ओसियान् में खरगोश

(Last Updated On: January 2, 2022)

ओसियान्स में दिखा वो खरगोश रगों में अब तक एक अजनबी सी रुमानियत पैदा कर रहा है। एक मासूम सी, बच्ची सी पर पर फिर भी प्रौढ़, परिपक्व सी है ये रुमानियत। बड़ा रुहानी सा होकर भी रुहानी भाव न होने सा कुछ, पर फील पूरा रुहानी, पूरा नशा लिए हुए। सात बजकर पैंतालीस मिनट पर उस खरगोश ने फिल्मी परदे पर दौड़ना शुरु किया फिर दौड़ा क्या रुक ही गया दिमाग के कोने कोने में जैसे हमेशा के लिए। परेश कामदार ने अपनी फिल्म के लिए पहले तो नाम ही गजब का पसंद किसा। चंचल सा, मासूम सा, भागता फिरता सा, नादान सा। और फिर डेढ़ घंटे की इस पूरी फिल्म की रवानगी का पूरा सौन्दर्य देखिये तो जानिये। हर एक फ्रेम को देखने के बाद दिल से अपनेआप कह बैठेंगे वाह क्या बात है। हर फ्रेम इतना गढ़ा सा, सधा सा कि अपने इर्द गिर्द की दुनिया में पूरे फिल्मिक अनुशासन के साथ बड़े गहरे तक ले जाता हो।

इस फिल्म की पूरी कहानी सतही तौर पर देखेंगे तो हो सकता है बड़ी असामाजिक सी लगे। हो सकता है कि आपको वह सामाजिक स्वीकार्यता से परे लगे। पर विषय अपनी पूरी सत्यता में अस्तित्व रखता है। इस विषय का लेना देना भावनाओं से है जो अपनी सम्पूर्णता में कितनी कौम्प्लेक्स हो सकती हैं आप तब तक नहीं जान सकते जबतक उन्हें महसूस ना कर पांयें। फिल्म में एक बच्चा है, जो अपनी मां के साथ रहता है। उसके पड़ौस में एक नौजवान रहता है अविनाश। बच्चे के लिए उसकी जिंदगी में उसकी मां से ज्यादा उसके अविनाश भैया जगह रखते हैं जो उसके साथ खेलते हैं, उसे घुमाने ले जाते हैं।

अब कहानी में प्रवेश करती है एक सुन्दर लड़की। छोटे से कस्बे में रहने वाले अविनाश भैया को लड़की पसंद आ जाती है। और वो उसे नाम देते हैं मृत्यु। मृत्यु क्यों का लौजिक बड़ा मजेदार है। जो अविनाश भैया की भाषा में कहें तो क्योंकि उस लड़की को देखकर अविनाश भैया के प्राण चले जाते हैं। खैर मृत्यु से रिश्ता बनाना आसान काम तो नहीं होता। इसके लिये कोई तो चाहिये मध्यस्तता करने वाला। तो ये बच्चा इस युगल के प्रेम सम्बंध की कड़ी बन जाता है। एक दूसरे की चिटठिया पास करना और सन्देश एक दूसरे तक पहुंचाने का काम यह बच्चा पूरी तन्मयता से करता है। शुरु में यह तन्मयता सहज सी लगती है पर धीरे धीरे इसमें एक असहजता पनपने लगती है। एक छोटा बच्चा जो अपने इर्द गिर्द एक युगल को प्यार करते देख रहा है। वो उनके रुहानी संकेतों को समझ रहा है। उन रुहानी जरुरतों से रुबरु हो रहा है।

