पंचेश्वर- टूटती उम्मीदों का बांध

पंचेश्वर बांध इन दिनों उत्तराखंड में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और संभावित डूब क्षेत्र के इलाकों में ये बांध प्रतिरोध को भी जन्म दे चुका है। ये प्रतिरोध जाहिर तौर पर उन लोगों का है, जो इस बांध के बन जाने के बाद सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इस बांध के कारण कितने लोगों का विस्थापन होगा, इसका अनुमान कई विश्लेषक लगा चुके हैं। ये बांध भारत और नेपाल के बीच 1994 में हुई संधि के अंतर्गत निर्माणाधीन है। दरअसल भारत और नेपाल के बीच महाकाली संधि के नाम से हुई इस साझी पहल का उद्देश्य दोनों देशों के जलसंसाधनों के जरिये दोनों देशों को समान रूप से लाभान्वित करना था। क्योंकि इससे पहले भारत और नेपाल के बीच 1954 और 1949 में शुरू की गयी कोशी और गंडकी की परियोजनाओं को दोनों देशों की जलसंधियों में काले धब्बे की तरह देखा जाता रहा है। ये दोनों ही संधियां नेपाल के लिए नुकसानदेह रहीं। इनमें ज्यादातर फायदा भारत को ही हुआ।

एक रिपोर्ट के मुताबिक 1954 में शुरू हुए टनकपुर हाईडोलिक प्रोजेक्ट के दौरान नेपाल के 77 विस्थापितों का आज तक पुनर्वास नहीं किया गया है। 1994 में हुई महाकाली संधि से भी नेपाल की तत्कालीन विपक्षी राजनीतिक पार्टियां खुश नहीं थीं। यहां तक कि इस संधि के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने तक इन विपक्षी दलों को दस्तावेज देखने को तक नहीं मिले। मौजूदा पंचेश्वर बांध को लेकर भी दोनों देशों में सरगर्मियां तेज हैं। इस बांध का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा भारतीय क्षेत्र में आता है और शेष हिस्सा नेपाल की सीमा में। इस बहुद्देश्यीय परियोजना की कुल अनुमानित लागत 30 हजार करोड़ रुपये आंकी गयी है।

उत्तराखंड के स्थानीय पत्र नैनीताल समाचार में छपी एक रिपोर्ट की मानें, तो 6,500 मेगावाट बिजली पैदा करने वाली पंचेश्वर बांध परियोजना से महाकाली में धारचूला तक, सरयू में सेराघाट तक, पनार में सिमलखेत तक, पूर्वी रामगंगा में थल तक का तटीय क्षेत्र डूब जाएगा। भारत में 120 गांवों का तो तत्काल विस्थापन करना पड़ेगा और नेपाल के 60 गांव भी इस बांध की भेट चढ़ जाएंगे। केवल पिथौरागढ़ और चंपावत के 19,700 लोगों को विस्थापन की मार झेलनी पड़ेगी। रिपोर्ट की मानें तो इस परियोजना के बाद उत्तराखंड के लोगों का सपना रही टनकपुर बागेश्वर के बीच रेलमार्ग की कल्पना भी इस बांध के साथ जलमग्न हो जाएगी।

इस पूरे मामले को लेकर लोगों के विरोध के कई कारण हैं। मसलन ये कि डूब के संभावित क्षेत्र में आने वाले इलाकों के लोगों के विस्थापन का भारत और नेपाल की सरकारों की ओर से क्या प्रबंध होगा, ये तय नहीं है। दूसरा ये कि परियोजना की विस्‍तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट डीपीआर अभी तक जारी नहीं की गयी है। इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की गयी है कि वो कौन सी कंपनियां होंगी, जिन्हें इस परियोजना के निर्माण का जिम्मा सौंपा जाएगा। और इन सारी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि बांधों को लेकर पर्वतीय क्षेत्र की जनता हमेशा शंकित रही है। उत्तराखंड के इन क्षेत्रों में भूस्खलन एक बड़ी समस्या है। पिथौरागगढ़ जिले के मालपा में हुए भूस्खलन से हुई भारी तबाही को वहां के लोग अब तक भुला नहीं सके हैं। 1998 में हुए इस भूस्खलन में 380 लोग मारे गये थे। पर्यावरणविद बांधों से होने वाले भूस्खलन और भूकंप के खतरों के प्रति हमेशा से आगाह करते रहे हैं। पहाड़ी इलाकों में ये समस्या और भी ज्यादा है।

