बेरंग सा एक दिन अपने रंग बदलता रह गया

बेरंग सा एक दिन अपने रंग बदलता रह गया

बेरंग  सा एक दिन अपने रंग बदलता  रह गया
रोशनी में  डूबकर  सूरज  पिघलता  रह   गया

 

बिक  रहा  था  यूं  अकेलापन  खुले  बाज़ार में
बिन  खरीददारों  के  कारोबार  चलता  रह  गया

 

नीद  को  भी जागने की इस कदर लत लग गई
ख़्वाब  एक  मायूस  सा बैठा  मचलता रह गया

 

बंद   कमरे   में  अकेले   रोशनी   घुटती   रही
एक  कोने  में  दिया  बेकार   जलता रह  गया

 

जिस तरफ खिड़कियां खोली उस तरफ दीवार थी
अलसुबह खिड़की का परदा आंख मलता रह गया

 

पार्क  की  उस  बेंच  ने  तापी  अकेले  धूप फिर
सर्दियों  का  एक  दिन  तनहा  ठिठुरता  रह गया

 

किसी  ने ना ली खबर, कमरे  में बूढ़ा था  बीमार
बंद  दरवाज़े  पे  बस  अखबार  डलता  रह  गया

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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