वक्त की उंगलियों में नाचती है ज़िंदगी की कठपुतली

रात का तकरीबन नौ बज रहा था। संगीत नाटक अकादमी से बाहर निकला ही था कि मेनरोड पर एक रिक्शेवाले को अपने रिक्शे पर कपड़ा मारते हुए देखा। पूछा कि क्या वो अम्बेडकर पार्क की तरफ जाएगा? मुझे इसी ओर आना था। रिक्शेवाले ने मना कर दिया। तभी पीछे एक शख्स को साईकिल के खड़ा पाया। वो शख्स अपनी साईकिल रोक के मेरी ओर देख रहा था। मेरे मुड़ने पर तकरीबन 40-45 साल के उस आदमी ने कहा कि ”मैं भी चारबाग की तरफ जा रहा हूं। आप चाहो तो चल सकते हो।”

उस अजनबी आदमी को गौर से देखा। सफेद रंग का कुर्ता जिसपर काले अक्षरों से शायद गायत्री मंत्र लिखा था। सलेटी रंग को छोड़कर सफेदी की तरफ बढ़ते कुछ बड़े बाल। आखों में चैकोर फ्रेम का एक चश्मा। साईकिल के कैरियर पर बैठकर जाने का ये आमत्रण रोचक लगा। कुछ ही देर में हम संगीत नाटक अकादमी के अहाते की दीवार से लगी सड़क से होकर अम्बेडकर पार्क की तरफ जाने वाले रास्ते से गुजर रहे थे। बात निकली तो पता चला इनका नाम मेराज आलम है। मिराज पिछले 32 सालों से लोककलाओं पर काम कर रहे हैं। थियेटर, एक्टिंग से लेकर कठपुतली तक उन्होंने सारे काम किये हैं। लेकिन कठपुतली से उन्हें खासा लगाव है। बातों बातों में पता चला कि वो कठपुतली से जुड़ी कार्यशालाएं भी कराते हैं।

जैसे जैसे बात बढ़ती जा रही थी ये आदमी मेरे लिये रोचक होता जा रहा था। एक अजनबी जो अब से 10 मिनट पहले मेरी जिन्दगी में दूर दूर तक कहीं नहीं था मेरे सामने उस साईकिल पर बैठा पैडल मारता हुआ लखनउ के तकरीबन सबसे पौश इलाके की उस चैड़ी सड़क पर हो रही इस यात्रा में अपनी जिन्दगी के चिट्ठे खोल रहा था। और मैं सुन रहा था, सवाल पूछ रहा था। ऐसे जैसे कोई बच्चा किसी अनुभवी शख्स से कहानियां सुन रहा हो, किसी दूसरी दुनिया की।

चारबाग की तरफ जाने वाले रास्ते पर पहुंचे तो हम रास्ता भटक चुके थे। मैं कठपुतलियों के उस संसार में डूबा हुआ था। वैसे भी भौगोलिक दृष्टि से मैं खुद को बहुत ज्यादा साक्षर नहीं मानता। अकसर दिशाओं की गलतियां कर बैठता हूं। उस शख्स को ही खयाल आया कि हम गलत रास्ते पर आ गये हैं। साईकिल मोड़ी जा चुकी थी। अब हम दोनों पैदल चलते हुए कठपुतलियों के उस संसार की बातें कर रहे थे जो वो आदमी पिछले कई सालों से लगभग रोज रचता रहा है। इस बीच मेरे भीतर का पत्रकार कुलांचे भर चुका था। मेरे फोन का रिकार्डर आॅन हो चुका था। मैं उस शख्स को बता चुका था कि मैं गाॅंव कनेक्शन नाम के एक साप्ताहिक अखबार के लिये लिखता भी हूं।

एक आर्ट फाॅर्म के तौर पर कठपुतलियों को कैसे बचाया जा सकता है, उनको बचाया जाना ज़रुरी है भी कि नहीं, वो शख्स कहां-कहां और कैसे-कैसे इस कला पर काम कर रहा है, कैसे अपनी रोजाना की एक नौकरी के बीच से वो कठपुतलियों के लिये वक्त निकाल पाता है, गोमती नदी के पुल से गुजरते, हाथियों से सराबोर पार्क के अहाते को पार करते, अम्बेडकर पार्क की तरफ जाते इन तमाम मसलों पर हम बात करते रहे।

रात के साढ़े नौ बज रहे थे। लोहिया पार्क से लगे उस चैराहे के पास चबूतरे पे खड़ा मैं अजनबियत की ताजा ताजा टूटी उस महीन दीवार को पार कर उस पैंतालीस साल के शख्स के साथ आईसक्रीम खा रहा था। वो साईकिल सवार आदमी खुश था। उसकी बातों में ये खुशी झलक रही थी। उसके चेहरे के उत्साह में उसके अनुभवों की तरावट थी, जिसके सामने उम्र और पसीना दोनों मात खा रहे थे।

मुझे विपुल खंड वापस आना था। उस शख्स का साईकिल चलाकर सिर्फ मेरे लिये उस ओर आना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। एक तकल्लुफ था जो हम दोनों की उम्र के अन्तर से उपजा था। पर अनुभव तकल्लुफों को भांपने में माहिर होते हैं। मुस्कुराते हुए मेराज आलम नाम के उस आदमी ने अपनी साईकिल अपने गन्तव्य की विपरीत दिशा में, यानि मेरे गन्तव्य की दिशा में घुमाई। पैडल पर पांव रखा। और साईकिल पर चढ़ते हुए बोला- उम्र में भले ही ज्यादा दिखता हूं पर जवानी अभी भी कम नहीं है चलिये आपको घर तक छोड़ आता हूं। कुछ आग्रह अपने दायरे को पारकर अधिकार की ओर चले आते हैं। एक घंटे की उस छोटी सी बातचीत में अधिकार समझकर कही गई उस बात ने इनकार की गुंजाईश नहीं छोड़ी। कुछ ही देर में मैं अपने गन्तव्य के गेट पर था। वो शख्स मुस्कुराते हुए बोला- माशाअल्लाह अच्छी और खुली जगह पर रहते हैं आप। हसरत भरी निगाहों से एक नज़र उस इलाके को देखकर और फिर अपनेपन भरी निगाहों से मुझे देखकर वो साईकिल सवार शख्स फोन करने का वायदा देकर अपने गन्तव्य की तरफ रवाना हो चुका था।

मैं सोच रहा था, “क्या मैं आपको छोड़ दूं” से लेकर ”कल मैं आपको फोन करुंगा” तक का ये सफर तय करना इतना मुश्किल तो नहीं होता, फिर भी ऐसे सफर बार बार तय नहीं होते। इनके तय होने के लिये एक चीज़ जो सबसे ज़रुरी है वो है संयोग। लखनऊ का ये दिन इस संयोग से गुजरता हुआ एक यादगार दिन में तब्दील हो चुका था।

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