उत्तराखंड में भागीरथी बचाओ आंदोलन के तहत वयोवृद्ध प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने भी दिल्ली आकर इन बांधों के खिलाफ अपना विरोध प्रदर्शन किया था। हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध हो रहे बांधों के निर्माणकार्य की वजह से वहां की जैवविधता भी प्रभावित हो रही है। मसलन गंगानदी के किनारे बसे सुंदरवनों को इससे काफी नुकसान हुआ है। पंचेश्वर बांध के निर्माण की वजह से महासीर मछली के अस्तित्व पर संकट की बात सामने आ रही है। इन बांधों की वजह से हिमालयी क्षेत्रों के वनक्षेत्र में भी कमी आ रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं को बढ़ावा मिलने की आशंका भी जतायी जा रही है। बांधों के आर्थिक पक्ष को लेकर सबसे खतरनाक बात ये भी है कि इनमें से अधिकांश की उत्पादन क्षमता धीरे-धीरे इतनी घट जाती है कि इनका लाभ नहीं रह जाता और फिर इन्हें रिसाइकिल भी नहीं किया जा सकता।

इतनी ज्यादा संख्या में बनाये जा रहे बांधों की उपयोगिता पर इस बात से सवालिया निशान लग जाते हैं कि जब ये बांध उस क्षेत्र की जनता के हितों को ताक पे रखकर और यहां तक कि उनको बेघर करके बनाये जा रहे हैं, तो इसके पीछे हित आखिर किनका छुपा है। वे कौन लोग हैं, जो इन बांधों से सबसे ज्यादा लाभान्वित हो रहे हैं। और सबसे बड़ा सवाल ये कि देशभर में बनाये जा रहे सभी बांधों के निर्माण को लेकर बनी सारी योजनाएं इतनी अपारदर्शी क्यों होती हैं कि तब तक इनके टेंडर्स का पता आम जनता को नहीं चल पाता, जब तक बात ऐन इनके निर्माण तक नहीं पहुंच जाती। पंचेश्वर बांध के मामले में भी यही हो रहा है।

उमेश पंत

उमेश पंत यात्राकार के संस्थापक-सम्पादक हैं। यात्रा वृत्तांत 'इनरलाइन पास' और 'दूर दुर्गम दुरुस्त' के लेखक हैं। रेडियो के लिए कई कहानियां लिख चुके हैं। पत्रकार भी रहे हैं। और घुमक्कड़ी उनकी रगों में बसती है।

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  • ठीक है sir……… लेकिन आपने जिस पत्रिका को नैनीताल समाचार बताया है वह नैनीताल समाचार नहीं बल्कि जनपक्ष आजकल है और जिस लेखक का वह आलेख है वह वरिष्ठ पत्रकार बद्री दत्त कसनियाल हैं। rohit joshi

  • लेकिन रोहित भाई मैंने यहां जिक्र नैनीताल समाचार का ही किया है। जनपक्ष आजकल के ठीक ठीक आंकड़े क्योंकि मेरे पास नहीं थे न पत्रिका थी तो कसनियाल जी के उस लेख का जिक्र मैने नहीं किया। ये दरअसल नैनीताल समाचार में बची बिष्ट जी के आलेख का जिक्र है। लिंक दे रहा हूं आप भी पढ़ें http://nainitalsamachar.in/pancheshwar-dam-and-peoples-movement/

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