Maggie Point

अब उन पहाड़ी मैगी पॉइंट्स का क्या होगा ?

डियर मैगी,

कल जब किराने की दूकान में गया तो जाते ही कहा…आंटी मैगी..ये कहते ही मुझको रुकना पड़ा..न चाहते हुए भी.. तुम वहीं शेल्फ में रखे थे..पर आज पहले की तरह सबसे आगे की लाइन में खड़े मुस्कुरा नहीं रहे थे…तुम्हें कहीं पीछे कई और नूडल्स से ढंकते हुए किसी अपराधी की तरह छुपाया गया था.. न चाहते हुए भी आज नज़र दूसरे नामों के नूडल्स को तलाश रही थी..समझ नहीं आ रहा था कि तुम्हारी जगह किसे चुनूं? तुम मुझे उस वक्त धोखा देकर चली गई उस प्रेमिका की तरह लगे थे जो अब तुम्हारी ज़िंदगी में नहीं रह सकती और जिसकी जगह ज़िन्दगी में कोई और कभी नहीं ले सकता। कभी नहीं।

डियर मैगी तुम्हारा नाम सुनते ही मुझे वो बचपन याद आने लगता है जब तुम पांच रूपये के पैकेट में मिलते थे। मम्मी दूसरे शहर में नौकरी करती थी और जाते हुए दीदी को ढेर सारे (तब ढेर सारे मतलब सच्ची मुच्ची का ढेर सारे नहीं था ना) पैसे दिया करती थी। जानते हो, पापा की मनाही के बावजूद दीदी उन पैसों से ढेर सारे मैगी के पैकेट हमसे मंगा लेती थी। और कहीं अपनी छुपाई हुई कॉमिक्सों के बीच रख देती थी। जब पापा घर से कहीं बाहर जाते तो हम सब बच्चे मिलकर चोरी-छिपे मैगी पार्टी करते। वो मैगी पार्टी जिसकी बराबरी दुनिया की कोई पार्टी नहीं कर सकती। और कई बार मैगी बन चुका होता और पापा लौट आते तो पकड़े जाने के डर से हम उस बनी बनाई मैगी को छत के पीछे झाड़ियों में फेंक देते। तुम्हें फेंकते हुए कलेजे में जो टीस उठती वैसी टीस तब भी नहीं उठी थी जब ये पता चला था कि ज़िदगी में जिस पहली लड़की को प्यार किया था वो मुझसे प्यार नहीं करती। (तब तो उठी थी वैसे, शायद थोड़ा ज़्यादा हो गया)। और वो लम्हा भी याद है जब हम कुछ बड़े हुए और पहली बार पापा को मैगी खिलाई। बड़े हिचकते हुए उन लंबे लंबे नूडल्स को किसी तरह मुंह में डालते हुए एक आध स्पून खाने के बीआडी उन्होंने कहा था- कैसे खा लेते हो ये गिदौले (कैंचुए) जैसे। और बाकी की प्लेट उन्होंने हमारी ओर बढ़ा दी थी। गिदौले- पापा का दिया ये नाम भी तुम्हारे लिए हमारे इस प्यार को कहां कम कर पाया था।

बाद में कभी ऐसा भी हुआ कि तुम्हें अलग अलग कलेवरों में पेश किया जाने लगा। तुम्हारे नूडल्स को कमसिन आकार में ढाला गया। पर हमें तो तुम जैसे थे दोस्त वैसे ही पसंद थे। वही पुराने मोटे वाले नूडल्स। बिना मिलावट, सज़ावट, ना ज़्यादा, ना ही कम।

आज भी अच्छे से याद है दोस्त वो पहाड़ी टीले जहां ठण्ड के मौसम में ठिठुरते हुए, अपने मैफलरों से कान ढंकते हुए जब हम किसी चाय के ठेले पे पहुंचते थे तो सोचते थे- खाने के लिए क्या मिलेगा? तो बगल में हमें तुम दिखाई दे जाते और हमारी सारी चिंता दूर हो जाती। चाय और मैगी उस वक्त किसी छप्पन भोग से कम नहीं लगती थी। और उस वक्त यकीन मानो दोस्त कोई अगर हमें छप्पन भोग और तुममें से चुनने को कहता तो हम तुम्हें चुनते। हमें तुमसे इतना प्यार जो था। ये आज से यही कोई दस पंद्रह साल पुरानी बात होगी।

