कहानी उस ‘देस’ की जहाँ समय स्थिर है और आदमी खर्च हो रहा है

अविनाश मिश्र :
भाषा को बहुत सावधानी और ख़ूबसूरती से बरतने वाले समकालीन युवा लेख़कों में अविनाश मिश्र एक जाना-पहचाना नाम हैं। हिंदी साहित्य जगत से जुड़े पहलुओं पर उनकी बेबाक़ और चुटीली टिप्पणियाँ बीते समय में बहुत चर्चा में रही हैं। एक सधा हुआ लेखक जब दूसरे मझे हुए लेखक के लिखे की समीक्षा करता है तो यह जुगलबंदी कुछ ख़ास होती है। अनिल यादव ने उत्तर-पूर्व की अपनी लम्बी यात्रा पर एक शानदार किताब लिखी थी ‘वह भी कोई देस है महाराज’। हिंदी के कुछ चुनिंदा यात्रा-वृत्तांतों का ज़िक्र करना हो तो इस किताब का नाम लिए बिना वह ज़िक्र पूरा नहीं हो सकता। आइए आज ‘यात्राकार’ पर पढ़ते हैं इस बेहतरीन यात्रा-वृत्तांत पर अविनाश मिश्र की लिखी समीक्षा। 
 
संजय हजारिका  की किताब स्टे्रंजर्स ऑव् दि मिस्ट में खून, बारूद, गुरिल्ला, मैमनसिंघिया मुसलमान, शरणार्थी और घुसपैठिए थे। वीजी वर्गीज की किताब इंडियाज नार्थ ईस्ट रिसर्जेंट में संधिया, समझौते, राजनीति· दांवपेंच, प्रशासनिक सुधार और इतिहास थे। लेकिन अनिल यादव की पूर्वोत्तर यात्रा पर केन्द्रित किताब वह भी कोई देस है महराज में आतंक में अवलंब खोजते निर्धन लोगों की सामूहिक प्रार्थनाएं हैं, पलायन और पीड़ा की उदास कर देने वाली एक जैसी कहानियां हैं, नरसंहारों की राजनीतिक और समाजशास्त्रीय व्याख्याओं के बीच बेचैन विवशताएं हैं।
 
छह महीने से ज्यादा का वक्त भारतीय पूर्वोत्तर में गुजारने के  बाद इस यात्रा-वृत्तांत को लिखने में लेखक ने करीब दस वर्षों का वक्त लिया। जो इस यात्रा-वृत्तांत के लेखक की कहानियों और सामाजिक-सांस्क्रतिक-राजनीतिक व आर्थिक मसलों पर किए गए लेखन से वाकिफ हैं, उन्हें यह बताने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है कि इस यात्रा-वृत्तांत की भाषा व दृष्टि इसे पढ़ते हुए आपको कहां ले जाएगी। लेकिन जो संयोग या दुर्भाग्य से परिचित नहीं हैं, उन्हें यह बता देना जरूरी लगता है कि अनिल यादव के पास एक सजग और निर्भीक पत्रकार की नजर और एक मानवीय और संवेदनशील लेखक की भाषा है। 
 
160 पृष्ठों की यह पुस्तक नागा आदिवासी नाच की तस्वीर वाले आवरण से शुरू होकर एक भविष्य को समर्पित होते हुए पूर्वोत्तर के नक्शे के साथ आगे बढ़ते हुए पुरानी दिल्ली के भयानक गंदगी, बदबू और भीड़ से भरे प्लेटफार्म नंबर नौ को ब्रह्मपुत्र मेल के जरिए पीछे छोड़ते हुए आगे के सफर पर और आगे बढ़ती है। ‘मैं पूर्वोत्तर के बारे में  कुछ नहीं जानता था…’ सब संदर्भों में महत्वपूर्ण यात्राएं ऐसे ही आरंभ होती हैं- ·कुछ न जानने के बोध से…।
 
इस यात्रा-वृत्तांत के बैक कवर की अंतिम पंक्ति बताती है कि इसे एक उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है। पढ़ा तो इसे आत्मकथा और डायरी की तरह भी जा सकता है, लेकिन इसे इस तरह से पढऩा-देखना-समझना एक भाषा में एक उल्लेखनीय यात्रा-वृत्तांत के रूप में इस पुस्तक के महत्व को  कम करना है। इस किताब से गुजरने की यात्रा मनमोहक या दिलचस्प नहीं है। यह वैसे अर्थों में पठनीय भी नहीं है, जैसे अर्थों में हम हिंदी में प्रकाशित यात्रा-वृत्तांतों और उपन्यासों को पढ़ते आए हैं। ऐसा यूं है, क्योंकि यह किताब किसी पर्यटक या उपन्यासकार की नजर से नहीं लिखी गई है। 
 
अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम और इनका प्रवेश द्वार असम… यह पूर्वोत्तर है… और इस पुस्तक में इसका जितना भी भू-भाग प्रकट व व्यक्त हुआ है, वह ऐसा नहीं है जो अपनी ओर आने के लिए आपको सम्मोहित, आकर्षित, उत्साहित, उत्तेजित या प्रेरित करे। यहां जमीन और उसकी सीमाओं के साथ-साथ बदलती जनजातियां, भाषाएं और तकलीफें हैं, मीडिया में ब्लैकआउट कर दिया गया पूर्वोत्तर है, जहां जब सब संपर्क टूट जाते हैं, तब प्रेस-वार्ताएं शुरू होती हैं। यह एक दुर्गम सफर है और इस पर निकले हुए लेखक और उसका साथी शाश्वत कहीं-कहीं दि मोटरसाइकिल डायरीज के उन दो नायकों की तरह लगते हैं, जिनमें से एक चे ग्वेरा थे। कभी-कभी इस सफर पर चल पड़ा लेखक ‘डिस्कवरी’ चैनल पर आने वाले प्रोग्राम मैन वर्सेज वाइल्ड के  बेयर ग्रिल्स की भी याद दिलाता है… इस प्रभाव में कि जब सब तरफ जंगल ही जंगल हो, तब जंगल खूबसूरत नहीं लगता, वह भय उत्पन्न ·रता है और वहां सौंदर्य की व्याख्या की जरूरत से बड़ा संकट, सब कुछ के अस्तित्व को लेकर होता है। कहीं-कभी हॉलीवुड फिल्म आइ एम लीजेंड  का संसार में विनाश के बाद अकेला छूट गया नायक विल स्मिथ भी याद आता है। 
 
ब्रह्मपुत्र नदी, चाय के बागान, हॉर्नबिल (रूप ही जिसका दुश्मन है), अरण्य, पर्वत, झरने, समतलताएं, फूल… बावजूद इसके प्रक्रति यहां कोई स्वर्ग नहीं रचती। सुंदरताओं के समानांतर यहां भय और दु:ख से भरा हुआ एक रक्तरंजित वर्तमान है…। यहां प्रकट पर कोई शब्द-श्रंगार नहीं है। यहां वृत्तचित्रात्मक शैली है… यहां जैसे-जैसे लैंडस्केप बदलता है, वैसे-वैसे अधबनी धारणाएं बदलती हैं। यहां चेरापूंजी की बारिशें तक सुंदर नहीं हैं… वे अवसाद से भरती हैं और आत्महत्याओं के अतीत में ले जाती हैं। यहां समय स्थिर है और आदमी खर्च हो रहा है। यह एक भाषा में एक  ‘अनटिपिकल ट्रैवेलॉग’ है। कहीं-कहीं कई अनुच्छेदों में यह एक  रपट सरीखा हो जाता है… संवेदनाओं के व्यायाम के लिए…। 
 
‘किसी जगह को देखने का सबसे अच्छा तरीका यह होता है कि उसे स्थानीय लोगों की आंख से देखा जाए।’ किसी पुरातन घुमंतू के इस वाक्य को इस पुस्तक में ही पढ़ लेने के बाद यदि कहें, तो कह सकते हैं कि इस यात्रा-वृत्तांत की कई बेहतर बातों में से एक बात यह भी है कि यह एक स्थानीय नजर से रचा गया है। 
 
हम सबके जीवन में जरूर कुछ ऐसे जीवन प्रसंग होते हैं, जिनकी वजह से हमारी अबोधता नष्ट हुई होती है, कुछ वस्तुओं को देखकर ऐसे प्रसंग याद भी हो उठते हैं। सामान्यत: सब संदर्भों में सब उसे प्रकट नहीं करते। लेकिन लेखक अपनी यात्रा के दौरान ‘तामुल’ देखकर, उन स्मृतियों में लौटता हैं, जब उसकी अबोधता नष्ट हुई थी… यह स्मृतियों को कुछ भारहीन करना है। यहां इस पुस्तक में एक अन्य प्रसंग भी है इसमें धोखे से खा लिए या खिला दिए गए गाय के मांस का ज़िक्र है। इस प्रसंग में गाय के गोश्त को पचा पाने से बड़ा संकट गाय के गोश्त को खाने और गाय को पूजने वालों के बीच के अंतर को पचा पाने का है। इन दोनों प्रसंगों को  क्रमश: पृष्ठ 16 व 68 पर पढ़ा जा सकता है। 
 
इस पुस्तक के अंत में दिए गए प्रमुख संदर्भ बताते हैं कि यह पुस्तक  शोध व तथ्यपरक होने में कहीं कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहती है। यह बात भी इस यात्रा-वृत्तांत की कई बेहतर बातों में से एक है।
 
और अंत में इस यात्रा-वृत्तांत के  एक अनुच्छेद के एक हिस्से को उद्घत करने का वह क्या कहते हैं कि ‘लोभ संवरण’ नहीं कर पा रहा हूं….
 
  “क्या जंगल था, भय से खिलवाड़ करता हुआ। वास्तविक जंगल एक प्रतिक्रिया होती है जो वनस्पतियां, जानवर और प्रक्रति साहचर्य के पुराने अनुभव हमारे भीतर पैदा करते हैं। हम सिर्फ उसके  प्रभाव को जान पाते हैं। उसे संपूर्णता में पकड़ पाना अंसभव है क्योंकि वह एक अलग विराट, अगम्य, निरंतर बदलता जीवन है। जो हलका-सा महसूस हुआ उसे अपने भीतर सहेज पाने में चूक जाने का बोध ऐसी कसक पैदा करता है कि सब कुछ रहस्यमय हो जाता है…।”
 
पुस्तक : वह भी कोई देस है महराज (यात्रा-वृत्तांत),  
लेखक  : अनिल यादव,  
प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
पृष्ठ : 160,  
मूल्य : 150 रुपए (पेपरबैक संस्करण )

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2 thoughts on “कहानी उस ‘देस’ की जहाँ समय स्थिर है और आदमी खर्च हो रहा है

  • February 5, 2018 at 11:54 am
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    शानदार!

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  • February 11, 2018 at 1:28 pm
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    अच्छा लग रहाहै पूरा पढ़ने पर टिप्पणी करेंगे

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