इस पूरी प्रक्रिया में उसके अन्दर ये रुहानी जरुरतें और अहसास पल पनप जाते हैं। वह भी इस लड़की को कुछ वैसी ही नजर से देखने लगा है जैसे अविनाश भैया। उसकी भी संवेदनाएं जाग जाती हैं। उसे भी इस लड़की के स्पर्श से एक अजीब सी सिहरन महसूस होने लगती है। तो क्या लड़की भी इस बच्चे के इस आशय को समझ पा रही है। ये विशय जितना जटिल है फिल्म इसे उतनी ही सहजता से पेश करती है। फिल्म के आंखिरी दृश्य में ये बच्चा इस लड़की से रुहानी रिस्ता कायम करता है और लड़की भी उस पूरे अहसास को अपने अन्दर महसूस करती है। यह रुहानी रिस्ता महज स्पर्श है। उससे ज्यादा और कुछ नहीं। पर क्या इस रिस्ते के भीतर भी वही अहसास हैं जो अविनाश भैया और उस लड़की के बीच पलते पनपते ये बच्चा देख रहा है। अब ये आपकी अपनी समझ और स्वतंत्रता है कि आप इसे कैसे आत्मसात करते हैं। पर पूरी फिल्म इस पूरे कथानक को जिस ढ़ांचे में कह जाती है वो निहायत दर्शनीय है। देखने भर से जी भर जाने जैसा कुछ।

शरीर के बाहरी ढ़ांचे को कितनी सुन्दरता से दिखाया जा सकता है वो इस फिल्म को देखें तो आप जानें। फोटोग्राफी के विश्लेषण के मास्टर रहे बार्थ ने पोर्न और इरौटिसिजम के अन्तर को बताते हुए कहा है कि पोर्न जेनिटल और्गन्स का कोरा प्रदशर्शन मात्र है जो एक बार को उत्तेजित तो करता है पर तुरन्त ही एक विछोह एक बोरडम सी कायम कर देता है जबकि इरौटिसिजम में प्रदर्शन नहीं है बल्कि एक स्थाई भाव है जो लम्बे समय तक जिन्दा रहता है। फिल्म कुछ ऐसा ही इरोटिक सा प्रभाव छोड़ जाती है। पर इस इरोटिसिजम में पूरी मासूमियत है। एक नादान सा रुहानी मजा जिसे पवित्र भावनाओं के दायरे में रहकर ही महसूस किया जा सकता है। ओसियान्स में इस फिल्म को ये वर्ड प्रीमियर था। ये फिल्म औडियंस अवार्ड के लिए भी नामांकित की गई है।

इस फिल्म के अलावा आज ओसियान्स में तीन और अच्छी फिल्में देखने को मिली। ओसियन आफ एन ओल्ड मैन जो कि राजेश सेरा की एक भारतीय फिल्म है, कतई प्रभावित सा नहीं करती। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है। पर ना नैरेटिव कुछ खास है ना ही टीटमेंट। टाम अल्टर की अदाकारी अच्छी है पर केवल उसके लिए फिल्म नहीं देखी जा सकती।

अब्दुलरिजा की ईरानी फिल्म ओवरदेयर एक अच्छी फिल्म लगी। सत्तर मिनट की इस फिल्म में एक नवयुगल के तलाक के बाद लड़के की मनहस्थिति को दिखाया गया है। उसके दिल में कहीं अब भी अपनी पत्नी के लिए प्यार है। पर वो अपने रिस्ते की टूटन को देख रहा है और दिल से दुखी है। पूरी फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कमाल है।

कल न्यूस्टीम सिनेमा के अन्तर्गत लव आजकल दिखई जायेगी। इसके अलावा सुबह साढ़े नौ बजे सुपरमैन आफ मोलेगांव देखने जाया जा सकता है। आदमी की औरत और तीन कहानियां जिसका मैने कल जिक्र किया था कल फिर दिखाई जायेगी। ग्यारह बजे। रात के दस बजे तेजा एक बार फिर देखी जा सकती है। इसका भी जिक्र कल मैने किया था। खैर ये अनुभव और जानकारियां आपके पढ़ने और लाभान्वित होने के लिए हैं। कल फिर कोशिश की जायेगी नये अनुभव बांटने की। ओसियान के पिटारे में देखें और क्या क्या है देखने महसूसने लायक।

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