर  है  दोस्तो

इसको भी आप से कोई बेहतर नहीं मिला

 

हुक़ूमत की जिसके ज़हन में अंधी हवस न हो

क्यूं  देश  को  ऐसा  कोई  रहबर नहीं मिला

 

कहते हैं कि कण-कण में हैं और वो भी करोड़ों

फिर  क्यूं  दिलों में  एक भी  ईश्वर नहीं मिला

 

सबकी  ज़ुबां  सिली हुई, आंखें  हुई पत्थर

मुर्दों  में भी  ऐसा  कभी  मंज़र  नहीं  मिला

 

कह दो ग़लत को ग़लत, बस एक बार ही सही

ख़ामोश  रह के  कुछ  कभी  बेहतर नहीं मिला

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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