लेकिन धीरे धीरे तुमने सबके दिलों में इतनी जगह बना ली कि अब उन वीरान पहाड़ी टीलों पर तुम्हारे नाम की दुकानें खुल गई हैं जिन्हें लोग प्यार से मैगी पॉइंट कहते हैं।तुम यात्राओं के सस्ते और टिकाऊ साथी बन गए थे दोस्त। और वो मैगी पॉइंट सैकड़ों सैलानियों के पेट को तुरंत राहत देने के ज़रिये। तुम्हारे दस रूपये के पैकेट को 20 रूपये की प्लेट में बेचकर कुछ गरीब अपने घर चला लेते थे। तुम उनके लिए डबल बेनिफिट देने वाले एक भरोसेमंद इन्वेस्टमेंट हो गए थे। वो मैगी पॉइंट जो तुम्हारे भरोसे पे खड़े हुए अब उनका क्या होगा ? वो सैलानी और वो पहाड़ी गरीब अब ठगा सा महसूस नहीं करते होंगे?

जानते हो अच्छी बात क्या थी तुम्हारे साथ ? तुम जैसे हम चाहते वैसे ढल जाते थे। जब थोड़ी मेहनत करने का मन होता तो तुम प्याज टमाटर और मटर के साथ मिलाकर हमें अच्छे लगते। जब तुम्हें नॉनवेज की तरह खाने का मन होता तो अंडा मिलाकर भी तुम अच्छे लगते और जब कहीं से थके हारे लौटकर कुछ करने का मन नहीं होता तो तुम बस उबालकर दो मिनट में तैयार हो जाते और तब भी अच्छे ही लगते।

लेकिन दोस्त इस दुनिया की तमाम और चीज़ों की तरह तुम भी मिलावटी निकले। अपने दो दशकों के बनाये भरोसे को तोड़ते तुम्हें 2 मिनट भी नहीं लगे। तुम भी दुनिया के तमाम लोगों की तरह थे कुछ और, निकले कुछ और।

कहते हैं ना कि शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है। और तुम्हारे साथ तो तुमसे जुड़ा सालों का भरोसा भी था। उसी टूटे हुए भरोसे के साथ टूटे हुए शीशे के न जाने कितने घातक टुकड़े हमारे खून में मिल गए होंगे दोस्त। गलती तुम्हारी नहीं है। एक बार फिर साबित हो गया कि बाज़ार में पैसों के सामने भरोसे भी नहीं टिकते।

मिलावट तुममें नहीं दोस्त इन बड़ी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी चलाने वालों के दिलों में है।तुम्हारा भी इस बाज़ार ने इस्तेमाल किया है दोस्त। तुम इनके लिए एक प्रोडक्ट भर थे, लोगों की जुबां पे चढ़ गया एक स्वाद भर और हम पैसा खर्च करने वाले अदने से कंज्यूमर। बस।

तुम्हारे नाम से सालाना अरबों में कमाई तो कर ही ली है इन्होंने। कमा ही लिया है ना खूब मुनाफा। इन्हें  उस रिश्ते का क्या पता दोस्त जो तुम्हारे और हमारे बीच इतने सालों में अनजाने ही बन गया था।उस कमाई के आगे उन करोड़ों रिश्तों के बीच अनजाने ही बन गए  भरोसे की कीमत इस बाज़ार के लिए कुछ भी नहीं है दोस्त। तुम और हम दोनों इस बाज़ार के लालच की भेंट चढ़ गए हैं। पर अब इस बाज़ार पे भरोसा करने से पहले हम भी दस बार सोचेंगे।

और हां तुम्हारी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता मैगी। तुम्हारा वो पीला चमचमाता पैकेट और चटाखेदार स्वाद हमेशा हमारे साथ रहेगा।हमारी यादों में।

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

2 Comments

  • Hamari bhi kaafi purane yaaden judi hai maggi ke saath. But sehat pehli priority honi chahiye. So “ab tere bin jee lenge hum.”

  • कहा से लाते हो अपनी बातो मे इतनी गहराई।। अति उत्तम।।

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